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दुनिया

'आतंकवादियों से समझौता से अफगानिस्तान में शांति'

पाकिस्तान चाहता है कि अमेरिकी नेता अफगानिस्तान में आक्रमक तरीके अपनाने के बजाय वहां के आतंकवादी गुटों से बातचीत करें. अमेरिका इन गुटों को युद्ध के जरिए खत्म करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह नीति कब तक कारगर साबित होगी.

हक्कानी नेटवर्क सहित पाकिस्तान अफगान आतंकवादी गुटों को शांति के लिए राजी करना चाहता है. जाहिर है कि तालिबान का विरोध कर रहे राजनीतिक दल इस तरह की नीति में साथ नहीं देंगे. रॉयटर्स समाचार एजेंसी से बातचीत में अफगानिस्तान के पाकिस्तानी राजदूत मुहम्मद सादिक ने कहा कि अमेरिका को आतंकवादी गुटों से सीधी बातचीत करनी होगी, उन्हें सैन्य हमलों से खत्म करने की कोशिशें ज्यादा काम नहीं आएगी.

तालिबान से समझौता

आने वाले दिनों में अफगान से एक शांति परिषद पाकिस्तान का दौरा करने वाली है. परिषद पाकिस्तान में एक मसौदा पेश करना चाहती है जिसके आधार पर अफगानिस्तान में आतंकवाद खत्म करने के लिए इस्लामाबाद से मदद ली जा सकेगी. अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ाई को 11 साल हो गए हैं. सादिक कहते हैं, "दो साल पहले के मुकाबले अब अफगानों में शांति प्रक्रिया को लेकर ज्यादा सामंजस्य दिख रहा है. लेकिन अब भी ऐसे कई प्रभावशाली लोग हैं जिन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ाई की और जो अब भी तालिबान से बातचीत करने को तैयार नहीं हैं. हम उनके साथ काम कर रहे हैं."

सादिक अफगानिस्तान में कबायली गुटों से बनी नॉदर्न एलायंस की बात कर रहे हैं जिसने 2001 में तालिबान को सत्ता से हटाया. उस वक्त उन्हें अमेरिका से मदद मिली थी. नॉदर्न एलायंस के नेता अब सरकार में अहम पदों पर हैं. अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने इस उच्च स्तरीय शांति परिषद में अलग अलग कबीलों के नेता शामिल हैं जो तालिबान और उसके दुश्मनों में बातचीत को बढ़ावा देंगे.

Pakistan Haqqani Terrorismus USA Protest Demonstration Flash-Galerie

तालिबान और अफगानिस्तान के सैंकड़ों गुटों और समुदायों को एक मेज पर लाना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि 2014 में अंतरराष्ट्रीय सेना अफगानिस्तान से निकलना शुरू करेगी. अफगानिस्तान अब भी बंटा है, अफगान सैनिक देश की सुरक्षा को संभालने की हालत में नहीं है और आम अफगान को डर है कि देश में या तो गृहयुद्ध छिड़ जाएगा या फिर तालिबान दोबारा सत्ता हड़पने की कोशिश करेगा.

पाकिस्तान का रूखा रवैया

तालिबान से समझौता कराने में केवल पाकिस्तान अफगानिस्तान की मदद कर सकता है लेकिन अफगान नेता इस्लामाबाद के रूखे रवैये से परेशान हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तान वादे तो करता है, लेकिन उन्हें निभाने में हर बार चूक जाता है. काबुल का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई हक्कानी नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रही है. इस्लामाबाद ने इन आरोपों को खारिज किया है.

सादिक का कहना है कि सारे आंतकवादी गुटों को मेज पर लाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. लेकिन जहां तक हक्कानी नेटवर्क की बात है, वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरहद से काम करता है और काबुल जैसे शहरों को अपने हमलों का निशाना बनाता है. इस्लामाबाद ने अब तक अमेरिका से हक्कानी नेटवर्क को काबू में लाने की सारी अर्जियों को अनदेखा किया है और कहा है कि बातचीत से ही स्थिरता को लाया जा सकेगा. सादिक के मुताबिक इसकी एक वजह यह है कि आतंकवादी अपने गुट के सदस्यों या नेताओं के मारे जाने के बाद भी उतने ही ताकतवर रहते हैं. उनके कमांडर अगर मारे जाते हैं, तो दो दिन में एक नया कमांडर खड़ा हो जाता है. कहते हैं कि अमेरिका को 1980 के दशक में सोवियत संघ से सीखना चाहिए था. उस वक्त सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, दस लाख लोग मारे गए. इसके बावजूद सोवियत सेनाओं के खिलाफ हिंसा खत्म नहीं हुई.

सही नीति!

अफगानिस्तान की सरकार तालिबान में क्वेटा शूरा गुट के नेताओं से मिलना चाहती है. माना जाता है कि यह गुट पाकिस्तानी शहर क्वेटा से काम करता है और इस्लामाबाद में शांति परिषद भी पाकिस्तान से इन नेताओं के बारे में बात करेगा. पाकिस्तान में तालिबान नेता मुल्लाह अब्दुल घनी बरादर भी कैद है और अफगानिस्तान उसे वापस अपने देश लाना चाहता है ताकि उसकी मदद से तालिबान के और नेताओं को बातचीत के लिए मनाया जा सके.

लेकिन क्या आंतकवादियों से समझौता बुद्धिमानी होगी, सादिक पाकिस्तान के दावे को दोहराते हैं और कहते हैं कि पाकिस्तान और तालिबान एक नहीं हैं. पाकिस्तान तालिबान पर नियंत्रण नहीं करता और न ही उसे पैसे देता है. उनका कहना है कि अफगानिस्तान अगर सारे समुदायों और गुटों को एक साथ सरकार में लाए तो पुराने झगड़े खत्म हो सकते हैं. "सरकार में प्रतिनिधित्व से चरमपंथ को काबू में लाया जा सकेगा, नस्ली समुदायों के आपस में तनाव को कम किया जा सकेगा और गृहयुद्ध को टाला जा सकेगा."

एमजी/ओएसजे(रॉयटर्स)

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