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दुनिया

आईआईटी के छात्र क्यों कर रहे हैं आत्महत्या

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश पाना एक सपना होता है. लेकिन हाल में आईआईटी परिसर में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं ने अब इन संस्थानों के प्रबंधन को सकते में डाल दिया है.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में दाखिला बेहतर भविष्य की गारंटी माना जाता है. लेकिन आईआईटी परिसर में बढ़ते आत्महत्या के मामलों से चिंतित प्रबंधन अब इस पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस पहल कर रहा है. आईआईटी, खड़गपुर में इस साल अब तीन छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. इनमें से दो घटनाएं तो एक पखवाड़े के भीतर ही हुई हैं.

बढ़तीघटनाएं

एक पखवाड़े में इस दूसरी आत्महत्या से आईआईटी, खड़गपुर के छात्रों में आतंक है. केरल के चौथे वर्ष के छात्र निधि एन. ने बीते सप्ताह अपने गले में फांसी का फंदा डाल कर आत्महत्या कर ली. उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा था, "मुझे सोने दो". उसे शुक्रवार को परीक्षा देनी थी. लेकिन उस दिन वह अपने हॉस्टल के कमरे से बाहर ही नहीं आया. बाद में दूसरे छात्रों ने उसका शव देखा.

इससे पहले मार्च में आंध्र प्रदेश के एक छात्र ने भी ट्रेन से कट कर जान दे दी थी. पुलिस का कहना था कि उसने मानसिक अवसाद की वजह से आत्महत्या की है. साल की शुरूआत में राजस्थान के एक छात्र लोकेश मीना ने भी ट्रेन से कट कर ही आत्महत्या कर ली थी. और उससे पहले आईआईटी, मद्रास की दो छात्राओं ने भी अपनी जान दे दी थी. अलग-अलग शहरों में स्थित आईआईटी से आत्महत्या की खबरें सामने आने लगी हैं. इससे प्रबंधन सकते में है और उसने इस पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल की है.

आईआईटी, खड़गपुर में मेकैनिकल इंजीनियरिंग के एक छात्र एन श्रीराम कहते हैं, "अब संस्थान और छात्रों को काउंसेलिंग को ज्यादा गंभीरता से लेने का वक्त आ गया है." संस्थान के एक प्रोफेसर कहते हैं कि अब प्रोफेसरों को भी छात्रों से संपर्क बढ़ाना चाहिए ताकि उनको आत्मघाती कदम उठाने से रोका जा सके.

समस्या

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता के बाद आईआईटी में दाखिला पाने वाले छात्रों व उनके अभिभावकों को पहले लगता है कि महज दाखिला मिलते ही सुनहरे भविष्य के दरवाजे खुल गए हैं. लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है. परिसर के भीतर जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता का माहौल होता है. ऊपर से अपने-अपने स्कूलों में टाप पर रहते आए छात्रों को यहां आ कर झटका लगता है. इसकी वजह है कि यहां तो तमाम टापर ही रहते हैं. आईआईटी में पढ़ाई के दौरान महज कक्षा ही नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने का निरंतर दबाव रहता है. यहां आने वाले छात्रों ने स्कूली जीवन में कभी नाकामी नहीं देखी होती है. लेकिन परिसर में उनका पाला इसी शब्द से पड़ता है. कई बार वह सेमेस्टर में पिछड़ जाते हैं तो कई बार प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने में.

खास बात यह है कि आत्महत्या की ज्यादातर घटनाएं आरक्षित कोटे के छात्रों के साथ होती हैं. कोटे के तहत दाखिला मिलने के बाद वे परिसर में पहुंच कर पढ़ाई के दबाव को नहीं झेल पाते. आईआईटी पहुंचने वाले छात्रों पर घर वालों की ओर से भी बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहता है ताकि उनको करोड़ों का पैकेज मिल सके. विशेषज्ञों का कहना है कि आईआईटी में छात्रों का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता है. ऐसे में परिसर का अंग्रेजीदां माहौल उनको रास नहीं आता. उनके आत्मविश्वास को ठेस पहुंचती है और वे कॉम्प्लेक्स का शिकार हो जाते हैं. यहां तमाम पढ़ाई अंग्रेजी में होती है. पढ़ाई व दूसरी गतिविधियों के दबाव में एक साथ पढ़ने वाले छात्र भी आपस में बातचीत करने का ज्यादा समय नहीं निकाल पाते.

एक ओर पढ़ाई समेत तमाम क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव, अभिभावकों का दबाव और दूसरी ओर इसकी वजह से लगातार बढ़ते एकाकीपन के चलते कई छात्र पहले नशीली दवाओं का सहारा लेते हैं और फिर धीरे-धीरे मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं. हालांकि तमाम संस्थानों में काउंसेलिंग सेंटर खोले गए हैं. लेकिन छात्रों पर नजदीकी निगाह रखने का कोई तंत्र नहीं होने की वजह से अक्सर शुरूआती दौर में इस समस्या का पता नहीं चल पाता.

अंकुशकीपहल

अब आईआईटी, खड़गपुर ने छात्रों को अवसाद से बचाने की दिशा में ठोस पहल करते हुए कई नये कार्यक्रम तैयार किए हैं. इसके तहत तमाम छात्रों को खुशी के विज्ञान से संबंधित एक पाठ्यक्रम की पढ़ाई करनी होगी. इसके अलावा जंगल में नहाने या समय बिताने की जापानी कला पर भी मामूली बदलाव के साथ अमल किया जाएगा. इसके लिए नेचर थेरेपी का सहारा लिया जाएगा. इस थेरेपी से मानसिक अवसाद पर अंकुश लगाने में सहायता मिलती है. परिसर में स्थित काउंसेलिंग सेंटर लाइफ अंडर कैनोपी नामक एक योजना पर भी काम कर रहा है. इसके तहत छात्रों से परिसर में 12 पेड़ों की शिनाख्त कर उनके नीचे किसी मित्र के साथ तस्वीरें खिंचा कर जमा करना होगा. यह नेचर थेरेपी का ही हिस्सा है.

संस्थान परिसर में स्थित काउंसेलिंग सेंटर की प्रभारी प्रोफेसर संगीता दास भट्टाचार्य बताती हैं, "प्रकृति के साथ समय बिताना दिमाग के लिए अच्छा होता है. इससे तनाव भी घटता है." काउंसेलिंग सेंटर ने अलग फेसबुक पेज भी बनाया है जहां जरूरतमंद छात्रों की समस्याओं पर 24 घंटे के भीतर ध्यान दिया जाता है. काउंसेलिंग की इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार निगाह रखी जाती है और इसमें अभिभावकों को भी शामिल किया जाता है. चरम अवसाद के कुछ मामलों में छात्रों के माता-पिता को तब तक संस्थान परिसर में रहने की अनुमति दी जाती है जब तक संबंधित छात्र को पूरी तरह स्वस्थ नहीं घोषित कर दिया जाए.

उपाय

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि छात्रों पर मानसिक दबाव कम करने के लिए उनको किसी पसंदीदा हॉबी के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. एक विशेषज्ञ डॉक्टर सुकांत बनर्जी कहते हैं, "प्रोफेसरों को शुरू से ही छात्रों को पढ़ाई के प्रति सचेत रहने को कह देना चाहिए. इसके साथ ही उनको छात्रों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर भी निगाह रखनी चाहिए." विशेषज्ञों का कहना है कि कक्षाएं भले अंग्रेजी में हों लेकिन खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को हिंदी में सवाल पूछने की भी इजाजत होनी चाहिए ताकि वे अपनी समस्याएं हल कर सकें. इसके अलावा हॉस्टल में साथ रहने वाले छात्रों को भी एक-दूसरे की गतिविधियों पर निगाह रखने को कहना चाहिए. इसमें हॉस्टल वार्डन और अभिभावकों की भी भूमिका भी अहम होगी.

एक मनोरोग विशेषज्ञ प्रोफेसर विपुल सरकार कहते हैं, "किसी सेमेस्टर में नंबर कम आने पर अभिभावकों को संबंधित छात्र को डांटने की बजाय उसे बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. इसके साथ ही संस्थान प्रबंधन, प्रोफेसरों और अभिभावकों के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा. इन तमाम उपायों से मेधावी छात्रों के जीवन के असमय अंत पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है."

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