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ब्लॉग

आजादी: आकांक्षाएं तब और आज

आजादी के सत्तर सालों में भारत ने बहुत प्रगति की है, लेकिन गरीबी, अशिक्षा और बीमारी से मुक्त भारत का सपना अधूरा है. कुलदीप कुमार कहते हैं कि गोरखपुर अस्पताल में दर्जनों बच्चों की मौत चीख चीखकर ये हकीकत बयां कर रही है.

60 Jahre Unabhängigkeit von Indien und Pakistan (picture-alliance/dpa)

भारत की आजादी के मौके पर अपने ऐतिहासिक भाषण ट्रिस्ट विद डेस्टिनी में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में शामिल प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की रात को नये भारत की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी थी, "आज रात 12 बजते ही, जब पूरी दुनिया सो रही होगी तब भारत स्वतंत्र जीवन के साथ नई शुरूआत करेगा." उनकी राय में नये राष्ट्र के नेतृत्व और लोगों की चुनौती थी, "भारत के आम लोगों, किसानों और मजदूरों तक आजादी और अवसर लाना, गरीबी, अज्ञान और बीमारी से लड़ना और उन्हें खत्म करना, एक खुशहाल, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र बनाना और ऐसे सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक संस्थान बनाना जो हर पुरुष और महिला के लिए न्याय और जीवन की पूर्णता को संभव बनायें." धर्मनिरपेक्ष भारत के अपने विचार की व्याख्या करते हुए नेहरू ने कहा था, "हममें हर कोई, चाहे वह किसी धर्म का हो, समान अधिकारों, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के साथ समान रूप से भारत का बच्चा है. हम फिरकापरस्ती और संकीर्णता को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता जिसके लोग विचारों और कर्म में संकीर्ण हों."

पूरे भारतीय इतिहास में ब्रिटिश शासन अद्भुत रहा है क्योंकि पहली बार भारत पर ऐसी विदेशी ताकत ने शासन किया जिसकी दिलचस्पी सिर्फ उसके संसाधनों के दोहन, अपने फायदे के लिए बड़े पैमाने पर संपत्ति को हस्तांतरित करने और बांटों और राज करो की नीति पर निर्भर करने में थी. इसलिए 15 अगस्त 1947 को भारत गरीबों, अशिक्षित, और अस्वस्थ नागरिकों का खाली खजाने वाला देश था. उपमहाद्वीप के बंटवारे का नतीजा बड़े पैमाने पर जान माल की बर्बादी के रूप में सामने आया. देश की अर्थव्यवस्था बदहाल थी.

इसके बावजूद भारत एक सार्वभौमिक मताधिकार वाला धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणतंत्र बना और शीघ्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और वित्तीय संस्थानों का निर्माण शुरू हुआ.1947 के बाद की पीढ़ियों की आकांक्षा ऐसे भारत का निर्माण थी जिसके नागरिक शिक्षित, स्वस्थ और खुशहाल हों और जहां जाति और धर्म का भेदभाव न हो.

कुछ हद तक ये लक्ष्य हासिल हुए और भारत विश्व का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कामगारों वाला देश बन गया. वह अपना परमाणु कार्यक्रम बनाने और अपना मंगल मिशन भेजने में सक्षम हुआ. उसकी अर्थव्यवस्था का भी विकास हुआ और वह आज दुनिया की सबसे तेज विकास दर वाला देश है.

लेकिन पिछले सात दशकों में उपनिवेश विरोधी स्वसंत्रता संग्राम के दौरान विकसित आदर्श और मूल्य गुम हो गये हैं. भ्रष्टाचार सब जगह फैल गया है, राजनीति लोगों की सेवा करने की राह होने के बदले पारिवारिक कारोबार हो गया है, धर्मनिरपेक्ष आदर्श फेंक दिये गये हैं और देश पर ऐसी पार्टी का शासन है जो जो न सिर्फ हिंदू समर्थक है बल्कि मुस्लिम और ईसाई विरोधी भी है. धर्मांध हिंदू भीड़ बीफ खाने के संदेह के आधार पर मुसलमानों को मार देती है, विजिलांटे गुटों को खुले में आपसी स्नेह दिखाने वाले जोडो़ं की पिटाई के लिए सरकारी शह मिल रही है. जबकि संविधान धर्म के पालन और प्रचार की छूट हेता है राज्य सरकारें धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून बना रही है. 2 करोड़ रोजगार पैदा करने के वायदे के साथ सत्ता में आई बीजेपी की सरकार का वादा पूरा नहीं हुआ है. स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट लगातार काटा जा रहा है.

भारतीय लोग एक ऐसी सरकार चाहते हैं जो किफायती और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा उपलब्ध करा सके, समाज में शांति कायम करे, युवाओं को लिए रोजगार बनाये. लेकिन उनके चेहरे पर दस्तक देती हकीकत है गोरखपुर से आने वाली खबर जहां ऑक्सीजन की कमी के कारण पांच दिनों में 63 बच्चों की मौत हो गयी है. ये वो भारत नहीं है जो उसके नागरिक देखना चाहते हैं.

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