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विज्ञान

आदिवासियों के ज्ञान से पर्यावरण की रक्षा

उत्तरी क्वींसलैंड में बचपन गुजारते समय विलियम क्लार्क को पता था कि जब कुछ पेड़ों में कोपलें निकलती हैं तो केकड़े काटते हैं. लेकिन अब 51 की उम्र में वह पर्यावरण में कई स्पष्ट बदलाव देख रहे हैं.

ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के परिवार से आए विलियम क्लार्क कहते हैं, "धरती अब हमारा समर्थन नहीं कर सकती. फूलों के खिलने के चक्र की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. मछली पकड़ने के लिए समुद्र में और आगे जाना पड़ता है." क्लार्क पर्यावरण में कई बदलाव देख रहे हैं जैसे अक्सर आते तूफान, भूस्खलन, पीने के पानी में खारापन और समुद्र का अम्लीकरण. ऑस्ट्रेलिया की ढाई करोड़ की आबादी में आदिवासियों और टोरेस की खाड़ी के द्वीपों में रहने वाले लोगों की तादाद सिर्फ ढाई प्रतिशत है. वे विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति का हिस्सा हैं. वे पीढ़ियों से धरती के साथ सामंजस्य में रहते आए हैं. क्लार्क की शिकायत है, "अब गन्ने और केले के खेतों में डाले गए खाद नदियों और समुद्रों में आ रहे हैं और खाने के चक्र में शामिल हो रहे हैं."

बढ़ते तापमान और चढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण आदिवासी लोगों को और नुकसान उठाने और अपने परंपरागत घरों से बेघर होने का डर सताता है. ऑस्ट्रेलिया के मानवाधिकार आयोग में आदिवासियों के लिए सामाजिक न्याय कमिश्नर मिक गूडा कहते हैं, "हमने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी पर्यावरण शरणार्थियों को देखा है." 1940 के दशक में समुद्री तूफान के कारण न्यू गिनी के निकट द्वीपों पर बाढ़ आ गया था और आदिवासियों को हटा कर ऑस्ट्रेलिया की मुख्य भूमि पर पहुंचाया गया था. 20वीं सदी में दुनिया भर में समुद्री जल स्तर 1.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ा है. 1990 के दशक से उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में यह 7.1 मिलीमीटर था.

आदिवासियों का दिल और उनकी आत्मा उनके पुरखों के देश में बसती है. डावसन घाटी की गंगुलू जनजाति के गूडा कहते हैं, "विस्थापन का उनके सामाजिक और भावनात्मक सुख पर नाटकीय असर होता है." पुरखों की भूमि से विस्थापन का असर संस्कृति, स्वास्थ्य और खान-पान के संसाधनों पर पड़ता है. पानी का आदिवासियों के लिए 60,000 साल से बहुत महत्व रहा है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया गर्म हो रहा है और सूख रहा है. 2013 का साल ऑस्ट्रेलिया के लिए अब तक का सबसे गरम साल था. अधिकतम तापमान औसत से 1.45 डिग्री सेंटीग्रेड ज्यादा और न्यूनतम तापमान औसत से 0.94 सेंटीग्रेड ज्यादा.

दूसरी ओर बरसात में ज्यादा बारिश हो रही है. क्वींसलैंड के एक छोटे से शहर मिशन बीच में हाल में एक रात में 300 मिलीमीटर बारिश हुई. ट्रॉपिकल इलाकों का बदलता मौसम आदिवासियों के जीवन पर असर डाल रहा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि मौसम में बदलाव का समुदायों के जीवन, सांस्कृतिक दस्तूरों, स्वास्थ्य और हालचाल पर नकारात्मक असर होगा. इकोसिस्टम साइंसेज की विशेषज्ञ डॉक्टर रोजमरी हिल कहती हैं, "आदिवासी इलाकों में घर, पानी, सीवेज और रोड जैसी संरचनाओं की खराब हालत और बिगड़ेगी." साथ ही बीमारियों में इजाफे का भी खतरा है.

पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी संगठन सरकार से आदिवासियों के साथ जलवायु पर सहयोग की नई संरचना बनाने की मांग कर रहे हैं ताकि प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन पर उनके ज्ञान से फायदा उठाया जा सके. ऑस्ट्रेलिया यूथ क्लाइमेट कोलिशन की केली मैकेंजी कहती हैं, "जलवायु परिवर्तन का सामना करने और देश की सुरक्षा में इतना कुछ है जो हम आदिवासी लोगों से सीख सकते हैं." मैकेंजी का कहना है कि सूरज और हवा से बिजली बनाई जा सकती है और समुदाय, देश और संस्कृति की देखभाल के आधार पर अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है.

ऑस्ट्रेलिया यूथ क्लाइमेट कोलिशन सरकार से ऊर्जा उत्पादन में कोयले जैसे प्राकृतिक खनिजों के इस्तेमाल को रोकने और साफ और अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मांग कर रहा है. आदिवासी नेता तोगियाब मैकरोज एलू कहते हैं, "टोरेस घाटी में ग्लोबल वॉर्मिंग सिर्फ सिद्धांत नहीं है, वह लोगों के दरवाजों पर दस्तक दे रहा है." एक नए आकलन के अनुसार ऑस्ट्रेलिया का उत्सर्जन 2020 तक 1990 के स्तर से 50 फीसदी ज्यादा हो जाएगा. 2000 के स्तर पर 5 फीसदी की कटौती का लक्ष्य यदि 2020 तक हासिल भी हो जाता है तो 1990 के स्तर पर 26 फीसदी का इजाफा होगा.

कोयला ऑस्ट्रेलिया का दूसरा सबसे ज्यादा निर्यात किया जाने वाला सामान है. कोयले के विश्व व्यापार में उसका हिस्सा 30 फीसदी है. प्रधानमंत्री टोनी एबट की सरकार ने कोयले को मानवता के लिए अच्छा बताया है और कार्बन टैक्स को खत्म कर नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों में कमी कर रहा है. लेकिन डॉक्टर हिल ऊर्जा के इस्तेमाल में आदिवासी समुदायों के लिए नई संभावनाएं देखती हैं. उनका कहना है, "जलवायु के हिसाब से ढलना आदिवासी ज्ञान और अनुभव, समझ और लचीलेपन जैसी सांस्कृतिक प्रथाओं तो मजबूत बनाने का मौका देता है."

समुद्री जलस्तर में वृद्धि से शिकार और मछली मारने की प्राकृतिक जगहें समाप्त हो जाएंगी. ये आजीविका के अहम साधन हैं. केप यॉर्क की 58 वर्षीया एलेन प्राइस टिकाऊ उद्योग और इकोटूरिज्म में नए रोजगार बनाने की मांग कर रही है ताकि वे घर के करीब अपने माहौल में रह सकें. उनका कहना है कि आदिवासी युवा लोग पुराने पेड़ों और पशु पक्षियों के बारे में जानकारी खो रहे हैं और यह जानकारी इको सिस्टम की सुरक्षा और उसे बनाए रखने के लिए जरूरी है.

एमजे/एजेए (आईपीएस)