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दुनिया

आईटी क्षेत्र पर अनिश्चय के बादल

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट अभियान के कारण 150 अरब डॉलर वाला भारतीय आईटी उद्योग भी दबाव में है. इस समय भारतीय कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है.

‘इंजीनियरिंग की पढ़ाई के अंतिम साल के दौरान कैंपस प्लेसमेंट में नौकरी मिल जाने से घरवालों से लेकर तमाम परिजनों में खुशी की लहर दौड़ गई थी. डिग्री पूरी होने के बाद नौकरी ज्वायन की. पहले तीन महीने तो ट्रेनिंग में निकल गए. लेकिन उसके बाद तीन-चार महीनों तक खाली बैठे रहे. दफ्तर में कोई काम ही नहीं था. अब इस महीने के पहले सप्ताह में आए एक मेल से मेरी नौकरी चली गई. अब समझ में नहीं आ रहा है कि घरवालों और परिचितों से क्या कहूं?'—यह आपबीती पुणे में एक प्रतिष्ठित सूचना तकनीक (आईटी) कंपनी में नौकरी करने वाली बिहार की विशाखा (बदला हुआ नाम) की है. बेहतर भविष्य का संपना संजोए पुणे, बंगलूरु, चेन्नई और हैदराबाद पहुंचे विशाखा जैसे हजारों लड़के-लड़कियों की कहानी मिलती-जुलती है. तेजी से बढ़ते ऑटोमेशन और घटते प्रोजेक्ट्स की वजह से उनके सपने रंग भरने से पहले ही मुरझा गए हैं. विभिन्न कंपनियों ने हाल में हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है.

वर्ष 2008-09 की वैश्विक मंदी के बाद भारत के सूचना तकनीक (आईटी) क्षेत्र पर एक बार फिर संकट के बादल गहरा रहे हैं. देश की तमाम प्रमुख साफ्टवेयर कंपनियों का मुनाफा गिरा है और उनमें छंटनी का नया दौर शुरू हुआ है. अंतर यह है अबकी छंटनी की गाज मझौले स्तर के वैसे कर्मचारियों पर गिर रही है जो 10 या 20 साल से नौकरी कर रहे हैं. साफ है कि कंपनियां खर्च घटा रही हैं क्योंकि वरिष्ठ कर्मचारियों का वेतन लाखों में होता है. इसके साथ ही नई नौकरियों में भी कटौती हुई है. कैंपस प्लेसमेंट के दौरान भर्ती होने वाले आधे से ज्यादा लोग दफ्तर में खाली बैठे समय बिता रहे हैं. इसकी वजह यह है कि उन कंपनियों के पास नए प्रोजेक्ट्स ही नहीं हैं.  

मझौले कर्मचारियों पर गाज

अबकी आईटी क्षेत्र में आठ से 20 वर्षों से काम करने वाले मझौले कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा गाज गिर रही है. मोटे अनुमान के मुताबिक सूचना तकनीक क्षेत्र में ऐसे 14 लाख कर्मचारी हैं जिनका सालाना वेतन 15 से 18 लाख के बीच है. ऑटोमेशन और नवीनतम तकनीक की चुनौतियों से जूझ रही आईटी कंपनियां खर्च घटाने के लिए ऐसे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा रही हैं. हाल के महीनों में विप्रो, इंफोसिस, टेक महिंद्रा और काग्निजेंट जैसी प्रमुख आईटी कंपनियों ने हजारों की तादाद में छंटनी की है. मझौले स्तर के कर्मचारियों की बजाय अब प्रोजेक्ट्स में नए कर्मचारियों को तरजीह दी जा रही है. इसकी वजह यह है कि पुराने कर्मचारी जहां नई तकनीक के बारे में सीखने की उत्सुकता नहीं दिखाते वहीं नए लड़के-लड़कियों में सीखने की ललक रहती है.

आईटी कंपनी माइंडट्री के सीईओ रोस्टोव रावनन कहते हैं, "हाल के वर्षों में इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकलने वालों में डिजिटल तकनीक के प्रति उत्सुकता रहती है. वह नई तकनीक सीखने का प्रयास करते हैं. उनके काम का नतीजा भी शीघ्र मिलता है." टेक महिंद्रा कंपनी ने इसी महीने एक हजार कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया है. कंपनी के एक प्रवक्ता कहते हैं, "हम हर साल प्रदर्शन के आधार पर कर्मचारियों की छंटनी करते रहते हैं. यह साल भी अलग नहीं है." 31 दिसंबर, 2016 तक कंपनी के कुल कर्मचारियों की तादद 1,17,095 थी जबकि सॉफ्टवेयर डिवीजन में यह तादाद 80,858 थी.

इससे पहले बीते अप्रैल में विप्रो ने भी कामकाज की समीक्षा के बाद पांच सौ कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. दूसरी ओर, अमेरिका में सूचीबद्ध आईटी कंपनी काग्निजेंट अपने कर्मचारियों की तादाद में कम से कम पांच फीसदी कटौती की योजना बना रही है. यह आंकड़ा दस हजार के आसपास है. कंपनी ने बीते सप्ताह अपने वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए एक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना शुरू की है. पूरी दुनिया में कंपनी के 2.60 लाख कर्मचारी हैं और इनमें 75 फीसदी भारत में ही हैं. इंफोसिस में भी कर्मचारियों के प्रदर्शन की समीक्षा की प्रक्रिया जारी है और कंपनी कम से कम एक हजार कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा सकती है.

बदलती भूमिकाएं

आईटी कंपनियों में आठ से 20 वर्षों से काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका तेजी से बदल रही है. जो काम पहले इन अनुभवी कर्मचारियों को सौंपा जाता था वह अब मशीनों से होने लगा है. मिसाल के तौर पर आईटी कंपनी केपजेमिनी आईबीएम की ओर से तैयार वाटसन नामक टूल के जरिए प्रोजेक्ट्स के लिए कर्मचारियों को चुन रही है. इसी तरह इंफोसिस में भी मशीन से सीखने का एक प्लेटफार्म बन रहा है. प्रोजेक्ट मैनेजर इसकी सहायता से किसी प्रोजेक्ट के लिए जरूरी कर्मचारियों का चयन और उसके पूरा होने का समय तय कर सकते हैं.

एक प्रमुख कंपनी के मानव संसाधन विभाग के प्रमुख के. हरिहरन कहते हैं, "आगे विभिन्न कंपनियों के विलय की प्रक्रिया शुरू होगी. लेकिन इसमें कर्मचारियों का भारी नुकसान होगा." उनके मुताबिक इस कवायद में कम से कम 25 हजार नौकरियों पर खतरा पैदा होगा.

सलाहकार फर्म एडवाइजरी सर्विसेज एंड टेक्नोलॉजी के पार्टनर मिलन सेठ कहते हैं, "आईटी कंपनियों की चेन में मझौले स्तर के कर्मचारी ही सबसे कमजोर कड़ी हैं. शीर्ष प्रबंधन को तो बदलावों के बारे में पता है और सबसे निचले स्तर के कर्मचारियों में सीखने की काफी लगन होती है. लेकिन मझौले स्तर के कर्मचारी बदलावों के अनुरूप खुद को ढालने का प्रयास ही नहीं करते." वह कहते हैं कि तेजी से होने वाले ऑटोमेशन और नई तकनीक की वजह से पूरा सिस्टम भारी दबाव में है. ऐसे में हजारों नौकरियां तो जाएंगी ही. इसका असर अब नजर भी आने लगा है.

सलाहकार फर्म मैकेंजी की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया था कि सूचना तकनीक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 37 लाख कर्मचारियों में से आधे लोग अगले तीन-चार साल में अप्रासंगिक हो जाएंगे. आईटी कंपनियों के संगठन नैसकॉम ने भी कहा है कि डिजिटलीकरण के बढ़ते असर से निपटने के लिए नए और पुराने तमाम कर्मचारियों को प्रासंगिक बने रहने के लिए स्व-प्रशिक्षण पर जोर देना होगा ताकि वे लगातार होने वाले नवीनतम बदलावों से अवगत रह सकें.

नौकरी मुहैया कराने वाली वेबसाइट नौकरी डॉट कॉम के चीफ सेल्स आफिसर वी. सुरेश कहते हैं, "अगले कुछ महीनों तक नौकरी का बाजार डांवाडोल रहेगा. उसके बाद फिर स्थिति में सुधार आएगा." फिलहाल गूगल सर्च पर भी देश में सबसे ज्यादा लेआफ यानी छंटनी शब्द की ही तलाश की जा रही है. आईटी क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च से अप्रैल के दौरान इस क्षेत्र के कर्मचारी अपनी नौकरियों को लेकर आशंकित रहते हैं. तमाम कंपनियों में इसी दौरान कामकाज की समीक्षा होती है और फिर कर्मचारियों की छंटनी की जाती है. विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी और इस क्षेत्र की चमक दोबारा जल्दी ही लौटेगी.

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