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ब्लॉग

आईएस के खिलाफ लड़ाई में ईरान और अमेरिका

इस्लामी कट्टरपंथी आईएस के खिलाफ संघर्ष एकमात्र ऐसी बात नहीं है जो ईरान और पश्चिमी देशों को जोड़ती है. मथियास फॉन हाइन का कहना है कि इस अनछुई राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

रियालपोलिटिक का एक सिद्धांत है, "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है." इस तरह जब ब्रसेल्स में अमेरिका के निमंत्रण पर 60 देशों के प्रतिनिधि मिले तो ईरान को मेहमानों की लिस्ट में होना चाहिए था. ईरान भी इस्लामिक स्टेट आईएस के खिलाफ लड़ रहा है. संभवतः लड़ाकू विमानों की मदद से. अमेरिका ने इस तरह की रिपोर्टों की पुष्टि की है, जिसका ईरान ने खंडन किया है. यह दिखाता है कि मध्यपूर्व में चीजें इतनी आसान भी नहीं जहां दुश्मन का दुश्मन जल्द ही दोस्त का दुश्मन बन जाता है.

इस मामले में अमेरिका, पश्चिम और पूरे विश्व समुदाय के साथ आईएस ईरान का भी दुश्मन है. लेकिन इस्लामी ईरान अमेरिका के दोस्त इस्राएल और सउदी अरब का भी दुश्मन है. दूसरी ओर ईरान (अमेरिका के) दुश्मन यानि सीरिया का भी दोस्त है. सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद रूस और ईरान की मदद से सालों से चल रहे गृहयुद्ध को धता बताकर सत्ता में जमे हुए हैं. और कभी कभी देश दोस्त से दुश्मन भी बन जाते हैं. जिन विमानों से ईरान ने आईएस के ठिकानों पर हमला किया है वे अमेरिका में बने हैं. एफ4 फैंटम विमान अमेरिका ने ईरान को तब दिए थे जब ईरान में अमेरिका के दोस्त शाह का शासन था.

इराक में प्रभाव

इस बात के संकेत हैं कि ईरान ने सचमुच जिहादियों के खिलाफ विमानों का इस्तेमाल किया है. सालों से ईरान इराक में अपनी स्थित मजबूत कर रहा है. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास विदेशी अभियानों के लिए एक विशेष टुकड़ी अल कुद्स ब्रिगेड है जिसके प्रमुख की गर्मियों में इराक से तस्वीर आई थी. ईरान की सक्रियता के कारण साफ हैं. आईएस के आगे बढ़ने से इराक में ईरान के प्रभाव को खतरा पहुंचता है. इसके अलावा सुन्नी जिहादी संगठन इराक में शिया धर्मस्थलों को नष्ट करने की धमकी दे रहा है.

Deutsche Welle Chinesische Redaktion Matthias von Hein

मथियास फॉन हाइन

शिया बहुल ईरान के लिए यह स्वीकार्य नहीं है. जून में इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल पर आईएस के कब्जे के बाद अमेरिका को हवाई हमले के साथ अपने साथी इराक की मदद करने आने में दो महीने लग गए. ईरान ने इतनी देर नहीं लगाई. उसने तुरंत हथियारों की आपूर्ति की और सैनिक सलाहकारों ने जरूरत के वक्त में इलाके में ईरान का प्रभाव बढ़ाया. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने समझ लिया है कि मध्यपूर्व में ईरान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसलिए अक्टूबर में उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता को अपना चौथा पत्र लिखा था.

अमेरिका में शिक्षित मंत्री

ओबामा ने अक्टूबर के अपने इस पत्र में ईरान को भरोसा दिलाया था और आईएस के खिलाफ लड़ाई में सहयोग की पेशकश भी की थी. लेकिन यह मदद परमाणु विवाद में सहमति की शर्त से जुड़ी हुई थी. नवंबर के अंत में यह सहमति नहीं हो पाई जिस पर वाशिंगटन और तेहरान में विरोध रहा. तेहरान के हार्डलाइनर अमेरिका के साथ नजदीकी के खिलाफ हैं तो अमेरिका, इस्राएल और सउदी अरब में अनुदारवादी ईरान को अलग थलग रखना चाहते हैं. इसलिए इस समय आईएस के खिलाफ दो समानांतर सैनिक अभियान चल रहे हैं. दोनों पक्ष इस पर जोर दे रहे हैं कि उनमें कोई सहयोग नहीं हो रहा है. लेकिन माना जा सकता है कि पृष्ठभूमि में बगदाद दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर रहा है.

मध्यपूर्व इतना अहम और अस्थिर है कि इलाके में सक्रिय किरदारों को एक दूसरे से बात करनी चाहिए. अब समय आ गया है कि ईरान आगे आए और कट्टरपंथी हार्डलाइनरों को दरकिनार करे. इसके लिए सर्वोच्च नेता अल खमेनेई को अपनी छाया से बाहर निकलना होगा. कैबिनेट में वैसे भी ऐसे लोग हैं जो अमेरिका को बड़ा शैतान नहीं समझते. यह इतिहास की विडंबना है कि ईरानी सरकार में सात ऐसे मंत्री हैं जिन्होंने अमेरिका की प्रमुख यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई की है. अमेरिका के अलावा किसी और देश की सरकार में अमेरिकी डिग्रियों वाले इतने मंत्री नहीं हैं.

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