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जर्मन चुनाव

अयोध्या पर फैसला 28 तक टला

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर फैसला टालने का आदेश दिया है. इसके साथ ही शुक्रवार को हाई कोर्ट का निर्णय नहीं आएगा. सुलह समझौते की संभावनाएं बढ़ीं.

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सुरक्षा बंदोबस्त कड़ी

सुप्रीम कोर्ट ने रमेशचंद्र त्रिपाठी की अर्जी आखिरकार स्वीकार कर इलाहबाद हाई कोर्ट के 24 सितंबर को आने वाले फैसले पर एक सप्ताह तक की रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश आर रवीन्द्रन और न्यायाधीश एचएस गोखले की खंडपीठ ने समझौते की संभावनाएं टटोलने के लिए इस मामले के दोनों पक्षकारों को नोटिस जारी कर सुनवाई की अगली तारीख 28 सितम्बर को अदालत में पेश होने को कहा है.

सेवानिवृत्त नौकरशाह रमेशचंद्र त्रिपाठी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा उनकी अर्जी को खारिज करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अब इस मामले के बहुप्रतीक्षित फैसले के भविष्य पर ही सवालिया निशान लग गया है.

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अयोध्या विवाद के लिए हाई कोर्ट की गठित विशेष बेंच के एक न्यायाधीश जस्टिस धर्मवीर शर्मा पहली अकूबर को रिटायर हो रहे हैं. कानूनी नियमों के मुताबिक खंडपीठ के किसी भी जज के रिटायर होने पर नई खंडपीठ का गठन किया जाता है और फिर से सुनवाई होती है. बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि की मिल्कियत के निर्धारण को लेकर 60 साल से चल रहे इस मुकदमे में जजों के रिटायर या ट्रांसफर के कारण हाई कोर्ट को 14 बार नई बेंच बनानी पड़ी. ये वही जस्टिस शर्मा हैं जिन्होंने हाल ही में त्रिपाठी की अर्जी ख़ारिज किए जाने का विरोध किया था. इस बेंच में जस्टिस शर्मा के अलावा दो अन्य जज न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल और न्यायाधीश एसयू खान हैं.

त्रिपाठी ने हाई कोर्ट के फैसले के कारण देश में शांति व्यवस्था को गंभीर खतरा होने और इस वजह से कॉमनवेल्थ खेलों पर भी असर पड़ने की आशंका जताते हुए फैसला टालने की अपील की है. साथ ही वह अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 89 के तहत दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौते की संभावनाओं का हवाला देकर फैसले को टालने की मांग कर रहे हैं.

मामला भले ही पिछले 60 साल से अदालत में विचाराधीन हो लेकिन इसके सियासी इस्तेमाल की कवायद शुरू होते ही मामला अचानक संवेदनशील हो गया. इसकी परिणति 6 दिसंबर 1992 को उस समय देखने को मिली जब बीजेपी और कट्टरपंथी हिंदू संगठनों की अपील पर अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. इसके साथ ही यह मामला दुनिया की नजरों में आ गया.

उस दौरान देश भर में हुए सांप्रदायिक दंगों को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद भी दंगे भड़कने की आशंका जताई जा रही थी. शांति व्यवस्था बनाए रखने की चारों ओर से हो रही अपीलों के बीच केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने हर तरह के एहतियाती इंतजाम कर लिए थे. इतना ही नहीं राज्य में स्कूल कॉलेज भी अगले कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए गए. हालात नाजुक बनने के बावजूद समाज के लगभग सभी वर्गों को फैसले का इंतजार है. क्योंकि लोग पहले से ही काफी इंतजार के बाद अब और इंतजार के मूड में नहीं हैं.

रिपोर्टः लखनऊ से सुहेल वहीद/निर्मल

संपादनः ए जमाल

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