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जर्मन चुनाव

अल्पसंख्यक वोट बैंक पर सबकी निगाहें

लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों को लुभाने में लगे है. केंद्र की गद्दी पर अपनी दावेदारी मजबूत करने की होड़ में सीपीएम, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटे हैं.

और तो और भारतीय जनता पार्टी भी अल्पसंख्यकों को अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है और अबकी अल्पसंख्यकों का समर्थन मिलने का दावा करने लगी है. अल्पसंख्यक संगठनों के नेताओं के पास उम्मीदवारों की हाजिरी भी बढ़ने लगी है.

अहम वोट बैंक

पश्चिम बंगाल की आबादी में 28 फीसदी मुसलमान हैं. राज्य के खासकर बांग्लादेश से लगे इलाकों में तो मुस्लिम वोट ही किसी उम्मीदवार की हार-जीत में निर्णायक हैं. लोकसभा की 42 में से दस से ज्यादा सीटों पर यह तबका उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करने में सक्षम है. इस तबके का कहना है कि चुनावों के समय तमाम दलों के नेता वादे तो बहुत करते हैं. लेकिन चुनाव बीतते ही तमाम वादे दवाई साबित हो जाते हैं. अबकी लोकसभा चुनावों के मौके पर मुसलमान एक बार फिर दोराहे पर हैं.

ममता को अल्पसंख्यक वोटों की अहमियत अच्छी तरह मालूम है. पिछले विधानसभा चुनावों में इस आबादी के भारी समर्थन ने ही उनकी पार्टी को सत्ता दिलाई थी. इसलिए पिछले तीन वर्षों से वे इस तबके के लिए लगातार सौगातों का एलान करती रही हैं. जाहिर है ममता की नजरें इस विशाल वोट बैंक पर टिकी हैं. इसे भुनाने के लिए तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने अबकी सात अल्पसंख्यकों को चुनाव मैदान में उतारा है. राज्य में अपना खोया जनाधार दोबारा हासिल करने की कोशिश में जुटी माकपा भी इन वोटरों की अहमियत समझती है. उसने इस बार एक दर्जन अल्पसंख्यकों को टिकट दिया है. पिछले चुनाव में उसने छह मुस्लिमों को टिकट दिया था. किसी जमाने में कांग्रेस को भी अल्पसंख्यक वोटरों का अच्छा-खासा समर्थन हासिल था. लेकिन नेतृत्व के अभाव और आपसी गुटबाजी की वजह से मुस्लिम उससे दूर होते गए. कई अल्पसंख्यक नेताओं ने पार्टी से नाता तोड़ लिया.

किधर जाएंगे अल्पसंख्यक

भारतीय जनता पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव अरशद आलम कहते हैं, "यह चुनाव ऐतिहासिक हैं. नरेंद्र मोदी के नाम पर अल्पसंख्यक भी समर्थन दे रहे हैं." उनका दावा है कि अबकी राज्य में कम से कम 15 फीसदी अल्पसंख्यक वोटर मोदी का साथ देंगे. लेकिन महानगर की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम मोहम्मद नुरूर रहमान बरकती आलम के दावे को नकारते हुए कहते हैं, "मोदी का यहां कोई असर नहीं है. बंगाल में मुसलमानों का झुकाव ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की ओर है."

राष्ट्रीय जनता दल के पूर्व विधायक मोहम्मद असीरुद्दीन कहते हैं, "राज्य में मदरसों की हालत खराब है. मुसलमानों के लिए विश्वविद्यालय या मेडिकल कालेज नहीं है." वह कहते हैं कि अब मुस्लिम वोटर जागरूक हो गए हैं. जो पार्टी उसके हित नहीं साधेगी वह उसका समर्थन नहीं करेगा. तंजीम एम्मा मसाजिद पश्चिम बंगाल के महासचिव मोहम्मद अली जौहर फुरकानी को इस बात का अफसोस है कि किसी भी सरकार ने मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया है. वह कहते हैं, "तमाम मुसलमान अब सियासी दलों पर नजर रख रहे हैं. जो बेहतर पार्टी होगी, उसी का समर्थन किया जाएगा."

कथनी-करनी में अंतर

मुसलमानों के हक की लड़ाई लड़ने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी नजरूल इस्लाम अपने कार्यकाल में काफी विवादास्पद रहे हैं. मुसलमानों की उपेक्षा और वोट बैंक के तौर पर उनके इस्तेमाल करने की सियासी रणनीति पर कई पुस्तकें लिख कर पहले बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार और फिर ममता बनर्जी का कोपभाजन बने इस्लाम कहते हैं, "बंगाल में तमाम सियासी दल अब भी उच्चवर्गीय मानसिकता से मुक्त नहीं हैं. तमाम बड़े पदों पर उच्च वर्ग के लोग बैठे हैं. नेताओं की कथनी और करनी में काफी अंतर है. बाहर तो वे जात-पांत को नहीं मानने का दिखावा करते हैं. लेकिन घर में इसे मानते हैं."

उनका कहना है कि जब तक सियासी दलों के नेता इस मानसिकता से मुक्त नहीं होते, तब तक मुसलमान यहां वोट बैंक ही बने रहेंगे. इस्लाम मानते हैं कि अब यह तबका अपने हितों और अधिकारों के प्रति सचेत हो रहा है. लेकिन इस बदलाव में काफी वक्त लगेगा. अल्पसंख्यक वोट बैंक पर निगाह रखते हुए लगभग तमाम पार्टियों के उम्मीदवार धार्मिक संगठनों और इमामों के चक्कर काटने लगे हैं. यह लोग भी सबको समर्थन का भरोसा दे रहे हैं. लेकिन आखिरी मौके पर यह वोट बैंक किसकी झोली में गिरेगा, इसका अनुमान लगाना राजनीतिक पंडियों के लिए भी मुश्किल है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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