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ब्लॉग

आओ पर्यावरण पर्यावरण खेलें

भारत में प्राकृतिक वन्य संपदा की भरमार है, लेकिन उसकी रक्षा और आबादी के लिए उसके इस्तेमाल पर कोई टिकाऊ कार्यक्रम नहीं. देश पर्यावरण की रक्षा और विकास के चक्रव्यूह में फंसा है.

भारत के नक्शे पर देखें तो बाएं हिस्से में गुजरात और गोवा के नीचे एक लकीर गिरती जाती है, केरल के कन्याकुमारी तक. नक्शे पर दिखती ये लकीर एक 'महान भारतीय भौगोलिक ढलान' भी कही जाती है. सघन हरीतिमा और वन्य संपदा के भरी पट्टी, पश्चिमी घाट. यूनेस्को की सूची में दुर्लभ विश्व धरोहर और जैव विविधता के आठ सबसे प्रमुख विश्व ठिकानों में से एक.

पश्चिमी घाट के पहाड़ प्रायद्वीपीय भारत की पानी की मीनारें हैं. साढ़े 24 करोड़ लोगों को पानी मुहैया कराते हैं और एक बड़े भूभाग को सींचते हैं. लेकिन अंधाधुंध निर्माण और पर्यावरण चेतना के अभाव ने पश्चिमी घाटों की रौनक धीरे धीरे कम की है. माना जाता है कि घाट की प्राथमिक वनस्पति का सात फीसदी हिस्सा ही बचा रह गया, पेड़ पौधों और जानवरों की दुर्लभ नस्लें खत्म हो गई हैं, या हो रही है. इन्हीं सब चिंताओं के मद्देनजर केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ पैनल बनाया था, नाम था वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल. जाने माने पर्यावरणविद माधव गाडगिल इसके एक सदस्य थे. पैनल ने अपनी रिपोर्ट 2011 में दे दी, ये मानते हुए कि राज्य सरकारों, लोगों, उद्योग जगत और केंद्र के बीच इस पर और आगे बहसें होंगी. तब कोई निर्णायक अभियान छेड़ा जाएगा. लेकिन हुआ क्या?

राज्य सरकारों ने टेंटेटिव प्रस्तावों और सुझावों पर ही हो हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि विकास ठप हो जाएगा, उद्योग धंधे बर्बाद हो जाएंगे. बताया जाता है कि इस रुदन के पीछे जोर उद्योग और निवेश लॉबियों का ही था. पैनल के सदस्य हक्केबक्के रह गए. माधव गाडगिल ने अपना आक्रोश जताया कि भाई इसमें इतनी हायतौबा क्यों करते हो, बहस करो, रास्ता निकालो, हमने इलाके को पूरी तरह विकास के लिए प्रतिबंधित करने को थोड़े ही कहा है. गाडगिल का आरोप है कि धैर्यपूर्वक पैनल की सिफारिशों को पढ़े बिना इसे एक तरह से खारिज कर दिए जाने का ही अघोषित अभियान सा छेड़ दिया गया. और पैनल की रिपोर्ट पर धूल पड़नी शुरू भी नहीं हुई कि एक समिति और गठित कर दी गई, हाई लेवल वर्किंग ग्रुप. एक रिपोर्ट के ऊपर दूसरी रिपोर्ट.

पर्यावरणीय चिंता की सरकारी मुहिम का एक नाटकीय अध्याय पूरा हुआ. अब दूसरे अध्याय पर आते हैं. कार्यदल बना तो उसे कोई हेड तो करेगा ही. देश के एटम विज्ञानी और इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन को वर्किंग ग्रुप का इंचार्ज बनाया गया. पर्यावरण के बहुत नाजुक मामले पर तैयार एक विशेषज्ञ रिपोर्ट को परखने के लिए एटम विज्ञानी! हैरान न होइए. कुछ भी संभव है.

गाडगिल पैनल की शिकायत है कि नई कमेटी ने उनसे सलाह लेना तो दूर उलटे आलोचनाएं ही कर दी. विकास और स्थानीय हितों की अनदेखी, पर्यावरण को लोगों की आकांक्षा से नहीं जोड़ा आदि आदि. अब झगड़ा और विवाद ये है कि रिमोट सेंसिंग के चित्रों और आंकड़ों के सहारे अपनी रिपोर्ट सौंपने वाले कस्तूरीरंगन वर्किग ग्रुप ने 37 फीसदी पश्चिमी घाट को ही इको सेंसेटिव मानकर और बाकी 63 फीसदी को किनारे रखकर किस समाज और किस आबादी की आकांक्षा की दुहाई दी या लह परोक्ष रूप से उद्योग और निवेशकों की आकांक्षा को संबोधित हो गई.

स्थानीय जनता की भागीदारी से पर्यावरणीय चिंताओं का हल निकाला जा सकता था लेकिन अब भागीदारी का सवाल ही गडडमड्ड हो गया है. हिमालयी क्षेत्र में भी ऐसी ही एक विवादास्पद स्थिति हो गई है. पिछले दिनों केंद्र ने गोमुख ग्लेशियर से लेकर उत्तरकाशी तक सौ किलोमीटर के इलाके को इको सेंसेटिव जोन घोषित किया है. गाज गिरी है स्थानीय हितों पर. अब राज्य सरकार भी केंद्र से गुहार कर रही है कि ऐसा न करे. उसके लिए वोट की राजनीति आगे है तो लोगों के लिए भविष्य की दुश्चिंता.

ये बड़े विरोधाभासी और अजीबोगरीब नजारे हैं. मिसाल के लिए गंगोत्री से उत्तरकाशी तक इको सेंसेटिव जोन के तहत हर छोटे बड़े निर्माण, उद्योग धंधों और जंगल आवाजाही और खेती किसानी की बंदिश हो जाएगी, तो उधर देश के कई हिस्सों में बेतहाशा खनन जारी है. पहाड़ के पहाड़ और जमीन की जमीन खोदी जा रही हैं खनिजों के लिए, तेल और गैस के लिए, जलबिजली परिजोजनाओं के लिए और कुछ नहीं तो होटल और मॉल के लिए. पश्चिमी घाट को ही देखिए. एक पैनल कहता है कि बस करो, पहाड़ों और संसाधनों पर नजरें न गड़ाओ. आननफानन में दूसरी टीम आती है निवेश की टेर लगाती हुई. उद्योग लाओ, बांध लाओ, जंगल काटो, खनन करो, इतने सारे इको सेंसेटिव जोन का क्या करना.

इसी की एक और विडम्बनापूर्ण मिसाल वो दंडकारण्य है जहां सशस्त्र नक्सली विद्रोह के बीच प्राकृतिक संसाधनों के साथ मरते खपते आदिवासी समूह हैं. विकास की चक्की पर वहां दोहन, शोषण, हिंसा और निजीकरण की कीलें धंसी हैं. अपने ही देश में ये जैसे उपनिवेशी हिस्से हैं. निवेश की कॉलोनियां. कहीं इको सेंसेटिव जोन होगा, कहीं नहीं होगा, कहीं थोड़ा होगा कहीं ज्यादा होगा, अंततः स्पेशल इकोनमी जोन होता चला जाएगा. ह्यूमन सेंसेटिव जोन यानी मानवीय संवेदनशीलता का जोन आप किसी भूगोल में नहीं पाएंगे, न किसी पर्यावरण में. इतनी निराशा और हृदयहीनता का जोन हर ओर फैल जाएगा.

उदारीकरण के भाग पांच में जो कुछ हो रहा है, उसमें ये कैसी हैरानी. अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में प्रधानमंत्री राजीव गांधी से शुरू हुआ सिलसिला नब्बे के दशक में नरसिम्हा राव से आगे बढ़ता हुआ, 21वीं सदी की शुरुआत में अटल बिहारी वाजपेयी तक आता हुआ और फिर मनमोहन सिंह के दो कार्यकाल तक खिंचता हुआ. भाग छह की भयावहता बताने के लिए भी हम शायद लौटें. आखिर हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक कितना संपन्न और बहुत सारा भूगोल है हमारे इस देश का. पर्यावरण दिवस की तरह निवेश कोई एक दिन का कार्यक्रम तो है नहीं!

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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