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दुनिया

अमेरिका से दोस्ती भारत को भारी पड़ेगी

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत से रवाना होने के तुरंत बाद भारतीय कॉम्युनिस्ट पार्टी ने ये चेतावनी दी है. सीपीआई का कहना है अमेरिका से गहरी दोस्ती से भारत के राष्ट्रीय हित और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा.

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सीपीआई मानती है कि अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों के बारे में की गई ज्यादातर अमेरिकी घोषणाएं चीन को केंद्र में रख कर की गई हैं और इनका भारत के हित से कोई लेना देना नहीं है. सीपीआई ने भारतीय लोगों से भविष्य में होने वाले नुकसान के बारे में दुगुना चौकस रहने को कहा है.

सीपीआई मुख्यालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, "अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आर्थिक एजेंडा और विदेश नीति के मामले में अपनी ख्वाहिशों के साथ भारत आए जिसका मकसद उनके अपने देश के हित में बढ़ते आर्थिक संकट का हल ढूंढना है."

Indien Obama Proteste

ओबामा की भारत यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन

पार्टी की तरफ से जारी बयान में ये भी कहा गया है, "अमेरिका के साथ गहरी होती दोस्ती और भारत के रणनीतिक साझीदार बनने की तथाकथित खबरों के बाद अब भारतीय लोगों को भविष्य में होने वाले नुकसान की तरफ अपनी चौकसी दुगुनी कर लेनी चाहिए. इस दोस्ती से भारत के राष्ट्रीय आर्थिक हितों को नुकसान तो पहुंचेगा. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति के लिए स्वतंत्र विदेश नीति और दुनिया को बहुध्रुवीय बनाने की कोशिश करने वाले देश की छवि पर भी बुरा असर पड़ेगा."

बयान के मुताबिक "ओबामा आर्थिक संकट से जूझ रहे अपने देश के लिए 15 अरब डॉलर के कारोबारी सौदों के रूप में अपनी चाहत पूरी कर वापस लौट गए हैं. इसके बदले में भारत को कूटनीतिक भाषा में उलझे राजनीतिक और रणनीतिक फायदा का भरोसा दिलाया गया. इस कूटनीतिक भाषा का अर्थ भारत में अमेरिकी लॉबी को बताने की जरूरत पड़ेगी."

भारत संयुक्त राष्ट्र में सुधार होने पर सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए अगले दो साल तक अस्थायी सदस्य के रूप में एक तरह की परीक्षा की दौर से गुजरेगा. सीपीआई के मुताबिक, " भारत की जांच इस रूप में होगी कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में वो अमेरिकी हितों को कितना फायदा पहुंचाता है."

सीपीआई ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वो भोपाल गैस कांड के दोषी वारेन एंडरसन को भारत को सौंपने की मांग करने में नाकाम रही है. इसके साथ ही पाकिस्तानी अमेरिकी नागरिक डेविड हेडली पर भी अपना रुख साफ नहीं कर सकी.

सीपीआई ने दूसरी वामपंथी पार्टियों के साथ मिल कर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन भी किया. सीपीआई का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने आउटसोर्सिंग के मामले में जरा सा भी लचीलापन नहीं दिखाया. इसके अलावा अमेरिकी विदेश नीति भी सीपीआई के निशाने पर है. सीपीआई के मुताबिक,"राष्ट्रपति ओबामा ने ईरान और अपनी पसंद के दूसरे देशों में मानवाधिकार के मसले पर तो सबसे अपनी बात मनवा ली लेकिन फलीस्तीन में इस्राएल के जरिए हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की अनदेखी की जा रही है."

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः उज्ज्वल भट्टाचार्य

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