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दुनिया

आतंकवाद की सजा भुगतते कैंसर के मरीज

अमेरिका ने 20 साल पहले सूडान पर आतंकवाद के समर्थन का आरोप लगाते हुए उसपर कई प्रतिबंध लगा दिए थे. अब अमेरिका और यूरोप से पहुंचने वाली दवाओं और उपकरण की कमी से सूडान के अस्पताल अपने मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहे हैं.

अपने कीमोथेरेपी के सेशन के बाद अस्पताल के पलंग पर आराम करते हुए सूडान के बैंकर मोहम्मद हसन वो दिन याद करते हैं, जब डॉक्टरों ने बताया था कि उन्हें कैंसर है. यह हर व्यक्ति के लिए एक बड़ा सदमा है लेकिन सूडान में कैंसर से लड़ने की जंग और भी मुश्किल है. यहां दवाओं तक पहुंच और इलाज, 20 साल पुराने अमेरिकी प्रतिबंध की वजह से और जटिल बना हुआ है.

अस्पताल की नर्स हसन को स्पंज बाथ देने की तैयारी कर रही है इस बीच 30 वर्षीय हसन ने कहते हैं," यह मेरे हनीमून का पहला सप्ताह था, जब मैं बीमार पड़ा और अस्पताल में भर्ती हुआ. मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि यह कैंसर होगा. यह एक असल त्रासदी थी."

पिछले एक साल से हसन खारतूम के रेडिएशन और आईसोटोप्स सेंटर में अपना इलाज कर रहे हैं. यह सूडान का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है.

जीवनरक्षक दवाएं, ड्रग्स और चिकित्सा उपकरण कथित रूप से तो कड़े अमेरिकी व्यापार प्रतिबंधो में शामिल नहीं हैं. लेकिन बैंक के लेनदेन पर प्रतिबंध, तकनीक और दूसरे चीजों के लेनदेन और व्यापार के दूसरे नियम कैंसर रोगियों के इलाज में बड़ी बाधा बनते हैं. इस प्रक्रिया में खारतूम का कैंसर अस्पताल कोई अपवाद नहीं है. अस्पताल की चार में से दो रेडिएशन थेरपी की मशीनें पिछले कई महीनों से खराब पड़ी हैं और उन्हें ठीक करा पाना एक दुःस्वप्न बन गया है.

अस्पताल के महाप्रबंधक खातिर अल-अल्ला कहते हैं कि मशीनों के कई हिस्से अमेरिका या यूरोप से खरीदे जाते हैं. लेकिन राजनैतिक मुद्दों की वजह से उन्हें परेशानियां हो रही हैं. मशीनों या पुर्जों को सीधे निर्माताओं से मंगवाना विदेशों में धन हस्तांतरण पर प्रतिबंध के कारण बहुत बोझिल और असंभव सा हो गया है.

अमेरिका ने इस्लामी आतंकवादी समूहों के कथित समर्थन के लिए 1997 में सूडान पर प्रतिबंध लगा दिए थे. आतंकवादी संगठन अलकायदा का गठन करने वाले ओसामा बिन लादेन 1992 और 1996 के बीच खारतूम में ही रह रहा था.

पिछले कुछ वर्षों में, अमेरिकी प्रशासन ने सूडान पर मानव अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगाते हुए प्रतिबंधों को और कड़ा किया है. हालांकि, अधिकारी कहते हैं अमेरिका और सूडान के रिश्ते पिछले कुछ साल में बेहतर हुए हैं. 12 अक्टूबर को डोनाल्ड ट्रंप सूडान के प्रतिबंध को स्थायी तौर पर हटा लेने की बात पर फैसला भी करने वाले हैं.

पर डॉक्टर कहते हैं कि परेशानियां बनी हुई हैं. खारतूम के अस्पताल में हर महीने कैंसर के करीब 1 हजार नए रोगी पहुंच रहे हैं. इसके अलावा लगभग 500 मरीज लगातार चल रहे इलाज के लिए रोज अस्पताल पहुंचते हैं. खातिर अल-अल्ला कहते हैं कि इलाज के लिए इंतजार का वक्त तीन से चार हफ्ते तक का है जो किसी कैंसर के मरीज के लिए बहुत ज्यादा है.

30 वर्षीय हसन भी अब इंतजार करके उकता गए हैं और बाकी इलाज भारत में कराने की सोच रहे हैं.

खारतूम के ब्रेस्ट केयर सेंटर में भी यही स्थिति है. यह इकलौती ऐसी जगह है जहां स्तन कैंसर का इलाज करने के लिए विशेष सुविधा उपलब्ध है.

गैर-लाभकारी अस्पताल की संस्थापक डॉक्टर हानिया फाडल कहती हैं कि वहां की मैमोग्राफी की मशीन हफ्तों से टूटी पड़ी है. वो कहती हैं, "हमारे यहां इन्हें ठीक करने के लिए लोग नहीं हैं. इन मशीनों को ठीक करने वाले टेक्नीशियन मिस्र या केन्या से आते हैं." यह मशीन स्तन कैंसर का पता लगाने वाला मुख्य उपकरण है. और यह सबसे बड़ी समस्या बनती है जब कोई नया मरीज यहां पहुंचता है.

डॉक्टर कहती हैं कि कई बार स्तन में गांठ का होना मरीज को खुद पता चल जाता है लेकिन दूसरी जांच करना भी जरूरी है. क्योंकि गांठ के बारे में मरीज को खुद मालूम चल जाए ऐसा जरूरी नहीं है और मशीनों के बिना इसे पता लगाना बहुत मुश्किल है. डॉक्टर फाडल का कहना है कि, " आपके दूसरे स्तन पर एक मैमोग्राम होना चाहिए... यह अनिवार्य है."

फाडल की एक 47 वर्षीय मरीज घादा मोहम्मद ने हाल ही में अपनी सर्जरी करवाई थी. वो कहती हैं कि यह एक बड़ी चिंता थी. वह जब चेकअप के लिए वहां पहुंची तो देखा कि मशीन टूटी हुई है. उन्हें डर है क्योंकि यह कैंसर फैल भी सकता है.

एसएस/एनआर(एएफपी)

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