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दुनिया

अव्वल होने पर भी शर्म!

किसी भी क्षेत्र में पहले नंबर पर होने को आमतौर पर कामयाबी की निशानी माना जाता है. लेकिन पश्चिम बंगाल एक ऐसे क्षेत्र में पहले नंबर पर है जिस पर राज्य को कोई गर्व या खुशी नहीं होगी. उल्टे यह उसके लिए शर्म की वजह है.

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के परिवार कल्याण विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, टीनएज यानी कम उम्र में गर्भवती होने वाली युवतियों की तादाद के मामले में बंगाल पूरे देश में अव्वल है. यहां कुल आबादी की 14 फीसदी युवतियां 15 से 19 साल की उम्र में ही गर्भवती हो जाती हैं. राज्य में 41 फीसदी युवतियों की शादी 18 की उम्र तक पहुंचने से पहले ही हो जाती है. इससे नवजात शिशुओं और माताओं की मृत्यु दर भी बढ़ रही है.

विशेषज्ञ इस स्थिति को खतरनाक मानते हैं. फेमिली प्लानिंग एसोसिएशन आफ इंडिया की कोलकाता शाखा की मैनेजर सहाना भौमिक मानती हैं कि इससे प्रसव के समय माताओं के मरने की मामले बढ़ जाएंगे. वह कहती हैं कि कुल आबादी की 14 फीसदी युवतियों का टीनएज में ही गर्भवती होना खतरे की घंटी है. यह शिशुओं के प्रसव के दौरान माताओं के मरने की प्रमुख वजह है.अगर कम उम्र में गर्भवती होने वाली युवतियों की तादाद बढ़ेगी तो माताओं की मृत्यु दर भी बढ़ जाएगी.

सहाना कहती है कि राज्य के कई हिस्सों में अब भी सेक्स और प्रजनन से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं पर खुल कर चर्चा नहीं होती. विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र में गर्भवती होने के खतरों और दो बच्चों के जन्म के बीच न्यूनतम अंतर होने के बारे में जितने भी जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं, वे निचले स्तर तक नहीं पहुंचे हैं. राज्य के पिछड़े इलाकों में कम उम्र में विवाह का प्रचलन है. बांकुरा और पुरुलिया जैसे पिछड़े जिले में कम उम्र में विवाह रोकने की दिशा में काम कर रहे सहायक श्रम आयुक्त प्रसेनजीत कुंडू इस समस्या का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पुरुलिया की ज्योत्सना कालिंदी की शादी 11 साल की उम्र में हो गई थी. उसके चार बच्चे हुए. लेकिन सभी मर गए. अब उसके पति ने छोड़ दिया है और वह दूसरे पति के साथ रह रही है.

कम उम्र में गर्भवती होने की स्थिति में युवतियों को कई शारीरिक जटिलताएं भी हो सकती हैं. बाल रोग विशेषज्ञ डा. जे.पी. सरकार कहते हैं कि इससे समय से पहले बच्चे का जन्म होने का अंदेशा रहता है. इसके अलावा बार-बार गर्भपात होने का खतरा भी बना रहता है. ऐसे मामलों में प्रसव के दौरान माताओं की मृत्यु और कम वजन वाले शिशुओं के जन्म के मामले आम हैं.

आखिर इसकी वजह क्या है? सहाना कहती हैं कि लड़कियों में शिक्षा का अभाव इसकी प्रमुख वजह है. प्राथमिक स्तर पर सभी लड़कियों का स्कूलों में नामांकन कराया जाता है. लेकिन जब उच्च-शिक्षा की बात आती है तो ज्यादातर लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं. शायद परिवार के दबाव, बंगाल की सामाजिक परिस्थिति या कम उम्र में शादी की प्रचलित परंपरा की वजह से ही लड़कियां आगे नहीं पढ़ पातीं.

राज्य में बांग्लादेश से सटे मुर्शिदाबाद जिले की सकीना पांचवीं कक्षा में पढ़ती है. वह पढ़-लिख कर नौकरी करना चाहती है. लेकिन शादी के सवाल पर वह कहती है कि अगर माता-पिता मेरी शादी तय कर दें तो मैं क्या कर सकती हूं. मैं उनके खिलाफ आवाज कैसे उठा सकती हूं. मौजूदा हालात में साफ है कि फिलहाल बंगाल के इस क्षेत्र में पहले नंबर से नीचे आने की उम्मीद कम ही है.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः एन रंजन

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