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ब्लॉग

अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश

लालकृष्ण आडवाणी के विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपने अघोषित उम्मीदवार के रूप में पेश करने के बाद अब बीजेपी को अल्पसंख्यक वोट की चिंता सताने लगी है.

2002 में गुजरात में हुई व्यापक मुस्लिम विरोधी हिंसा, उस हिंसा के कारण पीड़ित परिवारों का इतने साल बाद भी बेहद असंतोषजनक पुनर्वास और झूठी मुठभेड़ों में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के मारे जाने और राज्य पुलिस के उच्चाधिकारियों के इनकी साजिश में शामिल होने के आरोपों के कारण नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बन गई है जो लोगों को जोड़ता कम, बांटता अधिक है. उनके कारण 17 वर्षों का सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) भाजपा का साथ छोडकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से बाहर चला गया. अब गठबंधन में भाजपा के अलावा शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल (बादल) ही बचे हैं. इस स्थिति में अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा एक ‘विजन दस्तावेज' तैयार करने में लगी है जिसमें अल्पसंख्यकों को अपनी ओर आकर्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन जैसे मुस्लिम नेताओं को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है और उन्होंने स्पष्ट किया है कि इसमें अल्पसंख्यकों के सशक्तिकरण पर जोर दिया जाएगा, तुष्टीकरण पर नहीं.

अल्पसंख्यकों को लेकर यह भाजपा की बहुत पुरानी नीति है और इसे स्पष्ट करने के लिए एक नए ‘विजन दस्तावेज' तैयार करने की क्या जरूरत है, यह समझना मुश्किल है. यह कवायद यूं भी विरोधाभासी है क्योंकि नरेंद्र मोदी को अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करने के बाद से ही भाजपा और उसके नेता---और इनमें आडवाणी भी शामिल हैं---पार्टी की उन बुनियादी प्रतिज्ञाओं की ओर लौटते नजर आ रहे हैं जिन्हें अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग और केंद्र सरकार बनाते समय ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. यह सब एक ऐसे समय घटित हो रहा है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भाजपा पर सांगठनिक वर्चस्व का विरोध करने की आडवाणी की कोशिश विफल हो चुकी है और पार्टी के नीतिगत एवं सांगठनिक निर्णयों में संघ का स्पष्ट हस्तक्षेप नजर आने लगा है. यह अकारण नहीं है कि कुछ समय पहले पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लक्ष्य को याद किया था और उत्तर प्रदेश में पार्टी मामलों के प्रभारी और गुजरात में हुई कथित रूप से झूठी मुठभेड़ों के प्रमुख आरोपी अमित शाह ने भी अयोध्या जाकर इसी प्रतिज्ञा को दुहराया है. वे काफी समय जेल में गुजारने के बाद इस समय जमानत पर छूटे हुए हैं. और तो और, आडवाणी ने खुद अपने ब्लॉग पर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान की धारा 370 को समाप्त करने की पुरानी मांग को उठाया जिसे एनडीए बनाते समय एजेंडे से निकाल दिया गया था. राजनाथ सिंह स्पष्ट कर चुके हैं कि एनडीए का विस्तार चुनाव के बाद ही किया जाएगा. इसका अर्थ यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सहयोगी पार्टियों के रूप में शिवसेना और अकाली दल (बादल) ही होंगे. इन पार्टियों को भाजपा की इन पुरानी और बुनियादी प्रतिज्ञाओं और मांगों से कोई आपत्ति नहीं होगी. और इन्हें उठाकर भाजपा अपने उस पारंपरिक जनाधार को फिर से मजबूत कर सकेगी जिसमें पिछले कुछ वर्षों में दरार आई है.

Wahlen in Gujarat Indien

बांटने वाले नेता नरेंद्र मोदी...

लेकिन इसके साथ ही उसे यह भी अच्छी तरह से पता है कि अल्पसंख्यक मतदाता अनेक चुनाव क्षेत्रों में चुनाव के परिणाम को निर्णायक ढंग से प्रभावित करने की स्थिति में हैं. उसे पूरी तरह से नजरंदाज करके कोई भी पार्टी या गठबंधन सत्ता में आने का सपना नहीं देख सकता. इसलिए ‘विजन दस्तावेज' तैयार करने की कवायद करके उसके मन में यह उम्मीद जगाना है कि नरेंद्र मोदी के आने का मतलब पार्टी का अल्पसंख्यक विरोधी होना नहीं है. मोदी का यह भी दावा है कि 2002 के बाद गुजरात में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और वहां अल्पसंख्यक, विशेषकर मुसलमान, पूरी तरह से न केवल सुरक्षित हैं बल्कि राज्य में हो रहे त्वरित आर्थिक विकास में भागीदार भी हैं. भाजपा को उम्मीद है कि शायद इन दावों और ‘विजन दस्तावेज' में किए गए वादों से प्रभावित होकर अल्पसंखयक समुदाय का कुछ हिस्सा उसके पक्ष में वोट कर दे. केंद्र में सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों की जरूरत है. भाजपा को अच्छी तरह पता है कि राजग इस आंकड़े को छूने की कल्पना भी नहीं कर सकता. लेकिन यदि उसे 180 सीटों पर भी सफलता मिल गई, तो वह चुनाव के बाद अन्य दलों का सहयोग प्राप्त करने में सफल हो सकता है क्योंकि सत्ता से बड़ा चुंबक और कोई नहीं.

लेकिन समस्या यह है कि नरेंद्र मोदी की विभाजक व्यक्तित्व वाली छवि के कारण अन्य पार्टियां भी उसी अल्पसंख्यक वोट को अपनी ओर खींचने पर ध्यान दे रही हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि वह भाजपा को नहीं मिलेगा. फलस्वरूप एक ही राज्य में प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा के विरोध के मुद्दे पर साथ-साथ खड़े नजर आ रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी हो, या पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वाममोर्चा हो, या फिर बिहार में जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और लोकशक्ति पार्टी. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कांग्रेस से दूर जाने की संभावना भी नरेंद्र मोदी के उदय ने लगभग समाप्त कर दी है और कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) को भी भाजपा के विरोध में एक ही पाले में होने को मजबूर कर दिया है.

भाजपा की रणनीति नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मजबूत और प्रभावी सुशासन देने का वादा करके मध्यवर्ग को अपनी ओर खींचना, अपनी पारंपरिक नीतियों को रेखांकित करके हिंदुत्ववादी जनाधार को एकत्रित रखना और ‘विजन दस्तावेज' में लुभावने वादे करके अल्पसंख्यकों के दिल से संदेह और आशंका को दूर करना है.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार
संपादनः आभा मोंढे

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