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ताना बाना

अमेरिकी वीजा की फीस बढ़ाना भेदभावपूर्णः भारत

भारत ने अमेरिकी वीजा की फीस बढ़ाने को भेदभावपूर्ण कहा है. वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि वीजा फीस बढ़ने से भारतीय कंपनियों पर सालाना 20 करोड़ डॉलर का बोझ पड़ेगा. प्रतियोगी माहौल में उनकी मुश्किल बढ़ेंगी

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अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉन किर्क को लिखे पत्र में शर्मा ने कहा है, "इस बिल की वजह से भारतीय कंपनियों को सालाना 20 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा. इससे प्रतियोगी माहौल में टिके रहने की उनकी क्षमता पर असर होगा और यह भारतीय कंपनियों के व्यावसायिक हितों के खिलाफ है."

अमेरिकी सीनेट ने 5 अगस्त को एच1 बी और एल वीजा की फीस में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी को मंजूरी दे दी. यही वे वीजा हैं जिनका इस्तेमाल बहुत से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स करते हैं. इस बढ़ोत्तरी के जरिए 60 करोड़ डॉलर के उस अमेरिकी इमरजेंसी पैकेज के रकम जुटाई जानी है जिसके जरिए मैक्सिको से लगने वाली सीमा पर सुरक्षा को बेहतर किया जाएगा.

सीनेट ने उन कंपनियों के लिए वीजा फीस बढ़ा कर दो हजार अमेरिकी डॉलर कर दी है जिनके यहां 50 प्रतिशत से कम अमेरिकी नागरिकों को कर्मचारी के तौर पर रखा गया है. अपने पत्र में शर्मा ने भारतीय आईटी इंडस्ट्री की चिंताओं को दर्शाया है. खास कर इससे भारतीय मूल की वे कंपनियां प्रभावित होंगी, जिनके खाते में अमेरिका की तरफ से दिए जाने वाले कुल वीजा का 12 प्रतिशत हिस्सा आता है.

शर्मा ने कहा है कि यह बात समझी जा सकती है कि अमेरिकी सरकार अपनी सीमाओं की सुरक्षा बेहतर करना चाहती है, लेकिन इस तरह के भेदभावपूर्ण कानून का भारतीय कंपनियों पर बहुत बुरा असर होगा. हालांकि एच1 बी और एल वीजा का इस्तेमाल करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर फीस बढ़ने का कोई असर नहीं होगा. लेकिन भारतीय कंपनियों की इसकी वजह से काफी अतिरिक्त बोझ झेलना होगा क्योंकि उनके 50 प्रतिशत से ज्यादा कर्मचारी इन्हीं वीजाओं का इस्तेमाल करते हैं.

शर्मा ने कहा कि भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ही उस अमेरिकी कानून का बोझ बर्दाश्त कर रहा है जिससे अमेरिकी सरकार को हर साल सामाजिक सुरक्षा के नाम पर एक अरब अमेरिकी डॉलर की रकम देनी पड़ती है. इसके बदले उन्हें कोई खास फायदा नहीं मिलता और इस रकम के वापस होने की उम्मीद भी नहीं है.

सोमवार को भारत की विशाल सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने कहा कि अमेरिकी वीजा की फीस बढ़ाए जाना भेदभावपूर्ण है और इससे खुला प्रतियोगी बाजार कायम करने में मदद नहीं मिलती.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः एस गौड़

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