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दुनिया

अयोध्या यानी आडवाणी का कुरुक्षेत्र

अयोध्या में विवादित जमीन का झगड़ा पुराना है. पिछले सालों में इस विवाद के साथ जो नाम निकट रूप से जुड़े रहे हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी का है.

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लाल कृष्ण आडवाणी

सोमनाथ मंदिर से अयोध्या की रथयात्रा के साथ जमीन के विवाद ने दो समुदायों के विवाद का रूप ले लिया. इस विवाद ने हजारों जानें लीं और आज भी घरेलू आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा है.

आडवाणी ने एक बार रथयात्रा को अपने राजनीतिक जीवन का उत्कर्ष बताया था. सच तो यह है कि इस रथयात्रा ने आडवाणी को राजनीतिक उत्कर्ष की संभावनाएं दीं तो संभावनाएं निर्दयता के साथ छीनीं भी. 45 साल की उम्र में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बनने वाले आडवाणी जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण लेकिन विवादास्पद नेता रहे हैं.

पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण पर मंडल आयोग की रिपोर्ट पर बढ़ते असंतोष के बीच आडवाणी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के परिसर में राम मंदिर के निर्माण को हिंदुओं को लामबंद करने का मुद्दा बनाया. सोमनाथ से निकाली गई उनकी रथयात्रा से उनकी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर लाने में सफलता तो मिली लेकिन इस रास्ते पर पार्टी ने राष्ट्र की एकता और सहिष्णुता को दरकिनार कर दिया.

आडवाणी की रथयात्रा का नतीजा 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और इस प्रक्रिया में दोनों समुदायों के हजारों लोगों के मारे जाने के रूप में सामने आया. उनकी बीजेपी एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से ली जाने वाली पार्टी बन रही थी, दूसरी ओर उसने देश के अल्पसंख्यकों का भरोसा गंवा दिया था.

आडवाणी की सांगठनिक क्षमता के कारण बीजेपी 1996 में संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उसे देश के इतिहास में पहली बार सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया. अटल बिहारी वाजपेयी ने पहले बीजेपी प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली लेकिन बहुमत का समर्थन हासिल नहीं कर पाए और 13 दिन के बाद ही इस्तीफा दे दिया.

1998 के चुनावों में आडवाणी वाजपेयी के लिए बहुमत जुटाने में सफल रहे, खुद गृहमंत्री बने, लेकिन साथ की पार्टियां उन्हें सारा समय संदेह की नजर से देखती रहीं.

अपने राजनीतिक जीवन में सिर्फ दो बार मंत्री रहे आडवाणी को गृहमंत्री के रूप में जीवन का सबसे बड़ा मौका मिला था. बीजेपी को देश की आधुनिक कंजरवेटिव पार्टी के रूप में स्थापित करने और पुलिस बल का आधुनिकीकरण कर भारत को आधुनिक लोकतंत्र बनाने का. दोनों ही मोर्चों पर वह बुरी तरह असफल रहे और अंततः प्रधानमंत्री बनने का नैसर्गिक हक खो बैठे. पहले तो सहयोगी नानुकर और टाटमटोल करते रहे, फिर 2009 के चुनावों में जनता ने भी नकार दिया.

कुछ साल पहले आडवाणी ने कहा था कि राम मंदिर का निर्माण उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना है. इस सपने को पूरा करने, अयोध्या में दोनों संप्रदायों के बीच समझौता करवाने और सहिष्णुता का पुल बनाने के अवसर को उन्होंने गंवा दिया. अयोध्या उनके राजनीतिक जीवन का कुरुक्षेत्र बनकर रह गया.

रिपोर्टः महेश झा

संपादनः वी कुमार

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