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दुनिया

अयोध्या विवाद से दूर भागता यंग इंडिया

अयोध्या के बाद शुरू हुआ जुनून का दौर अब खत्म होता सा नजर आता है. नौजवानों के जहन पर जहर बुझे अल्फाज असर नहीं कर रहे हैं. उनकी आंखें अतीत के आताताइयों को नहीं भविष्य के सपने देखना चाह रही हैं.

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बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के 18 साल बाद भारत के हालात काफी अलग हैं. नए भारत के अधिकतर युवा अब आरएसएस की शाखा में नहीं जाते बल्कि शाखा में जाने वालों की खिल्ली उड़ाना पंसद करते हैं. आम जिंदगी में विश्व हिंदू परिषद के लोग भी न के बराबर दिखते हैं. 21वीं सदी के भारतीय युवा वर्ग के हाथ में मोबाइल और आंखों में बड़े शहर में अच्छी नौकरी पाने का सपना है.

Indien, Bangalore, IT-Park Electronics City

युवा सपने और हैं

वह दूसरे शहरों में पढ़ाई या नौकरी के लिए जाने लगा है. वहां कई तरह के दोस्त बनते बिगड़ते हैं. आपस में लाइफ स्टाइल, फिल्मों, मोबाइल, नौकरी, पढ़ाई या निजी आनंद की बातें होती हैं. कई मौकों पर तो कट्टर धार्मिक विचारों वाले सहपाठियों का मजाक तक उड़ाया जाने लगा है.

वह चाहे किसी परिवार या संप्रदाय से आता हो, उसकी प्राथमिकता में अब परिवार, नौकरी और शांत माहौल जैसी चीजें आती हैं. 1990 के युवा के तुलना में आज के जवान वर्ग पैंट नहीं बल्कि जींस टी शर्ट पहना पसंद है. समय मिले तो वह दोस्तों से मिलता है. बड़े शहरों की दौड़ती भागती जिंदगी में अब मंदिर मस्जिद झगड़े के लिए न के बराबर जगह बची है.

छोटे शहरों में भी गली गली में अब पीसीओ, साइबर कैफे या कई तरह की दुकानें हैं. खेती से ज्यादा पर पढ़ाई लिखाई पर जोर दिया जाता है. यह भी एक वजह है कि जानकारी बढ़ने के दौर में अयोध्या विवाद जैसी चीजें युवा वर्ग को महत्वहीन दिखाई पड़ती हैं.

दफ्तर से लंबी छुट्टी मिलते ही लोग या तो परिवार के साथ वक्त बिताते हैं या सैर सपाटे पर जाते हैं. चार धाम यात्रा या अन्य धार्मिक यात्राओं को अब उम्र से जोड़कर देखा जाता है. हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों की सबसे बड़ी हार यही युवा हैं.

गुड़गांव में एक आईटी कंपनी में कार्यरत विनीत कुमार कहते हैं, ''मंदिर, मस्जिद से अब मुझे कोई मतलब नहीं है. अयोध्या में कोई ऐसी चीज बन जाए कि जिसमें सभी खुश रहें और भविष्य में कभी यह मुद्दा उठे ही न.''

अयोध्या मुद्दे की आंच से सत्ता के गुब्बारे में बैठने वाली बीजेपी भी अब विकास की बातें करती है. गुजरात के उसके मुख्यमंत्री विकास का हवाला देते हैं. आर्थिक तरक्की का श्रेय लेने की होड़ लगी रहती है. प्रधानमंत्री अपने काफिले की वजह से एक मरीज की मौत होने पर अफसोस जताते हैं. तस्वीर बताती है कि यह 1992 वाला भारत नहीं है.

रिपोर्टः ओंकार सिंह जनौटी

संपादनः वी कुमार

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