आखिरी टेलीग्राम राहुल के नाम | दुनिया | DW | 15.07.2013
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दुनिया

आखिरी टेलीग्राम राहुल के नाम

भारत के लिए भावनात्मक तौर पर बेहद खास लेकिन पिछले दिनों में बेकार हो चुकी टेलीग्राम सेवा खत्म कर दी गई. याद रखने के लिए यह काफी है कि आखिरी संदेश राहुल गांधी के नाम गया.

भारत में रविवार रात करीब पौने बारह बजे टेलीग्राम सेवा को पूरी तरह बंद किया गया और इससे कुछ ही समय पहले किसी ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को संदेश भेजा.

भारतीय डाक के अधिकारियों ने बताया कि नई दिल्ली के जनपथ टेलीग्राफ ऑफिस में किसी अश्विनी मिश्रा ने दो संदेश भेजे. इनमें से एक राहुल गांधी के नाम और दूसरा दूरदर्शन न्यूज के महानिदेशक एसएम खान के नाम रहा.

भले ही पिछले दिनों में किसी ने टेलीग्राम की तरफ रुख भी न किया हो लेकिन आखिरी दिन इसके मार्फत संदेश भेजने वालों का तांता लग गया. इससे 68,837 रुपये का राजस्व हासिल हुआ.

टेलीग्राफ के वरिष्ठ महानिदेशक शमीम अख्तर ने अंतिम दिन की तैयारियों के बारे में बताया, "हमने लोगों की भीड़ को देखते हुए अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ा दी है. हम आखिरी टेलीग्राम रविवार 10 बजे लेंगे और सभी संदेशों को उसी वक्त या अगले दिन तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे." हालांकि भीड़ की वजह से रात 10 बजे की डेडलाइन भी बढ़ानी पड़ी और कई लोगों के फॉर्म जमा करा लिए गए, जिनके संदेश रविवार को नहीं पहुंचाए जा सके.

इस काम के लिए सभी डाक कर्मचारियों की छुट्टी रद्द कर दी गई. टेलीग्राम भेजने का कम से कम खर्च 29 रुपये हुआ करता था.

रविवार को कई लोगों ने पहले टेलीफोन पर अपने दोस्तों और चाहने वालों का डाक का पता पूछा और उसके बाद टेलीग्राम की लाइन में लग गए. टेलीग्राम भेजने की इंचार्ज रंजना दास का कहना है, "मैंने ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी थी. कई लोग तो एक बार में 20-20 टेलीग्राम भेज रहे हैं. अगर ऐसी ही भीड़ और दिनों में भी दिखती, तो इस सेवा को कभी खत्म नहीं किया जाता."

आखिरी दिन टेलीग्राफ से संदेश भेजने वालों की भीड़ लगी रही

आखिरी दिन टेलीग्राफ से संदेश भेजने वालों की भीड़ लगी रही

भारत में 1850 में पहली बार टेलीग्राम सेवा शुरू हुई, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता से प्रयोग के तौर पर एक टेलीग्राम भेजा. बाद में उसने इसे अपने इस्तेमाल में लाना शुरू कर दिया. चार साल बाद 1854 में इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया. पिछली शताब्दी में इसका जम कर इस्तेमाल हुआ और 1980 के दशक में तो कई बार एक एक दिन में छह छह लाख टेलीग्राम भेजे गए. इनमें से ज्यादातर सरकारी तार हुआ करते थे.

रविवार को जब टेलीग्राम भेजने वालों की लाइन लगनी शुरू हुई, तो कई लोग तो ऐसे थे, जिन्हें 150 साल के इस टेलीग्राम सेवा के बारे में कुछ पता भी नहीं था. वे सिर्फ कौतूहल के मारे पहुंच गए. टेलीफोन, मोबाइल और इंटरनेट एसएमएस के बाद टेलीग्राम सेवा बेकार हो गई थी. इसे चलाते रहने के लिए सरकार को काफी खर्च करना पड़ रहा था, जबकि इसके बदले किसी तरह का राजस्व हासिल नहीं हो रहा था.

हालांकि बदलती तकनीक के साथ टेलीग्राम की तस्वीर भी बदली. बाद के दिनों में संदेश सीधे इंटरनेट से ईमेल के जरिए भेजे जाने लगे. इसे वेब आधारित टेलीग्राफ मेलिंग सर्विस यानी डब्ल्यूबीटीएमएस कहा जाने लगा.

अख्तर ने बताया, "2008 के बाद से टेलीग्राम के कर्मचारियों को दूसरे विभागों में लगाया जाने लगा और अब तो करीब 90 फीसदी कर्मचारी दूसरे विभाग में पहुंच चुके हैं."

रविवार को जब लोगों ने तार को आखिरी विदाई दी, तो किसी ने अपनी मां के लिए यह संदेश भेजा, "यह इतिहास है. इसे संभाल कर रखना मां..."

एजेए/एमजे (पीटीआई, एएफपी)

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