असम की विधायक ने मांगा बच्चे को दूध पिलाने का हक | दुनिया | DW | 18.09.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

असम की विधायक ने मांगा बच्चे को दूध पिलाने का हक

ज्यादातर देशों की तरह भारत में भी कामकाजी महिलाओं का जीवन कई अतिरिक्त चुनौतियों से भरा है. असम की महिला विधायक के बच्चों को दूध पिलाने के लिए कमरे की मांग करने से उठा है कार्यस्थल को महिलाओं के अनुकूल बनाने का मुद्दा.

"मैं सिर्फ अपनी बेटी के लिए विशेष कमरा नहीं मांग रही हूं. विधानसभा परिसर में काम करने वाली दर्जनों महिलाओं को ऐसी समस्या का सामना करना पड़ता है. नवजातों को दूध पिलाने के लिए किसी अलग कमरे की व्यवस्था नहीं होने की वजह से ऐसी महिलाएं न तो बच्चों पर ध्यान दे पाती हैं और न ही अपने काम पर." यह कहना है विधानसभा परिसर में नवजात शिशुओं को दूध पिलाने के लिए अलग कमरे की मांग उठाने वाली असम की बीजेपी विधायक अंगूरलता डेका का. वह इसके लिए आस्ट्रेलिया की तर्ज पर कोई नया कानून बनाने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन चाहती हैं कि तंजानियाई संसद की तरह विधानसभा समेत तमाम सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों में ऐसे कमरों की व्यवस्था हो.  उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी ऐसी व्यवस्था करने की अपील की है.

Indien Angoorlata Deka BJP Politikerin (Privat)

पहली बार विधायक बनी हैं अंगूरलता डेका.

अवकाश नहीं व्यवस्था चाहिए

डेका ने बीते चार अगस्त को एक बच्ची को जन्म दिया था. लेकिन चार सितंबर से विधानसभा का वर्षाकालीन अधिवेशन शुरू होने की वजह से उनको राजधानी गुवाहाटी आना पड़ा. अब उनको सदन छोड़ कर लगभग हर घंटे तीन सौ मीटर दूर अपने आवास तक जाना पड़ता है ताकि वह अपनी नवजात बेटी को दूध पिला सकें. डेका कहती हैं, "बार बार घर जाने की वजह से अक्सर कई अहम मुद्दों पर होने वाली बहस में शामिल होना संभव नहीं होता." उन्होंने विदेशों की तर्ज पर विधानसभा परिसर में ही नवजातों को दूध पिलाने के लिए एक कमरे की व्यवस्था करने का औपचारिक अनुरोध किया है ताकि इसमें कम से कम समय लगे.

भारत में सभी नौकरीपेशा महिलाओं को छह महीने का मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है. लेकिन सांसदों और विधायकों के मामले में यह नियम लागू नहीं होता. वैसे, सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत ऐसी महिलाएं सदन के अध्यक्ष की अनुमति से छुट्टी ले सकती हैं. लेकिन डेका कहती हैं कि सार्वजनिक जीवन में होने की वजह से कोई भी महिला विधायक या सांसद इतने लंबे समय तक आम लोगों से दूर नहीं रह सकती क्योंकि इससे उनके चुनाव क्षेत्र में विकासमूलक कामकाज प्रभावित होगा. विधानसभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने डेका की कमरे की मांग को खारिज कर दिया है. लेकिन डेका ने आगे बढ़कर सरकारी व गैरसरकारी दफ्तरों में भी मांओं के लिए ऐसे कमरों की व्यवस्था करने की मांग की है. इस मामले ने कामकाजी महिलाओं की एक अहम समस्या को सुर्खियों में ला दिया है.

विपक्षियों का समर्थन

अंगूरलता पहली बार विधायक बनी हैं. इससे पहले वह असमिया फिल्मों और रंगमंच में काम कर चुकी हैं और काफी लोकप्रिय हैं. उनकी यह मांग विधानसभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने भले ही खारिज कर दी हो, दूसरे दलों से उनको समर्थन मिला है. 126-सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल आठ महिला विधायक हैं. उनमें से सबसे ज्यादा तीन कांग्रेस की हैं. उसके अलावा बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टी 'बोड़ो पीपुल्स फ्रंट' की दो-दो और 'असम गण परिषद' की एक महिला विधायक है. सदन में कांग्रेस विधायक दल के उपनेता रकीबुल हुसैन कहते हैं, "ऐसी महिलाओं के लिए अलग कमरे की व्यवस्था करने की मांग तो उचित है. लेकिन इसके लिए संबंधित कानून में संशोधन करना होगा. अभी देश की संसद और विधानसभा में नवजातों को लाने की अनुमति नहीं है."

दूसरी ओर, अंगूरलता कहती हैं, "जब तक नवजात शिशु एक साल का नहीं हो जाता तब तक तमाम सरकारी व गैरसरकारी दफ्तरों में उनको दूध पिलाने के लिए खास कमरों की व्यवस्था की जानी चाहिए." वह कहती हैं कि संशोधित मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत दफ्तरों में क्रैच का प्रावधान है. लेकिन कम ही दफ्तरों में ऐसी व्यवस्था है.

विधानसभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी कहते हैं, "सदन में बच्चों को लाने की अनुमित नहीं दी जा सकती. " वह मानते हैं कि नवजात की माताओं के साथ समस्या तो है, लेकिन मौजूदा कानूनों के तहत ऐसी कोई व्यवस्था करना संभव नहीं. गोस्वामी ने कहा है कि सदन के गेस्ट हाउस में इसके लिए डेका को एक कमरा आवंटित किया जा सकता है. लेकिन डेका का कहना है कि वह महज अपने लिए नहीं बल्कि अपने जैसी तमाम महिलाओं के लिए यह मांग उठा रही हैं. कांग्रेस नेता हुसैन कहते हैं, "केंद्र व राज्य में बीजेपी की सरकार है. वह चाहे तो संबंधित कानून में संशोधन कर सकती है."

परिवार और नौकरी के दो पाटों में पिसती 

एक कामकाजी महिला को घर के अलावा दफ्तर में भी तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. घर वाले जहां उससे घर-बाहर दोनों जगह संतुलन बिठाने की उम्मीद करते हैं, वहीं दफ्तरों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की शिकायतें भी आती रहती हैं. कई क्षेत्रों में उनको पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले ना केवल वेतन कम मिलता है, बल्कि प्रमोशन के मौके भी कम दिये जाते हैं. व्यापार संगठन एसोचैम की ओर से हाल में किए गए एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि कामकाजी महिलाओं में से 80 फीसदी ऐसी हैं जिनके घरवाले उम्मीद रखते हैं कि वह दफ्तर की बजाय घर के काम को प्राथमिकता देंगी. इनमें से ज्यादातर को पति व ससुराल वालों का उत्पीड़न भी सहना पड़ता है. और इन सब चुनौतियों के बीच वे घर और दफ्तर के कामकाज में संतुलन बनाने का प्रयास करती रहती हैं.

हटाना होगा उम्मीदों का पहाड़ भी

आखिर देश में कामकाजी महिलाओं की हालत में सुधार कैसे हो सकता है? समाजशास्त्रियों का कहना है कि इसके लिए पुरुषप्रधान समाज की मानसिकता, महिलाओं से घर-बाहर सब कुछ संभालने की उम्मीद करने की मानसिकता और कॉरपोरेट घरानों की मानसिकता में बदलाव जरूरी है. समाजशास्त्र के प्रोफेसर बीरेश्वर लाहिड़ी कहते हैं, "खासकर विवाहित कामकाजी महिलाओं को चौतरफा दबावों का सामना करना पड़ता है. उससे घर और बच्चों के तमाम कामकाज के अलावा दफ्तर का काम संभालने की भी उम्मीद की जाती है."

बीरेश्वर लाहिड़ी कहते हैं कि महिलाओं को सही अर्थों में समानता का अधिकार मुहैया कराने के साथ पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता में बदलाव से ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है. डेका इस मामले पर आखिर तक आवाज उठाते रहने के लिए कृतसंकल्प हैं. एक महिला विधायक की छेड़ी इस मुहिम ने ठहरे हुए पानी में जैसे एक कंकड़ फेंक दिया है.

 

DW.COM

संबंधित सामग्री