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ब्लॉग

आईसिस के डर के रडार में भारत

अल कायदा के बाद अब अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चिंता के रडार में आईसिस का नाम है. ये आतंकी गिरोह इराक और सीरिया से बाहर अपना मनोवैज्ञानिक असर डालने में कमोबेश सफल नजर आता है. भारत भी इस असर से अछूता नहीं.

आईसिस जैसे दुर्दांत आतंकी गिरोह की भारत में कोई पैठ हो पाई है, इसे लेकर तो कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है लेकिन ये साफ है कि हाल में कश्मीर में आईसिस का झंडा लहराने और देश के कुछ हिस्सों से कुछ युवाओं के सीरिया जाने की खबरों ने सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया है. और ऐसी यात्राओं पर अब बारीकी से निगाह रखी जा रही है. हाल में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी, एनएसए के प्रमुख आईसिस के संभावित हमले की चिंता जाहिर कर चुके हैं. इस कट्टर और हिंसक गुट का मकसद है कि किसी भी कीमत पर इस्लामी राज्य का निर्माण.

इस तरह के छाया गुटों का अचानक प्रकट होकर पूरी दुनिया में एक बड़ा खतरा बन जाना हैरानी पैदा करता है. अमेरिका की अपनी नीतियां भी ऐसे गुटों को जन्म देने का एक कारण बनी हैं. चाहे वो इराक का विध्वंस हो या अफ़गानिस्तान में युद्ध या उसके बंदी शिविर. वो एक खौफ को मिटाने का दावा करता है तो दूसरा खौफ आ जाता है. आईसिस के उदय और इसकी पूरी रणनीति और संरचना को ध्यान से देखें तो इस लिहाज से ये अल कायदा से भी ज्यादा असरदार निकला है. इसने युवाओं के मनोविज्ञान पर असर डालकर अपना जाल फैलाया है.

ये एक बहुत खतरनाक ट्रेंड है. इस तरह की कुछ खबरें भारत से भी आई थीं, हालांकि सरकार ने कूटनीतिक संयम दिखाते हुए ऐसी खबरों को ज्यादा तूल देना उचित नहीं समझा. भारत में आईसिस का खतरा कितना बड़ा है इस बारे में कोई वॉल्यूम के आधार पर जवाब शायद ही दे पाए. हां ये जरूर है कि आतंकी हमलों के इतिहास वाले देश में ऐसे किसी गिरोह की फिर से छाया पड़ जाने की संभावना से पूरी तरह इंकार तो कोई भी नहीं करेगा. इसी आशंका के आधार पर ही सुरक्षा एजेंसियां अपनी रणनीति बनाती हैं और तैयारियां रखती हैं. खतरा कम हो या ज्यादा, सुरक्षा तो चाकचौबंद रखनी ही होगी. भारत के मामले में ऐसा ही है. भले ही फौरी तौर पर आईसिस का खतरा उस पर न हो लेकिन चूंकि वैश्विक स्तर पर इस गुट के खिलाफ एक बड़ी हलचल बनी हुई है और दुनिया का सबसे बड़ा देश उसके खिलाफ युद्ध का एलान कर चुका है, लिहाजा भारत के लिए सुरक्षा और कूटनीति दोनों स्तरों पर जरूरी है सावधान रहना.

भारत को आईसिस को लेकर सजग इसलिए भी रहना होगा क्योंकि ऐसे गिरोह अशांति फैलाने के छोटे बड़े मॉडयूलों पर काम करते ही रहेंगे. ये कोई छिपी बात नहीं है कि भारत एक बड़ी मुस्लिम आबादी का देश है और यहां शर्मनाक सांप्रदायिक तनाव का इतिहास रहा है जहां अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी हुई है और आईसिस जैसे गिरोह ऐसे ही नाजुक इतिहास या घटनाओं के सहारे फलते फूलते हैं.

मुंबई हमलों के दौरान सुरक्षा चूक, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ा सबक है. निश्चित रूप से उनकी तैयारियों में बड़ा बदलाव आया है और किसी भी संभावित घुसपैठ को न्यूट्रालाइज करने में वह पहले से ज़्यादा सक्षम हुई हैं. फिर भी इस चिंता के निदान का जिम्मा अकेले सुरक्षा एजेंसियों का नहीं है. सरकार और दूसरी संस्थाओं को भी हरकत में रहना चाहिए. उन्हें आगे बढ़कर उन चीजों की शिनाख्त करनी चाहिए जो समाज में विद्वेष और नफरत फैलाती हैं. सामाजिक स्तर पर डर और अलगाव न पनपे, इसके लिए सरकार को अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास बहाली का काम तेजी से करना होगा. हर किसी को संदिग्ध मान लेने की अधिकांश बहुसंख्यकों की मानसिकता पर भी नकेल कसने की जरूरत है.

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