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दुनिया

अमेरिका से नाराज दुनिया

सीआईए द्वारा ग्वांतानामो जेल में कैदियों को यातना दिए जाने का समाचार अरब जगत में गुस्सा और नाराजगी लेकर आया है. अरब अखबारों और मीडिया संस्थानों ने इस मुद्दे पर अमेरिका को आड़े हाथों लिया है.

"यह शर्मनाक है." सीआईए द्वारा यातना दिए जाने के खुलासे के बाद इंटरनेट अखबार "राय अल यौम" ने यह कहते हुए स्वतंत्रता, मानवाधिकार और सम्मान का हवाला दिया है. उसका कहना है कि जिन आदर्शों की बात खुद अमेरिका करता है, वह उन्हें खुद नहीं मानता. अखबार की टिप्पणी है, "अमेरिका और पश्चिमी देशों ने सारा अधिकार खो दिया है कि वे हमें लोकतंत्र और मानवाधिकार पर लेक्चर दें."

अखबार का कहना है कि रिपोर्ट ने तथ्यों का खुलासा किया है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि इसके सामने आने के बाद कानूनी और सूचना की स्वतंत्रता भी मजबूत होगी. इसका कहना है कि यह रिपोर्ट भी घटना के 13 साल बाद तक प्रकाशित नहीं की गई. इसके अलावा किसी को इसके लिए जिम्मेदार भी नहीं बताया गया है. "राय अल यौम" ने लिखा है कि उन्हें इसलिए प्रताड़ना दी गई क्योंकि वे मुस्लिम थे.

अखबार लिखता है कि आपने उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिया और इस तरह वे अपने सभी अधिकार खो बैठे, उनके साथ अमानवीय सलूक किया गया. और यह सब ऐसे देश के नाम पर किया गया, जो खुद को स्वतंत्र विश्व का खलीफा समझता है. "और यह देश अपने विमानों से विदेशों पर हमला करता है, उन पर कब्जा करता है, उनके तंत्र को बर्बाद कर देता है और स्वतंत्रता और लोकतंत्र के नाम पर वहां के हजारों लाखों नागरिकों की हत्याएं करता है. इराक, सीरिया, लीबिया और यमन में यही तो हुआ है."

"राय अल यौम" के प्रकाशक अब्दुल बारी अतवान अपनी तीखी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. हालांकि उनके समाचारपत्र में जो संपादकीय छपा है, वह अरब जगत की भावनाओं को दर्शाता है.

"अल इलाफ" नाम के अखबार के एक पाठक ने लिखा है कि अमेरिका खुद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र तथा कानून व्यवस्था का पुरोधा बताता है, लेकिन सच्चाई में अपने तानाशाही रवैये को छिपाता है, "वह मानवता, नैतिकता, सिद्धांतों और मूल्यों में यकीन नहीं रखता. ये सिर्फ नारे हैं."

"अल हयात" के एक पाठक ने लिखा है कि इससे साजिश की भी बू आती है कि अल कायदा के पीछे अमेरिका और इ्स्राएल जैसी ताकतें हैं, "आपके पास ओसामा बिन लादेन और उसका गैंग था, जिसने लाखों लाख बच्चों, औरतों और युवाओं का नुकसान किया, उनकी मौत हुई, वे बेघर हुए और पूरे अरब जगत में अफरा तफरी फैल गई."

टेलीविजन चैनल "अल जजीरा" का एक दर्शक इसके पीछे उत्तर अमेरिका की अंदरूनी राजनीति को जिम्मेदार मानता है. उसका कहना है कि अगर अमेरिका के अंदर रंग के आधार पर पुलिस किसी अमेरिकी को मार सकती है, तो फिर अमेरिका से बाहर के मुस्लिमों को उससे इंसाफ की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इसके अलावा रिपोर्ट मध्य पूर्व के दरवाजे पर आकर बंद हो जाती है, "बशर अल असद, अब्दुल फतेह सिसी और इस्राएल हमारे लोगों के साथ क्या कर रहे हैं, यह इस बात का प्रमाण है कि पूंजीवाद और उपनिवेशवाद से कोई इंसाफ की उम्मीद करे."

एक दूसरे दर्शक का कहना है कि आपको हर किसी के काम पर नजर रखनी चाहिए. अमेरिकियों ने "बर्बर" तरीके अपनाए, "यह बात अलग है कि खुद अरब और मुस्लिम जगत के लोग आपस में जो एक दूसरे के साथ मानसिक और शारीरिक बर्ताव करते हैं, उसे देखते हुए तो अमेरिकी बर्बर फरिश्ते लगते हैं."

"राय अल यौम" के एक पाठक भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं, उसके मुताबिक कई कैदियों को उनके देश वापस भेज दिया गया, जहां के स्थानीय अधिकारी उनसे पूछताछ कर रहे हैं. पाठक इस सूचना के जरिए अपना तर्क रखता है, "बिना किसी अपवाद के वे सब इस मामले में शामिल हैं, वे अमेरिका के दास हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं."

ऑनलाइन अखबार "अल अरबीया अल जदीद" में टिप्पणीकार सईद अरीकात का कहना है कि यह बात तो रिपोर्ट सामने आने से पहले ही पता थी कि इससे गुस्सा और शक पैदा होगा. उनका कहना है, "क्या ऐसे वक्त में यह रिपोर्ट छापना सही है, जब अमेरिका सीधे तौर पर एक अरब देश में संकट में शामिल है. या फिर समय का चुनाव बदकिस्मती है जिसकी मदद से अमेरिका विरोधी भावनाएं भड़काई जा रही हैं."

उनका कहना है कि हर हाल में अमेरिका की छवि धूमिल हो रही है, "इस रिपोर्ट की वजह से अमेरिका के स्वतंत्रता और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता पर खराब छाया पड़ेगी और इससे अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी कमजोर होगा." सईद अरीकात का कहना है सिर्फ अमेरिका ही नहीं, "कोई भी समाज अगर यातना को वैधानिक प्रयोग मानता है, तो अपनी स्वतंत्रता का बड़ा हिस्सा खो देता है."

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