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दुनिया

अमेरिका जाकर क्या जताना चाहते हैं करजई

हामिद करजई अमेरिका के दौरे पर हैं. उन के लिए यह मौका तालिबान और पड़ोसी देश पाकिस्तान को यह दिखाने का है कि अमेरिका उनके साथ है. कुछ ही महीने में चुनाव होने हैं और इस लिहाज से भी यह दौरा अहम है.

मंगलवार को अफगान राष्ट्रपती हामिद करजई ने अपनी चार दिन की अमेरिका यात्रा शुरू की. बराक ओबामा से अफगान राष्ट्रपति की इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है. इस यात्रा के दौरान करजई अमेरिकी राष्ट्रपति से देश के मौजूदा हालात पर तो चर्चा करेंगे ही, साथ ही 2014 में नाटो और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल के देश से चले जाने के बाद की स्थिति भी मुख्य मुद्दा रहेगी.

नाटो की वापसी

अफगानिस्तान में जल्द ही राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं. माना जा रहा है कि करजई इसे ले कर भी अपनी रणनीति ओबामा के सामने रखेंगे. अफगानिस्तान के भविष्य के लिए यह चुनाव और सेनाओं का वापस जाना दोनों ही अहम साबित होंगे. इसके अलावा देश की अर्थव्यवस्था और पड़ोसी देशों के साथ अफगानिस्तान के संबंधों पर भी चर्चा होगी. इसमें पाकिस्तान की भूमिका सब से बढ़ कर है. अफगानिस्तान सुरक्षा के लिहाज से पाकिस्तान के साथ एक समझौते पर पहुंचना चाहता है. इस पर करजई ओबामा से बातचीत करेंगे.

अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में नाटो की सेनाएं वापस बुलाई जा चुकी हैं. जानकारों का मानना है कि 2014 में सेना की अगली टुकड़ी को वापस भेज देने के बाद भी देश में करीब 30 हजार नाटो सैनिक तैनात रहेंगे. हालांकि अफगानिस्तान को इस बात की चिंता भी सता रही है कि जब सेनाएं चली जाएंगी तब देश के दक्षिणी और पूर्वी हिस्से में खतरा बढ़ जाएगा. अफगानिस्तान का यह हिस्सा पाकिस्तान से लगा हुआ है. इस इलाके से तालिबान के हमले का डर है. यही वजह है की अफगानिस्तान चाह रहा है कि नाटो सेनाएं देश छोड़ने से पहले अफगान सेनाओं को इतना सक्षम बना कर जाएं कि वे तालिबान का सामना कर सकें.

पाकिस्तान से संकट

ओबमा के साथ मुलाकात के बारे में हामिद करजई के प्रवक्ता एमल फैजी का कहना है, "अफगान सुरक्षा बलों का प्रशिक्षण राष्ट्रपति करजई और राष्ट्रपति ओबामा के बीच बातचीत का मुख्य मुद्दा रहेगा. हम पहले ही यह बात साफ कर चुके हैं कि हमारी जरूरतों को देखते हुए अमेरिका को हमारी सेना को प्रशिक्षण देना चाहिए." फैजी का कहना है कि करजई पहले ही हथियार और साजो सामान की कमी से जूझ रही वायु सेना के लिए नए उपकरणों की इच्छा जाहिर कर चुके हैं.

पिछले 18 साल से अमेरिका पाकिस्तान को लड़ाकू विमान दे रहा है. अब अफगान वायु सेना के लिए मदद की मांग को पूरा करना अमेरिका के लिए थोड़ा मुश्किल होगा. दक्षिण एशिया मामलों के जानकार कोनराड शेट्टर का कहना है कि अमेरिका अफगानिस्तान की मांग पूरी नहीं कर पाएगा, "यदि अमेरिका अफगानिस्तान को विमान उपलब्ध कराता है तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच प्रतिस्पर्धा को देखते हुए तो यही लगता है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच रिश्ते बिगड़ जाएंगे. इस से पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों पर भी बुरा असर पड़ेगा. वॉशिंगटन में कोई भी इसकी पैरवी नहीं करेगा."

तालिबान से बातचीत

इस दौरे से करजई पाकिस्तान और तालिबान दोनों को ही अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों का संकेत भी देना चाहते हैं. शेट्टर का कहना है कि इस दौरे से पाकिस्तान पर दबाव पड़ेगा, "पाकिस्तान के लिए इसका मतलब साफ है कि वह अपने संबंध बेहतर करे नहीं तो वह अकेला रह जाएगा." तालिबान को करजई यह समझाना चाहते हैं कि शांतिवार्ता के लिए वे करजई को नजरअंदाज नहीं कर सकते. तालिबान केवल अमेरिका के साथ बातचीत करने की न सोचे, बल्कि करजई की भूमिका को भी समझे, क्योंकि करजई को अमेरिका का पूरा समर्थन हासिल है.

अफगान सरकार के अनुसार देश में शांति तब तक नहीं आएगी जब तक कि तालिबान को इस पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा. अमेरिका ने भी तालिबान के साथ बातचीत का स्वागत किया है. अमेरिकी सेनाएं पिछले दस साल से अफगानिस्तान में तैनात हैं. पर अब अमेरिका का कहना है कि जंग से हल नहीं निकल सकता. देश में शांति तभी आ सकती है जब तालिबान से बात की जाए. इस फैसले के साथ ही अमेरिका की यह योजना 2014 तक नाटो के 65 हजार सैनिक वापस बुलाने की तैयारी में है.

करजई अमेरिका के साथ अच्छे संबंधों का झंडा ले कर घूमते हुए अपनी ताकत भले दिखाना चाह रहे हों, लेकिन इस से उनकी अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता भी दिखाई देती है.

रिपोर्टः वसलत हजरत नाजिमी/ आईबी

संपादनः एन रंजन

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