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मनोरंजन

अभी अभिनय करते रहना चाहते हैं अक्षय

खिलाड़ी सीरिज की कामयाब फिल्मों के सबसे बड़े खिलाड़ी कहे जाने वाले अक्षय कुमार को अपने असली जीवन में भी खेलों से काफी लगाव है. लेकिन वे फिलहाल अभिनय करते रहना चाहते हैं.

हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय एक्शन हीरो अक्षय कुमार मानते हैं कि करियर में अच्छा-बुरा दौर तो लगा ही रहता है. लेकिन एक अभिनेता को यह सब भूल कर अपने काम पर ध्यान देना चाहिए. पिछले दिनों फुटबाल के एक कार्यक्रम में शिरकत करने कोलकाता पहुंचे अक्षय कुमार ने विभिन्न मुद्दों पर डॉयचे वेले के साथ बातचीत की. पेश हैं उसके मुख्य अंशः

आपको अपनी फिल्मों की वजह से खिलाड़ी भी कहा जाता है. असली जीवन में खेलों से आपका कितना लगाव है?

मुझे खेलों से बेहद लगाव है. हॉकी से लेकर फुटबाल और क्रिकेट तक, समय मिलते ही मैं मैच देखने पहुंच जाता हूं. खेलों को बढ़ावा देने के लिए मैं हमेशा तत्पर रहता हूं. बचपन में दिल्ली की गलियों में मैंने काफी क्रिकेट खेली है. मैं विवियन रिचर्ड्स, सुनील गावस्कर, इमरान खान और सचिन तेंदुलकर का फैन रहा हूं. अपनी फिल्म पटियाला हाउस के दौरान क्रिकेट की कई जानी-मानी हस्तियों के साथ करीब से काम करने का भी मौका मिला.

अपने फिल्मी करियर में आपने लगभग 25 साल पूरे कर लिए हैं. आगे कोई खास मंजिल पाने की तमन्ना?

अब तो फिल्म उद्योग मेरी सांस में रच-बस गया है. इसके अलावा कुछ और करने की सोच भी नहीं सकता. बस दर्शकों का प्यार मिलता रहे, उससे आगे कोई मंजिल नहीं.

अब तक का सफर कैसा रहा है?

यह मिला-जुला रहा है. इस दौरान अच्छे और बुरे दोनों अनुभव हुए हैं. लेकिन मैं कामयाबी हासिल करने के लिए कृतसंकल्प था. कड़ी मेहनत और लगन के बिना कामयाबी हासिल करना मुश्किल है. कह सकता हूं कि मेरे कंधों पर भगवान का भी हाथ था.

आपको खासकर नब्बे के दशक में नाकामी का लंबा दौर देखना पड़ा था. लेकिन उसके बाद आपने तमाम आलोचकों का मुंह बंद करते हुए दोबारा कामयाबी हासिल की. इसकी वजह?

मैं बैंकाक में रहने के दौरान कई तरह के काम कर चुका हूं. वहां रोजी-रोटी के लिए फाइटिंग भी करता था. अब आप हर फाइट तो जीत नहीं सकते. लेकिन हार के बाद दोबारा अगली फाइट के लिए उठ खड़ा होना आपके आत्मविश्वास और मजबूत इरादों का सबूत है. नाकामी या कामयाबी मेरे लिए खास मायने नहीं रखती. बॉक्सिंग रिंग में यानी अभिनय में बने रहना ही सबसे अहम चीज है. किसी भी करियर में उतार-चढ़ाव का दौर तो लगा ही रहता है. अभिनय भी इसका अपवाद नहीं है.

जीवन में सबसे ज्यादा किस चीज को महत्व देते हैं?

मैं रिश्तों को सबसे ज्यादा अहमियत देता हूं. मैं हर रिश्ते को निभाने की ईमानदार कोशिश करता हूं.

अपनी प्रोडक्शन कंपनी के जरिए कैसी फिल्में बनाना चाहते हैं?

फिलहाल तो व्यावसायिक फिल्में बना रहा हूं. लेकिन मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जिनसे समाज में कुछ बदलाव आए. इसलिए हमने ओ माई गॉड और 72 माइल्स एक प्रवास जैसी फिल्में बनाईं. हम लोग मराठी फिल्में भी बना रहे हैं.

आपके लिए फिल्मों के चयन का पैमाना क्या है?

फिल्म की पटकथा और कई मामलों में निर्देशक. कुछ निर्देशकों के साथ काम करने में पटकथा खास मायने नहीं रखती. आपको पता होता है कि अमुक निर्देशक की फिल्म में पटकथा कमजोर हो ही नहीं सकती.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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