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दुनिया

अराधना की मौत से उठे सवालों का सामना करना होगा

जैन धर्म में त्याग, तपस्या और संयम को बहुत महत्व दिया जाता है. लेकिन तपस्या के नाम पर बच्चों को कठिन तप व्रत के लिए प्रोत्साहित करना बहुतों को व्यथित करता है.

लम्बे धार्मिक उपवास के बाद हैदराबाद की 13 वर्षीय अराधना की मौत पर बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है. परम्परा या आस्था के नाम पर बच्चों पर कड़े धार्मिक नियम लादे जाने को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. इस मौत से आक्रोशित लोग, बच्चों को ऐसे कार्यों के लिए उकसाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. अराधना तो जैन धर्म की थी, लेकिन आस्था और परम्परा के नाम पर अन्य धर्मों में भी होने वाले इस तरह के मामलों पर कानूनी रोक लगाए जाने की मांग उठने लगी है.

शिक्षा की ज़रूरत, तपस्या की नहीं

मनोवैज्ञानिक डॉ. प्रियम्बदा सुबोध कहती हैं कि बच्चों की शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए यह बिलकुल सही नहीं है कि उन्हें उपवास या कठिन तपस्या के लिए प्रोत्साहित किया जाए, यह क्रूरता है. शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार भी मानते हैं कि अन्न जल का त्याग, बच्चों का खेल नहीं है. खास कर अराधना के मामले पर अरुण कुमार कहते हैं कि इस उम्र के बच्चों के लिए त्याग या तपस्या का मतलब शैक्षिक और नैतिक अनुशासन होना चाहिए.

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले एनजीओ 'बलाला हक्कुला संघम' के कार्यकर्ताओं के अनुसार अराधना ने जैन धर्म के पवित्र दिनों 'चौमासा' के दौरान परिवार की समृद्धि के लिए 68 दिनों का उपवास रखा. इस दौरान उसका स्कूल भी छूट गया. यानी बच्चों को पौष्टिक भोजन और अच्छी शिक्षा दिलाने की ज़िम्मेदारी के प्रति अभिभावकों ने उदासीनता दिखाई.

समाज भी ज़िम्मेदार

परिवार का कहना है कि अराधना कई दिनों तक उपवास करने की आदी थी. इसके पहले वह 41 दिन का उपवास सफलतापूर्वक कर चुकी थी. हालाँकि यह कह पाना मुश्किल है कि उसने यह सब स्वेच्छा से किया या उस पर कोई दबाव था लेकिन उसकी ‘तपस्या' को समुदाय और परिवार से सराहना मिलती थी. शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि लोगों की सराहना अपरोक्ष रूप से दबाव का ही एक रूप है. कम से कम बच्चों के मामले में तो यह दबाव अधिक सक्रिय रूप से काम करता है.

अराधना की मौत पर "नींद से जागे" लोग परिवार पर ऊँगली उठा रहे हैं जबकि परिवार वालों का अपना ही तर्क है. उनका कहना है कि लोग अब क्यों उनका विरोध कर रहे हैं जबकि पहले लोग अराधना के साथ सेल्फी खिंचवाते थे और उसे इसी उपवास के चलते सेलेब्रिटी बना दिया था. उपवास के पूरा होने पर हुए 'पाराना' की रस्म में तेलंगाना के एक मंत्री और एक सांसद भी शामिल हुए थे. क्या कार्यक्रम में इन जन प्रतिनिधियों की उपस्थिति, समाज की मानसिकता को नहीं दर्शाता? मौत के बाद भी बहुत कम लोगों में अपराध बोध रहा होगा क्योंकि अंतिम संस्कार में शामिल हुए ज़्यादातर लोगों ने अराधना को 'बाल तपस्वी' करार दिया.

कानून से अधिक जागरूकता की ज़रूरत

जैन धर्म में बच्चों के उपवास का यह कोई पहला मामला नहीं है. ऐसे और भी बच्चे हैं जो धार्मिक आस्थाओं और परम्परा के चलते कठिन तप और उपवासों के प्रति प्रेरित होते हैं. जैन धर्माचार्य बच्चों में आत्मबल बढ़ाने पर ज़ोर देते हैं. अराधना की मौत के बाद जैन धर्म की परम्पराओं पर उठ रहे सवालों से नाराज़ जैन धर्मगुरुओं ने मौलिक अधिकारों की दुहाई दी है. जैन गुरु मांगीलाल भंडारी का कहना है, "हमारे धर्म से जुड़े मौलिक अधिकारों पर किसी को दखल देने का अधिकार नहीं है. अराधना के परिजनों पर केस करना हमारे धार्मिक मामलों में दखल देना है."

मानवाधिकार और बाल अधिकार कार्यकर्ता कानून के ज़रिए इस तरह की प्रथाओं पर रोक लगाने की बात कहते हैं. लेकिन प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि अकेले कानून से कुछ नहीं होगा. बाल न्याय कानून के साथ साथ समाज में जागरूकता लानी ज़रूरी है.

वहीं पेशे से डॉक्टर एस के जैन कहते हैं कि कोई भी धर्म बच्चों के प्रति क्रूरता को समर्थन नहीं देता. जैन धर्म तो बिलकुल भी नहीं. उनके अनुसार कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को उपवास रखने पर मजबूर नहीं करते.

ऐसा नहीं है कि आस्था के नाम पर सिर्फ जैन धर्म में बाल अधिकारों की अनदेखी होती है. बल्कि अन्य धर्मों में भी ऐसे मामले होते हैं. बहरहाल, अराधना को अपनी "अराधना” से मौत मिली, अब अगर ऐसी "अराधना” पर सवाल उठ रहे हैं, तो इन सवालों से भागना नहीं चाहिए.

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