1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

अविवाहित पिताओं को परवरिश का हक

जर्मनी में अकेले अभिभावक वाले परिवार बढ़ रहे हैं. ऐसे परिवार जिनमें तलाक के बाद मां या बाप में से कोई एक अकेला बच्चों को पालता है. अब पिताओं को भी बच्चों की परवरिश का हक देने की बात हो रही है.

default

पिता को होगा पूरा हक

बच्चों के पालन पोषण में मां की पारंपरिक भूमिका के कारण तलाक के बाद अधिकांश मामालों में पालन पोषण की जिम्मेदारी मां को दी जाती थी, लेकिन भविष्य में ऐसा नहीं होगा. जर्मन संवैधानिक अदालत ने अविवाहित पिताओं के अधिकारों पर जोर दिया है.

Vater mit Kinderwagen

पिता के अधिकारों पर बहस

अब तक जर्मनी में अविवाहित जोड़ों के अलग होने के बाद उनके बच्चे के पालन पोषण का जिम्मा सीधे मां को मिल जाता था. पिता के पास शायद ही कोई मौका था. कहा जाता था कि मां बच्चे की जरूरतों को बेहतर समझ पाएगी, उसे पूरा कर पाएगी. लेकिन अपने बच्चे के पालन पोषण में हाथ बंटाने के इच्छुक पिताओं को यह स्वीकार्य नहीं था. अब जर्मनी की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें राहत दी है और बच्चों के पालन पोषण में उन्हें अधिक अधिकार दिए हैं और सरकार से जल्द ही कानून बदलने को कहा है.

अधिकार की लड़ाई

जर्मनी में अविवाहित पिता अब मां की इच्छा के विरुद्ध भी बच्चे के पालन पोषण का अधिकार पाने के लिए अदालत में अपील कर सकते हैं. अब तक मां की सहमति पर ही पिताओं को साझा पालन पोषण का अधिकार मिलता था. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताया है और कहा कि यदि मां इनकार करती है तो पिता को अदालत में जाने का हक होना चाहिए. यदि बच्चे के हित में हो तो पारिवारिक अदालतों को माता पिता को परवरिश का साझा अधिकार देना चाहिए.

टॉर्स्टन नीत्स वर्षों से मेट्रो ट्रेन के ड्राइवर के रूप में काम कर रहे हैं और एक जिम्मेदार कर्मचारी हैं. जैसी जिम्मेदारी वह अपनी कंपनी और हर रोज उनकी ट्रेन से सफर करने वाले मुसाफिरों की उठा रहे हैं, वैसी ही जिम्मेदारी वह अपनी बेटी मिशेले के लिए उठाना चाहते थे जो विवाह से बाहर पैदा हुई है. मिशेले की मां से अलग होने के बाद भी वे मिशेले के

Vater und Kind

लड़ाई परवरिश के हक की

पिता बने रहना चाहते थे और पिता की सारी जिम्मेदारी निभाना चाहते थे, लेकिन मां इसके खिलाफ थी. नीत्स जैसे पिताओं को संवैधानिक न्यायालय के फैसले से उनका स्वाभाविक अधिकार मिला है. नीत्स कहते हैं, "सबसे पहले मुझे राहत मिली कि यह फैसला आया, क्योंकि इसकी वर्षों से जरूरत थी."

जर्मनी में सालों से इस पर विवाद चल रहा था. और विवाद पर फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि जर्मनी में एक तिहाई बच्चे ऐसे हैं, जिनके मां बाप ने आपस में शादी नहीं की है. इसका मतलब है कि अविवाहित महिला पुरुष साथ रह रहे हैं, या फिर माता या पिता अकेले बच्चे का पालन पोषण कर रहे हैं. अधिकतर मामले में अकेली मांएं अविवाहित संबंध से पैदा बच्चे की देखभाल करती है. अविवाहित पिताओं को तभी बच्चों के पालन पोषण का हक मिलता था जब मांएं सहमत होती थीं.

अब संवैधानिक अदालत उन्हें अपील का अधिकार देना चाहती है. पारिवारिक मामलों की वकीलों की राय अलग है. एडिथ श्वाब कहती हैं, "क्योंकि पिता के साथ पालन पोषण के साझा अधिकार को अस्वीकार करने वाली मांओं के पास उसके लिए बेहतर कारण होते हैं. इसका मतलब है कि माता पिता के बीच विवाद की संभावना इतनी ज्यादा होती है कि मांए उचित ही साझा अधिकार को मना कर देती है."

बदलेगा कानून

अब सरकार को पुराने कानून में संशोधन करना होगा. कानून मंत्रालय संशोधन पर काम कर रहा है. चुनौती यह होगी कि इससे अलग हुए जोड़ों के बीच विवाद न बढे और बच्चे उस विवाद का प्यादा न बन जाएं. टॉर्स्टन नीत्स को भी आशंका है कि पिताओं के लिए अधिक अधिकार का नतीजा और अधिक विवाद के रूप में सामने आ सकता है.

जर्मनी में संवैधानिक न्यायालय ने बच्चों की परवरिश के अधिकार को लेकर अविवाहित माता पिताओं के बीच लम्बे समय से चले आ रहे विवाद में फैसला सुनाया है और अविवाहित पिताओं के अधिकारों पर बल दिया है. इस मामले में अपील नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया राज्य के एक व्यक्ति ने की थी जो बच्चे के पैदा होने से पहले ही अपनी साथी से अलग हो गया था, लेकिन उसने पितृत्व स्वीकार किया था और वह बच्चे के साथ संबंध और संपर्क चाहता था, लेकिन महिला

Glückliche Familie

बच्चे के लिए मां बाप दोनों ही जरूरी

इसके लिए तैयार नहीं थी. वह बच्चे को लेकर कहीं और जाना चाहती थी, फिर उस पिता ने अदालत में अपील की लेकिन कानूनी स्थिति के कारण हार गया. उसके बाद उसने संवैधानिकता का मामला उठाया.

पिताओं के स्वाभाविक अधिकार पर यह फैसला स्वाभाविक था, इसलिए भी कि सात महीने पहले यूरोपीय अदालत भी ऐसा फैसला सुना चुकी थी. जर्मनी में अब तक मां की सहमति मिलने के बाद ही अविवाहित पिताओं को बच्चों की परवरिश में हिस्सेदारी का अधिकार मिलता था. मां ना कहकर व्यावहारिक रूप से पिता से उसका बच्चा छीन सकती थी. यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में एक ऐसे पिता ने अपील की थी जिसे जर्मनी की अदालतें बेटी के पालन पोषण का अधिकार नहीं दे रही थी.

पिता को 'पूरा' हक

यूरोपीय अदालत ने बच्चे की परवरिश में हिस्सेदारी के पिताओं के अधिकार की पुष्टि कर दी. अविवाहित पिताओं के संगठन के अनुसार जर्मनी में हजारों अविवाहित पिता हैं जिन्हें बच्चों की परवरिश का अधिकार नहीं दिया गया है. संगठन के फ्रांत्स योर्ग क्रीग कहते हैं, "यदि किसी का बच्चा है जो तीन या चार साल का है, लेकिन दस महीने तक उससे नहीं मिल पाता है तो यह बहुत गंभीर बात है. यह मानवाधिकारों का हनन है, यह उत्पीड़न है."

यही नहीं यह पिताओं को उनके स्वाभाविक अधिकार से वंचित रखना है. दूसरी ओर पिछले सालों का शोध दिखाता है कि बच्चों के अच्छे विकास के लिए मां की ममता के साथ साथ पिता का प्यार भी जरूरी है. संवैधानिक न्यायालय के फैसले में बच्चों के हितों को सर्वोपरि रखा गया है, लेकिन दूसरी ओर उस विषमता को भी दूर किया गया है जो विवाहितों को अविवाहितों से बेहतर रखता है. जर्मन संविधान दाम्पत्य की विशेष सुरक्षा की बात करता है लेकिन इस फैसले से उनके साथ भेदभाव दूर हुआ है जिंहोंने विवाह किए बिना साथ रहने का फैसला किया है.

मामला अहम का

दूसरी ओर अदालत के फैसले में इस बात की भूमिका रही है कि पिता को परवरिश का अधिकार न देने के मांओं के फैसले के पीछे अकसर

Symbolbild Vater Kind Sorgerecht gekippt

बाप को भी मिलेगा बच्चे का हक

अहम की भूमिका होती है. संवैधानिक अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि नए अध्ययनों ने दिखाया है कि बहुत सी मांए साझा अधिकार की सहमति इसलिए नहीं देती हैं कि वे यह अधिकार बच्चे के पिता के साथ बांटना नहीं चाहती. हकीकत यह भी है कि सिर्फ आधे मां बाप साझे परवरिश के अधिकार का उपयोग करते हैं. बहुत से पुरुष बच्चों की परवाह ही नहीं करते और पालन पोषण का जिम्मा मां पर छोड़ देते हैं, आर्थिक मदद भी नहीं देते.

पश्चिमी देशों में परिवार का स्वरूप बदल रहा है. इसलिए कानूनी आधार का बदलना भी जरूरी है. बुलगारिया, चेक गणतंत्र, पोलैंड और रूस में परवरिश का साझा अधिकार दिया गया है. जर्मनी में भी विवाहित परिवारों की परंपरा घट रही है. पूर्वी जर्मनी में पहला बच्चा होते समय 58 फीसदी महिलाएं अविवाहित होती हैं और पश्चिम जर्मनी में 26 फीसदी. ऐसे में संवैधानिक न्यायालय का यह फैसला बहुत दूरगामी फैसला है.

रिपोर्ट: महेश झा

संपादन: ए कुमार