अमेरिका को पछाड़ता ब्राजील | विज्ञान | DW | 26.01.2013
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विज्ञान

अमेरिका को पछाड़ता ब्राजील

सोयाबीन पैदा करने में अमेरिका सबसे आगे है, लेकिन 2013 के अंत तक इस जगह पर अमेरिका की जगह ब्राजील होगा. सोयाबीन की अथाह पैदावार के पीछे कौन से राज और कौन से खतरे छुपे हैं जिन्होंने समीकरण ही बदल कर रख दिए हैं.

ब्राजील का मध्य पूर्वी प्रांत देश का मुख्य अन्न भंडार है और यहीं से ब्राजील का दुनिया में सोयाबीन पैदा करने वाले सबसे बड़ा देश बनने का रास्ता बन रहा हैं. 1960 में सरकार ने जंगलों में केवल सोया उगाने के आदेश जारी किए. जंगल काटकर खेती के लिए जमीन तैयार की गई और जोर देकर लोगों को वहां विस्थापित किया गया. सोयाबीन ब्राजील की प्रमुख पैदावार है जिसका खूब निर्यात होता है. आधी फसल से तेल और आटा घरेलू स्तर पर ही निकाल लिया जाता है. बाकी चीन को निर्यात हो जाता है. अनुमान लगाए जा रहे हैं कि सोयाबीन की खेती में 2013 के अंत तक ब्राजील अमेरिका को पछाड़ सकता है.

अमेरिका में पैदावार में गिरावट

इस साल ब्राजील में 8.3 करोड़ टन सायोबीन की पैदावार की उम्मीद की जा रही है जो कि पिछले साल से 25 फीसदी ज्यादा है. कुल फसल का 60 फीसदी हिस्सा ब्राजील के मध्य पूर्वी प्रांत में पैदा होता है. संयुक्त राज्य के खाद्य और कृषि संगठन एफएओ के अनुमान के अनुसार अमेरिका इस साल केवल 7.8 करोड़ टन सोयाबीन पैदा करेगा जिसके कि पहले 8.7 करोड़ टन होने की उम्मीद की जा रही थी.

Argentinien Rinderherde

जंगल के जंगल उजड़ गए

एक तरफ तो सूखे के कारण उत्तरी अमेरिका में फसल को झटका लगा है. दूसरी तरफ ब्राजील में नई तकनीक और उर्वरकों ने फसल को फायदा पहुंचाया है. ब्राजील के कृषि मंत्रालय में सचिव नेरी गेलर ने डॉयचे वेले को बताया कि अब और जंगल नहीं काटे जाएंगे. खेती बढ़ाने के लिए कई दशकों से जंगलों के काट कर जमीन तैयार की जा रही थी.

फसल में भारी उछाल का श्रेय ब्राजील के किसानों, सरकार और संबंधित संगठनों की मिली जुली कोशिश को श्रेय है. ब्राजीली कम्पनियों को अब अमेजन नदी के जंगलों में उगे सोयाबीन को खरीदने की जरूरत नहीं है.

गावों तक पहुंचती तकनीक

गैर सरकारी पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस के रोमुलो बाटिस्टा के मुताबिक इस बदलाव के लिए कई और बातें भी जिम्मेदार हैं, जैसे सरकार का लगातार सैटेलाइट के जरिए नजर रखना. रोमुलो बाटिस्टा कहते हैं, "ग्राहकों का रवैया भी बदल रहा है. कई लोग जंगलों को काट कर उगाई गई फसल को खरीदने के खिलाफ दिखते हैं." ब्राजील की सोयाबीन एसोसिएशन के अध्यक्ष एंड्रिगो डालसिन ने बताया, "जंगलों से खाली हुए मैदान पहले केवल पशुओं को चराने के लिए इस्तेमाल में लाए जा रहे थे लेकिन अब इनका इस्तेमाल सोयाबीन उगाने के लिए भी किया जा रहा है." यही मैदान फसल कटने के बाद फिर पशु चराने में काम आते हैं. खेती और पशु पालन का यह साझा तरीका काफी फायदेमंद साबित हो रहा है.

खेती में नई तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल हो रहा है. जीपीएस और ऑटोपायलट की तकनीक भी काम में लाई जा रही है. इन तकनीकों से यह पता लगाया जा सकता है कि जमीन के किस हिस्से को ज्यादा उर्वरक चाहिए और किसे कम. इसके अलावा किसानों को फसल उगाने के लिए आर्थिक मदद मिलने के भी कई तरीके हैं. गेलर ने बताया कि इन तरीकों से जमीन का इस्तेमाल खेती के लिए और फिर उसी जमीन के इस्तेमाल पशुपालन के लिए हो रहा है, जो बेहद फायदेमंद है.

प्रसार और खतरे

ब्राजील में लगभग छह करोड़ हेक्टेयर जमीन अभी भी खाली पड़ी है लेकिन उसका फिर से खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है. एफएओ के पीटर थोएंस कहते हैं, "इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि हमारे पास जमीन की कमी नहीं है यानि और जंगल काटने की जरूरत नहीं है. हमें उम्मीद है कि पैदावार भविष्य में और बढ़ेगी ही. दुनिया में किसी भी और देश के पास फिलहाल इस तरह पैदावार बढ़ाने के संसाधन नहीं हैं. अमेरिका समेत दूसरे देशों में भी सारी जमीन पहले ही इस्तेमाल में है."

Brasilien Baum in Sao Paolo Aufforstung

आलोचना करते पर्यारणविद

बुरे प्रभाव

हालांकि पैदावर बढ़ाने के लिए और जंगल काटने की जरूरत नहीं है लेकिन सोया की बढ़ रही पैदावार के दूसरे खराब प्रभाव दिखाई दे रहे हैं. कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल और पौधों में कृत्रिम तरीकों से जेनेटिक परिवर्तन बड़ी चुनौती है. पौधों में जेनेटिक परिवर्तन को ब्राजील में 2005 से मान्यता मिली हुई है. लगभग 75 फीसदी फसल ऐसे ही पौधों की है. ग्रीनपीस के रोमुलो बाटिस्टा कहते हैं, "फसल के उगाने के तरीकों पर फिर से गौर किया जाना चाहिए. जंगलों और मैदानों में जैव विविधता बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है." सबसे ज्यादा सोया की पैदावार के अलावा ब्राजील कीटनाशकों के इस्तेमाल में भी सबसे आगे है. बाटिस्टा के अनुसार अभी तक इस बारे में कोई भी रिपोर्ट सामने नहीं आई है कि कीटनाशकों के इस्तेमाल से किसी तरह का कोई खतरा नहीं है. समय है इस बारे में सोचने और हल निकालने का.

रिपोर्ट: नादिया पोंटेस/एसएफ

संपादन: ओ सिंह

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