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दुनिया

अमेरिका और भारत का चीन को साफ इशारा

भारत ने पहली बार अमेरिका के साथ खड़े होकर चीन को इशारों में चेतावनी भरे संकेत दिये हैं. अमेरिकी प्रशासन ने साफ किया है कि हिंद महासागर और एशिया प्रशांत इलाके में किसी एक की हेकड़ी नहीं चलेगी.

चौथी बार अमेरिका दौरे पर गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ लंच पर मुलाकात की. दोनों नेताओं के बीच हुई सातवीं मुलाकात में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की सदस्यता, आपसी सहयोग, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजिम (एमटीसीआर) समेत कई मुद्दों पर बात हुई. द्विपक्षीय बातचीत से पहले ही अमेरिका ने 34 सदस्यों वाली एमटीसीआर में भारत की एंट्री तय कर दी. किसी भी सदस्य ने नई दिल्ली की सदस्यता का विरोध नहीं किया. बीजिंग इसका सदस्य नहीं है.

एमटीसीआर के सारे सदस्य न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भी हैं. एमटीसीआर में भारत के दाखिले से चीन को यह साफ संदेश दिया गया है कि बहुमत भारत के साथ है. बीजिंग एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध कर रहा है. चीन चाहता है कि अगर भारत एनएसजी का सदस्य बने तो पाकिस्तान को भी 48 देशों के इस समूह में दाखिला मिले. परमाणु अप्रसार के मामले में इस्लामाबाद बदनाम है.

द्विपक्षीय वार्ता के दौरान चीन की चर्चा भी हुई. भारत और अमेरिका चीन के रुख से असहज हो रहे हैं. एशिया-प्रशांत इलाके में दुनिया की 60 फीसदी आबादी रहती है. चीन यहां कारोबार, समुद्री परिवहन, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में एकाधिकार सा जमा रहा है. दक्षिण चीन सागर को लेकर उसका आसियान देशों और जापान से विवाद है. बीजिंग पड़ोसियों के साथ जारी खटपट को कम करने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है, उल्टा वह आए दिन आक्रामक तेवर दिखा रहा है.

दोनों देशों ने साझा बयान भी जारी किया, इसमें भारत को अमेरिका का बड़ा रक्षा साझेदार कहा गया है. वॉशिंगटन ने तकनीक मुहैया कराने और मेक इन इंडिया अभियान के तहत भारत में निर्माण करने का एलान किया है.

दोनों देशों ने तीन मुद्दों पर साथ काम करने के लिए एक रोडमैप भी तैयार किया है. एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा, "इस बात को स्वीकार किया गया है कि विकास के साथ भारत अपने हितों की भी रक्षा करेगा, सिर्फ इलाके में ही नहीं बल्कि व्यापक पैमाने पर एशिया प्रशांत में, खास तौर पर हिंद महासागर में, जब तक भारत सुरक्षा तंत्र मुहैया कराने में सक्षम नहीं हो जाता तब तक उसकी मदद करना अमेरिका के हित में है."

अमेरिकी अधिकारी ने यह भी कहा कि, "भारत हमारे साथ ऑपरेट करे या न करे, हम भारत को उसके हितों की रक्षा करने लायक बनाने के प्रति वचनबद्ध हैं, ताकि हिंद महासागर इलाके में समुद्री परिवहन को किसी भी तरह के खतरे से मुक्त रखा जाए, जिस तरह से यह दक्षिण चीन सागर में किया जा रहा है."

इसी हफ्ते चीन और अमेरिका के बीच भी बीजिंग में द्विपक्षीय वार्ता हुई. लेकिन इसके नतीजे बहुत सकारात्मक नहीं निकले. इलाके में वर्चस्व और समुद्र में मुक्त आवागम के अधिकार पर तल्खी बनी रही. रिपोर्टों के मुताबिक चीन दक्षिण चीन सागर पर बनाए गए अपने कृत्रिम द्वीप को अब सैन्य इलाका घोषित करना चाहता है. ऐसा हुआ तो जहाजों और विमानों को उस इलाके से गुजरने में मुश्किल होगी. अमेरिका, जापान और आसियान देश इसका विरोध कर रहे हैं.

लंबे समय तक एक दूसरे से दूरी बनाने वाले भारत और अमेरिका बीते दो दशक में करीब आ रहे हैं. यह बदलाव बराक ओबामा से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश के कार्यकाल के दौरान आया. बुश ने पाकिस्तान की जगह भारत को अहमियत देनी शुरू की. अब वॉशिंगटन की दोनों राजनैतिक पार्टियां एकमत से नई दिल्ली के साथ खड़ी दिखाई पड़ने लगी हैं. चीन दोनों की साझा चिंता है. भारत का जहां चीन के साथ पुराना सीमा विवाद है, वहीं वॉशिंगटन बीजिंग की हर क्षेत्र में बढ़ती ताकत से खीझ रहा है.

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