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दुनिया

अस्पताल या जुल्म की कोठरी

कोलकाता के लुम्बिनी पार्क मेंटल अस्पताल में करीब 30 पुरुष मरीज अस्त व्यस्त कपड़ों में पड़े हैं. पास के टॉयलेट से आती गंध नाक फाड़े जाती है. कुछ ही दूर पर औरतों के हिस्से के गलियारे में दो महिला मरीज जमीन पर पड़ी हैं.

शहर के दूसरे सरकारी अस्पताल पावलोव मेंटल हॉस्पिटल में भी नजारा अलग नहीं है. यहां 250 बिस्तरों पर करीब 400 मरीज हैं. जिन्हें ज्यादा मानसिक बीमारी है, उन्हें चार गुना पांच फीट की कोठरियों में बंद कर दिया गया है. वहां भारतीय टॉयलेट हैं और उसी के बगल में बैठ कर उन्हें खाना पड़ता है. और अगर उन्हें जुएं हों, तो अस्पताल के एक कर्मचारी का कहना है कि उनके शरीर पर तिलचट्टे मारने वाला कीटनाशक छिड़क दिया जाता है.

ऐसे खतरनाक और दयनीय हालात के साथ अमानवीय व्यवहार. एक कर्मचारी का कहना है, "अस्पताल में खाना, कपड़े और चटाइयों के लिए जो पैसे आते हैं, वे अधिकारी बांट लेते हैं. यहां तक कि वे अस्पताल की चादरें और पर्दे भी घर ले जाते हैं."

Indien Kolkata Psychiatrische Klinik

कोलकाता मानसिक अस्पताल में जमीन पर पड़ी महिला मरीज



बाहर से अस्पताल अच्छा दिखता है, लेकिन इसके अंदर पुनर्वास की सुविधा नहीं है. मरीजों के लिए रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग का कोई प्रावधान नहीं. नतीजा यह होता है कि जो मरीज बेहतर हो जाते हैं, वे वक्त के साथ अपनी क्षमताएं खोने लगते हैं और उनका ध्यान भटकने लगता है, उत्पादकता घटने लगती है और आखिर में वे जीने का हौसला छोड़ बैठते हैं.

एक अधिकारी का कहना है, "पिछले दो साल में इस परिसर की शक्ल बदलने के लिए बहुत से कदम उठाए गए हैं. लेकिन फिर भी मरीज अमानवीय हालात में रहते हैं."

वाराणसी के मानसिक अस्पताल को 1809 में दिमागी बीमारी वाले अपराधियों के लिए जेल में बदल दिया गया. आज यहां के 290 मरीजों में सिर्फ 54 अपराधी हैं. लेकिन नियम वही औपनिवेशिक काल के अपनाए जा रहे हैं.

मरीजों को दुर्गंध से भरी कोठरियों में रहना पड़ रहा है. तापमान भले ही 40 डिग्री पार कर जाए, इन कोठरियों में कोई पंखा नहीं. मरीजों को गंदे फर्श पर सोना पड़ता है, क्योंकि यहां कोई बिस्तर ही नहीं है. और जेल के पुराने नियमों की बलिहारी है कि मरीजों को हर दिन 17 घंटे कोठरियों में बिताने पड़ते हैं. अगर किसी मरीज ने कुछ मांग कर दी, तो उसे जम कर पीटा जाता है. वहां के एक पुरुष मरीज का कहना है, "हमें तो भर पेट खाना भी नहीं मिलता."

Indien Varanasi Psychiatrische Klinik

वाराणसी के मरीजों से कहा जाता है कि रेत में लोटने से उनका मर्ज दूर हो जाएगा



अस्पताल में 300 मरीज रहते हैं और करीब इतने ही मरीजों को रोज देखा जाता है. लेकिन इनके लिए सिर्फ दो मनोचिकित्सक हैं. कोई नर्स नहीं, क्लिनिकल मनोविज्ञानी नहीं, कोई थेरेपिस्ट नहीं, कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं. यहां के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है, "पिछले 24 साल से मैं यहां हूं, मरीजों की बेहतरी के लिए कुछ नहीं किया गया है."

पश्चिम बंगाल हो, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र, ज्यादातर सरकारी मानसिक अस्पताल बुरी हालत में हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक भारत में सिर्फ 43 सरकारी मानसिक अस्पताल हैं, जिनमें से सिर्फ आधे दर्जन ही ऐसे हैं, जहां जीने लायक परिस्थितियां हैं. आयोग के सदस्य पीसी शर्मा का कहना है, "राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से 90 के दशक में कहा गया कि वह मानसिक अस्पतालों पर रिपोर्ट पेश करे. हमने पहली रिपोर्ट 1999 में जारी की. मानसिक अस्पतालों की स्थिति हैरान करने वाली थी. एक दशक बाद भी स्थिति वैसी ही बनी रही. यह दिखाती है कि सरकार मानसिक अस्पतालों को लेकर कौन सा रवैया अपनाती है."

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