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ब्लॉग

आखिर कब तक मरते रहेंगे किसान

यह पहला मौका है जब किसी सरकार ने किसानों की समस्या की गंभीरता मानी है. अब तक तो देश में किसानों की आत्महत्या के मामले महज आंकड़े बन कर फाइलों में ही दर्ज होते रहे हैं.

आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान दिल्ली में सरेआम पेड़ से लटक कर अपनी जान देने वाले राजस्थान के एक किसान की मौत के बाद देश में किसानों की आत्महत्या का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. इसके बाद यह मामला संसद में भी गूंजा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि किसानों की समस्या की जड़ें बेहद गहरी हैं और इनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है.

हर 30 मिनट में एक आत्महत्या

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और यहां की 80 फीसदी आबादी खेती पर ही निर्भर है. बावजूद इसके देश में यह क्षेत्र सबसे पिछड़ा है. किसानों की समस्याओं पर ध्यान देने की फुर्सत न तो किसी सरकार को है और न ही किसी राजनीतिक पार्टी को. हां, उनकी आत्महत्या के मामले अक्सर विपक्षी दलों के लिए सरकार पर हमले का हथियार जरूर बन जाते हैं. आंकड़ों के आईने में यह समस्या काफी गंभीर नजर आती है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, वर्ष 1995 से 2013 के बीच तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. वर्ष 2012 में 13,754 किसानों ने विभिन्न वजहों से आत्महत्या की थी और 2013 में 11,744 ने.

एक अनुमान के मुताबिक देश में हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या करता है. यानि अन्नदाता की भूमिका निभाने वाला किसान अब अपनी जान भी बचाने में असमर्थ है. वर्ष 2014 में भी आत्महत्या की दर में तेजी आई है. इस दौरान 3,144 मामलों के साथ महाराष्ट्र लगातार 12वें वर्ष भी पहले स्थान पर बना हुआ है.

बस आंकड़ों की बाजीगरी

केंद्रीय खुफिया विभाग ने भी हाल में किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. उसमें कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की वजह प्राकृतिक भी है और कृत्रिम भी. इनमें असमान बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई की दिक्कतों, सूखा और बाढ़ को प्राकृतिक वजह की श्रेणी में रखा गया था तो कीमतें तय करने की नीतियों और विपणन सुविधाओं की कमी को मानवनिर्मित वजह बताया गया था. लेकिन इस रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आखिर इस समस्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है. जाहिर है सरकारी एजेंसी की यह रिपोर्ट आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं है.

देश के जिन राज्यों में यह समस्या सबसे गंभीर है उनमें महाराष्ट्र तो पहले नंबर पर है ही, उसके बाद पंजाब, गुजारत, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु का स्थान है. इन राज्यों में साल-दर-साल आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. किसानों की समस्याएं और उनके आत्महत्या के मामले कुछ दिनों के लिए सुर्खियों में रहते हैं. सरकारें छोटा-मोटा मुआवजा देकर या राहत पैकेज का एलान कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती हैं. नतीजतन समस्या जस की तस रहती है और आत्महत्या का यह चक्र जारी रहता है. बस चेहरे बदलते रहते हैं.

एक ही उपाय, मौत

आखिर किसानों की बढ़ती आत्महत्या की वजहें क्या है? मोटे तौर पर इसकी जो वजहें हैं उनमें मानसून का बदलता मिजाज प्रमुख है. तमाम आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद तथ्य यह है कि ज्यादातर किसान अब भी फसलों की बुवाई और सिंचाई के मामले में बारिश पर ही निर्भर हैं. लेकिन बीते कोई डेढ़ दशक से मौसम के लगातार बदलते मिजाज और बेमौसमी बरसात ने उनकी तबाही के रास्ते खोल दिए हैं. कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश उनकी तबाही की वजह बन जाती है तो कहीं बेमौसम बारिश फसलों की काल बन जाती है. सूखा और बाढ़ की समस्या तो लगभग हर साल सामने आती है.

इसके अलावा कर्ज का लगातार बढ़ता चक्र भी एक अहम वजह है. बैकों से कर्ज की खास सुविधा नहीं होने की वजह से किसानों को बीज, खाद और सिंचाई के लिए पैसों की खातिर महाजनों और सूदखोरों पर निर्भर रहना पड़ता है. यह लोग 24 से 50 फीसदी ब्याज दर पर उनको कर्ज देते हैं. लेकिन फसलों की उपज के बाद उसकी उचित कीमत नहीं मिलने की वजह किसान पहले का कर्ज नहीं चुका पाता. वह दोबारा नया कर्ज लेता है और इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के भंवरजाल में फंसती रहती है. आखिर में उसे इस समस्या से निजात पाने का एक ही उपाय सूझता है और वह है मौत को गले लगाना.

कीमतें तय करना जरूरी

विडंबना यह है कि बंपर फसल भी किसानों के लिए जानलेवा होती है और फसलों की बर्बादी भी. कपास और गन्ना जैसी नकदी फसलों के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत पड़ती है. लेकिन उपज से लागत भी नहीं वसूल हो पाती. यही वजह है कि आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं इन नकदी फसलों वाले राज्यों में ही होती हैं. फसल पैदा होने के बाद उनकी खरीद, कीमतें तय करने की कोई ठोस नीति और विपणन सुविधाओं का अभाव किसानों के ताबूत की आखिरी कील साबित होते हैं.

तो आखिर इस समसया पर अंकुश लगाने का कारगर तरीका क्या है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक विपदाओं पर काबू पाना तो किसी के वश में नहीं है. लेकिन फसल पैदा होने के बाद उनकी कीमतें तय करने की एक ठोस और पारदर्शी नीति जरूरी है ताकि किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत मिल सके. इसके अलावा विपणन सुविधाओं की बेहतरी और खेती के मौजूदा तौर-तरीकों में आमूल-चूल बदलाव जरूरी हैं. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को विभिन्न सहकारी कृषक समितियों के साथ मिल कर इस दिशा में ठोस कदम उठाना होगा. उसी हालत में किसानों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकेगा.

ब्लॉगः प्रभाकर

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