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ब्लॉग

अमेरिका के साथ लचीले संबंधों की जरूरत

चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है. लेकिन भारत के लिए ये सहयोग कितना फायदेमंद है? कुलदीप कुमार का कहना है कि अमेरिका के साथ अतीत को देखते हुए लचीले संबंधों की जरूरत है.

अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने अगले सप्ताह दक्षिण एशिया की यात्रा पर आने से पहले ही भारत, चीन और पाकिस्तान के संबंध में एक जोरदार बयान देकर अपनी यात्रा के महत्व से विश्व को अवगत करा दिया है. संकेतों की कूटनीति में विश्वास रखने वाले चीन के बारे में उनका सख्त बयान एक ऐसे समय आया है जब चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का पांच वर्ष में एक बार होने वाला महाधिवेशन चल रहा है और पार्टी महासचिव एवं देश के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करने में लगे हैं. इस बयान में भारत को बहुत अधिक महत्व दिया गया है लेकिन इस पर भावविभोर होने के बजाय भारत को स्थिर चित्त के साथ विचार करने की जरूरत है क्योंकि बयान में अमेरिका के साथ अगले एक सौ साल तक उसके संबंधों की रूपरेखा निर्धारित करने की कोशिश की गई है. विचारणीय बात यह है कि यह कोशिश बहुत कुछ एकतरफा है और केवल अमेरिकी दृष्टिकोण को दर्शाती है.

टिलरसन का कहना यह है कि भारत को एक भरोसेमंद साझेदार की जरूरत है और वह साझेदार अमेरिका है. अमेरिका और भारत दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण लोकतंत्र हैं और लोकतांत्रिक जीवनमूल्यों एवं नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यकीन करते हैं जबकि चीन अक्सर अपने हितों के लिए इस व्यवस्था को कमजोर करने का काम किया करता है. अमेरिका और भारत को जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन और उत्तरी कोरिया के खतरे का मुक़ाबला करना चाहिए. रस्मी तौर पर अमेरिकी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान की आलोचना में भी दो-तीन वाक्य कहे हैं लेकिन उनका मुख्य ज़ोर चीन के खिलाफ भारत को खड़ा करने में है.

भारत को अपने शिविर में लेने की अमेरिकी कोशिश नई नहीं है. 1950 के दशक से वह यह कोशिश करता आ रहा है. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपना कर तत्कालीन सोवियत एवं अमेरिकी शिविरों से अलग रहने का फैसला लिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्तमान सरकार गुटनिरपेक्षता की नीति को तो छोड़ चुकी है लेकिन भारत के हितों को साधने की राष्ट्रीय नीति को आगे बढ़ाना उसका कर्तव्य है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसका निवेश भी यहां लगातार बढ़ता जा रहा है. अभी तक भारत ने उसके साथ रणनीतिक साझेदारी का संबंध बनाकर चलने की नीति अपनाई है लेकिन रणनीतिक साझेदारी उसकी अन्य देशों के साथ भी है. चीन के साथ उसकी बहुत लंबी सीमा है और कई स्थानों पर सीमा विवाद अभी भी बरकरार है. पुरानी कहावत है कि हम अपने मित्र अपनी इच्छा से चुन सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं. इसलिए चीन और पाकिस्तान के साथ रहना भारत की नियति है.

रूस के साथ भी भारत के संबंध अच्छे हैं. चीन न केवल आर्थिक महाशक्ति है बल्कि सैन्य महाशक्ति भी है. अभी तक उसने सीमा विवाद को अलग रखकर भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाए रखने की नीति अपनायी है जिसके कारण दोनों देशों के बीच दशकों से छिटपुट गोलीबारी भी नहीं हुई है. लेकिन चीन भोला-भाला पड़ोसी नहीं है. वह पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त है और भारत के उत्तर-पूर्व में समय-समय पर चलने वाले सशस्त्र विद्रोहों को भी मदद देता रहा है. इसलिए उसके साथ भारत को बिना डरे या झिझके बहुत सुचिन्तित और संतुलित नीति अपनाने की जरूरत है.

अमेरिका का इतिहास बताता है कि उसे बहुत भरोसेमंद साथी नहीं समझा जा सकता. आतंकवाद के मसले पर वह आज तक पाकिस्तान की नाक में नकेल नहीं डाल पाया. बल्कि पांच साल तक बंधक बना कर रखे गए कैनेडियन-अमेरिकी परिवार की रिहाई के बाद राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट करके पाकिस्तान और उसके नेताओं के साथ कहीं बेहतर संबंध बनाने की बात कही है. यह ट्वीट ऐसे समय में आया है जब एक ओर विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन भारत के साथ अगले सौ साल तक के घनिष्ठ संबंध बनाने की बात कर रहे हैं, वहीं पाकिस्तान सरकार आतंकवादी सरगना हाफिज मुहम्मद सईद के खिलाफ आपराधिक आरोप वापस ले रही है.

अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाना भारत के हित में है क्योंकि उसके साथ आर्थिक, वैज्ञानिक-तकनीकी और सामरिक सहयोग भारत की शक्ति में वृद्धि ही करेगा. लेकिन विश्व राजनीति के मंच पर उसका स्थायी साझेदार बनकर अपने लिए भविष्य के विकल्पों को बंद कर लेना उसके हित में नहीं होगा. उसे न रूस और चीन जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को स्थायी रूप से परिभाषित करने की जरूरत है और न ही अमेरिका के साथ. इन्हें लचीला बनाए रखना ही उसके दीर्घकालिक हित में होगा.

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