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दुनिया

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति क्यों जाना चाहते हैं उत्तर कोरिया?

अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच तनाव का फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है. लेकिन इस तनावपूर्ण माहौल में भी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर उत्तर कोरिया जाना चाहते हैं.

उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच टकराव बढ़ रहा है. आये दिन दी जाने वाली धमकियों और दोनों देशों के नेताओं की तल्ख बयानबाजी ने माहौल और भी खराब कर दिया है. लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर इस स्थिति में दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने के इच्छुक हैं. उनकी इच्छा है कि वे एक बार उत्तर कोरिया जायें और कोरियाई शासक किम जोंग उन के साथ बैठ कर विवादों पर शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत करें. कार्टर की इस इच्छा का खुलासा करते हुए जॉर्जिया यूनिवर्सिटी के दक्षिण कोरियाई प्रोफेसर पार्क हान-शिक ने कहा कि कार्टर ने बीते सितंबर उनसे मुलाकात में कहा था कि वे तनावग्रस्त माहौल में सकारात्मक भूमिका निभाना चाहते हैं. वे कोरियाई प्रायद्वीप में पैदा होते तनाव को कम करना चाहते हैं, जैसा कि उन्होंने साल 1994 में किया था.

पार्क ने बताया कि कार्टर किम जोंग उन से निजी मुलाकात कर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच संभावित शांति समझौते व कोरियाई परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण प्रतिबंध से जुड़ी चर्चा करना चाहते हैं.

अंतिम उद्देश्य 

उन्होंने कहा कि कार्टर का लक्ष्य कोरियाई प्रायद्वीप में शांति स्थापित करना है. विश्लेषकों के मुताबिक उत्तर कोरिया इन वार्ता संभावनाओं का स्वागत कर सकता है. विश्लेषक मानते हैं कि ऐसी वार्ताएं न सिर्फ उत्तर कोरियाई प्रशासन के लिए प्रचार का साधन होंगी, बल्कि कोरियाई नेता किम जोंग उन के शासन को वैधता भी प्रदान करेंगी. इन वार्ता संभावनाओं को चीन और रूस की सरकारों का भी समर्थन मिल सकता है क्योंकि ये दोनों ही देश अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच चल रही तीखी बयानबाजी को समाप्त करने की पैरवी कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त वॉशिंगटन में भी एक बड़ा धड़ा बातचीत की सभी संभावनाओं को खंगालने का पक्षधर है. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, किसी पूर्व नेता को इस तरह की तवज्जो देने के पक्षधर होंगे या नहीं, इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है.

खबरों मुताबिक, सितंबर में एक अमेरिकी अधिकारी, कार्टर के घर पर ट्रंप का संदेश लेकर पहुंचे थे, जिसमें पूर्वोत्तर एशिया में बिगड़ती स्थिति और अमेरिकी राष्ट्रपति की कमजोर होती स्थिति पर चर्चा की गयी थी.

पिछले हफ्ते कार्टर ने वॉशिंगटन पोस्ट में छपे अपने लेख में कोरियाई प्रायद्वीप की मौजूदा स्थिति का भी जिक्र किया था. उन्होंने इस मसले को "विश्व शांति के लिए बड़ा खतरा" कहा था. उन्होंने कहा, "यह जरूरी है कि प्योंगयांग और वॉशिंगटन, बढ़ते तनाव को कम करने और स्थायी व शांतिपूर्ण समझौते तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता खोजें." लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का रुख इससे ठीक उलट है. संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप ने उत्तर कोरिया पर निशाना साधते हुए कहा था, "अगर उत्तर कोरिया अपने परमाणु विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाता है तो अमेरिका उसे पूरी तरह समाप्त कर देगा."

टोक्यो की टैंपल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर जैम्स ब्राउन के मुताबिक, "उत्तर कोरिया चाहता है कि अमेरिका उससे बात करने आगे आयें. क्योंकि उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अगर अमेरिका अपना स्टैंड बदलता है और गैर परमाणु उत्तर कोरिया की अपनी प्रतिबद्धता को छोड़ता है तो वह उत्तर कोरिया के लिए किसी जीत से कम नहीं होगा."

पिछले कदम

ब्राउन ने कहा, "कार्टर और किम जोंग उन के बीच कोई भी बातचीत आम आधिकारिक वार्ता नहीं होगी, बल्कि यह उत्तर को और अधिक वैधता देना होगा, जो वो चाहता है." कार्टर का पिछला रिकॉर्ड इस पूरे मामले को और भी दिलचस्प बना देता है. साल 1994 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन, उत्तर कोरिया के परमाणु रिएक्टर पर हमले की योजना तैयार कर रहे थे उस दौरान भी कार्टर ने इस मसले में दखल दिया था. कार्टर उस साल जून में प्योंगयांग गए थे और उन्होंने तात्कालीन शासक किम इल सुंग के साथ परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौता किया था. इसके चार महीने बाद अमेरिका और उत्तर कोरिया ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म कर लिया. साल 2010 में एक बार कार्टर ने एक अमेरिकी नागिरक को उत्तर कोरियाई जेल से निकालने की बातचीत प्रक्रिया में दखल दिया था. विशेषज्ञ मानते हैं अब भी तनाव कम करने के लिए बातचीत का विकल्प ही सबसे बेहतर है. 

ज्यूलियन रेयाल/एए

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