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ब्लॉग

असहिष्णुता से मायूस हो रहे हैं लेखक

भारत में फैलती जा रही असहिष्णुता की संस्कृति और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के प्रयासों को मिल रही सफलता से क्षुब्ध होकर विभिन्न भाषाओं के लेखक अकादमी पुरस्कारों को लौटा रहे हैं. इनमें अशोक वाजपेयी भी हैं.

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अशोक वाजपेयी

हिंदी और अंग्रेजी के कुछ लेखकों के बाद अब छह कन्नड लेखकों ने कर्नाटक राज्य साहित्य अकादमी द्वारा प्रदत्त पुरस्कारों को लौटाने के घोषणा की है. पिछले माह हिंदी के जाने-माने कथाकार उदय प्रकाश ने केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने का फैसला लिया था. अब उनके साथ अंग्रेजी की प्रसिद्ध लेखिका नयनतारा सहगल, जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की पुत्री हैं, और हिंदी कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी का नाम भी जुड़ गया है. संभावना व्यक्त की जा रही है कि आने वाले दिनों में काफी बड़ी तादाद में दूसरे साहित्यकार भी सरकारी संस्थाओं द्वारा दिए गए पुरस्कारों से अपना संबंध तोड़ सकते हैं.

इस विरोध प्रदर्शन के पीछे कोई एक घटना नहीं है बल्कि वह पूरा माहौल है जो पिछले वर्ष मई में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से पूरे देश में तेजी के साथ बना है. ऐसा नहीं कि इस सरकार के सत्ता में आने के पहले सब कुछ ठीक-ठाक था. जब दो साल पहले महाराष्ट्र में अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ाई लड़ने और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करने में लगे वयोवृद्ध नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की गई थी, तब वहां कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार सत्ता में थी. फिर पिछले वर्ष जब वहां बुजुर्ग कम्युनिस्ट नेता गोविंद पनसारे की हत्या हुई तब वहां भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना गठबंधन की सरकार बन चुकी थी. हाल ही में कर्नाटक में प्रसिद्ध विद्वान एम एम कालबुर्गी की हत्या हुई. वहां कांग्रेस की सरकार है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि इन सभी हत्याओं के पीछे हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ होने की आशंका व्यक्त की जा रही है और जांच एजेंसियों को इस बारे में कुछ पुख्ता सुबूत भी मिले हैं.

इसके अलावा भी बीफ खाने का सवाल हो या लव जिहाद, शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिशें हों या उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष लोगों का मुंह बंद करने की घटनाएं हों, बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों के भड़काऊ बयान हों या फिर सरकार की मूक दर्शक वाली भूमिका, इन सभी के कारण संवेदनशील और सोचने-समझने वाले लोगों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. नरेंद्र मोदी यूं हर मुद्दे पर इतने मुखर हैं, लेकिन इस तरह के सवालों पर उन्होंने पूरी तरह मौन साधा हुआ है. यहां तक कि बीफ के मसले पर एक मुस्लिम परिवार पर हुए प्राणघातक हमले और उसमें उस परिवार के मुखिया की हत्या भी उनके मौन को नहीं तोड़ सकी है.

पुणे का फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान हो या भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, सभी में भगवा विचारधारा के लोग भर दिये गए हैं. चारों तरफ ऐसा आतंक फैलता जा रहा है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कालबुर्गी की हत्या की भर्त्सना करना तो दूर, केन्द्रीय साहित्य अकादमी उस पर एक शोक सभा तक आयोजित न कर सकी. सरकारी चुप्पी और इन हत्याओं की जांच में कछुए की रफ्तार से हो रही प्रगति ने भी लेखकों को बहुत मायूस किया है. इसलिए अब लाचार होकर उन्होंने पुरस्कार वापस करने का विकल्प चुना है.

विरोधस्वरूप पुरस्कार लौटाने की परंपरा बहुत पुरानी है. एक सदी पहले जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदत्त ‘सर' की उपाधि को वापस कर दिया था. कन्नड और हिंदी के लेखकों का अकादमी पुरस्कार लौटाने का निर्णय इसी गौरवशाली परंपरा की एक कड़ी है. इस समय स्थिति यह है कि दक्षिणपंथी विचारक और पत्रकार भी लगातार बढ़ रही असहिष्णुता से आजिज आ गए हैं और इसके खिलाफ लिख-बोल रहे हैं जबकि छह माह पहले वे ही मोदी सरकार के समर्थन में खड़े थे. उनके समर्थन का कारण नरेंद्र मोदी का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास' था. लेकिन अब उन्हीं को यह डर सताने लगा है कि इस असहिष्णुता, सामाजिक तनाव और सांप्रदायिक हिंसा का विकास की प्रक्रिया और गति पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे रोकने के लिए कुछ करेंगे. शायद वे करें भी, लेकिन अभी तक उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि उनका कुछ भी करने का इरादा है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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