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दुनिया

आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की मुहिम

भारत में आदिवासियों के अधिकारों के लिए सात साल पहले लागू हुआ अहम कानून अब तक नजरअंदाज होता रहा है. जनजातीय मामलों के मंत्री का कहना है कि अब इसके बारे में जागरुकता फैलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ी जा रही है.

भारत में आदिवासियों के अधिकारों के लिए साल 2008 में लागू हुए 'वन अधिकार अधिनियम' का सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जोर शोर से स्वागत किया था. उम्मीद की जा रही थी कि इससे कबायली इलाकों में रहने वालों के जीवन पर सकारात्मक असर पड़ेगा. वे अपने रिहायशी इलाकों की रक्षा कर सकेंगे. लेकिन जनजातीय मामलों के मंत्री जुआल ओराम ने माना है कि यह कानून अभी भी ज्यादातर जगहों पर ठीक से काम नहीं कर रहा है. जंगलों में रहने वाले कई समुदाय शोषण का शिकार हैं और उन्हें अपने घर छोड़कर जाना पड़ रहा है. ओराम ने बताया, "हालांकि बड़ी संख्या में कबायली वन अधिकार अधिनियम के बारे में जानते हैं, लेकिन हम इस बारे में जागरुकता फैलाना चाहते हैं ताकि हर कोई इस बारे में जाने और इसका फायदा उठा सके."

ओराम का मानना है कि हाल के समय में हुए तकनीकी विकास जानकारी फैलाने में मददगार साबित होंगे. यह आसानी से पता किया जा सकेगा कि कौन सा इलाका आदिवासियों के हिस्से में आता है. आदिवासियों की आबादी का बड़ा हिस्सा खाद्य सुरक्षा के लिए इन जमीनों पर निर्भर करता है. तकनीक के इस्तेमाल पर उन्होंने कहा, "इलाके को अलग करने के लिए गूगल मैप के इस्तेमाल से दावेदारी के मामलों का निपटारा आसानी से किया जा सकेगा."

ओराम ने बताया कि केंद्रीय सरकार द्वारा पास किए गए इस कानून को ठीक से लागू करने में 36 राज्य और केंद्रीय शासित प्रदेश नाकाम रहे हैं. उन्होंने कहा, "हमारा देश बहुत बड़ा है. जंगलों के अंदरूनी इलाकों में रह रहे लोगों की जानकारी बहुत सीमित है. और राज्य की दफ्तरशाही जो जागरुकता के लिए जिम्मेदार है, बहुत सुस्त है. ये मुख्य कारण हैं इसके ठीक ने लागू ना होने के."

राज्यों को इस कानून को लागू करने के निर्देश भेज दिए गए हैं. स्थानीय अधिकारियों और मानव अधिकार संगठनों के साथ मिलकर केंद्रीय सरकार वन अधिकार अधिनियम के बारे में जागरुकता बढ़ाने वाली वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित करेगी. वॉशिंग्टन की राइट्स एंड रिसोर्सेस इनीशिएटिव संस्था का कहना है कि वन अधिकार अधिनियम में ताकत है कि वह 15 करोड़ लोगों को 10 करोड़ एकड़ जंगल की भूमि पर अधिकार दिला सके.

भारत के अंदरूनी इलाकों में रहने वाले कबायली समुदायों की स्थिति में सैकड़ों सालों में ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है. वे जीवनयापन के लिए कृषि, पशुपालन और जंगल के फल और पत्तों पर निर्भर करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक इन समुदायों को सबसे बड़ा खतरा इनकी जमीन छिन जाने से है. इनके पास जमीनों के कागज ना होने पर अक्सर ये उद्योगपतियों और बड़े साहूकारों से शोषण का शिकार होते हैं. ओराम के मुताबिक मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि लोग अपने अधिकारों को समझें, बल्कि यह भी है कि जमीनों की दावेदारी के तरीकों को उनके लिए कैसे आसान बनाया जाए.

एसएफ/आरआर (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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