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मनोरंजन

"अभिनय और नृत्य साथ साथ"

25 वर्षीया मेघरंजनी मेधी असमिया फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री और निपुण कथक नृत्यांगना हैं. उनकी मां मारामी मेधी प्रख्यात कथक कलाकार हैं और मेघरंजनी उनसे ही इस नृत्यशैली की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं.

उनके पिता जयप्रकाश मेधी अच्छे गायक होने के साथ संगीत निदेशक भी हैं. इस वर्ष खजुराहो में नृत्य महोत्सव में मारामी मेधी और मेघरंजनी मेधी ने सत्तरीय और कथक नृत्यशैलियों को मिलाकर अपना नृत्य प्रस्तुत किया. इस अवसर पर उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

आपका रुझान अभिनय की ओर पहले हुआ या नृत्य की ओर?

घर में माहौल तो था ही. मैं तो तीन वर्ष की आयु से ही अपनी मां से कथक सीखने लगी. पिताजी भी संगीतकार हैं, लेकिन मैं गाने की ओर नहीं गई, नृत्य में आ गई और अभी तक सीख ही रही हूं.

नृत्य और अभिनय, इनमें से किसमें अधिक रुचि है?

रुचि तो दोनों में ही है, लेकिन मैं अंत में नृत्य ही करना चाहूंगी. लेकिन अभिनय का भी शौक है और मुझे अच्छी फिल्मों में काम करने का मौका भी मिला है. मैं अब तक छह फिल्मों में काम कर चुकी हूं. पहली फिल्म थी 'लखमी', फिर 'अभिमानी मन', 'जानमोनी' और 'पूर्णिमा'. अभी एक फिल्म में काम पूरा किया है जिसका नाम है 'अनुराधा'. इसे कान फिल्म महोत्सव में भी भेजा जाने वाला है. यह एक कला फिल्म है जो एक नारी की कहानी पर आधारित है.

मेरी पहली फिल्म 'लखमी' 2008 में रिलीज हुई और उसे जैसी लोकप्रियता और सफलता मिली, मुझे उसकी कतई उम्मीद नहीं थी. क्योंकि मुझे फिल्मों में कामयाबी मिल रही है, इसलिए मैं अभिनय करते रहना चाहती हूं. लेकिन सच पूछिए तो नृत्य ही मेरी पहली प्राथमिकता रहेगी. जब तक फिल्मों में अच्छे रोल मिलते रहेंगे और दर्शक सराहते रहेंगे, तब तक अभिनय भी करती रहूंगी.

अभी तक आप अपनी मां की छत्रछाया में ही हैं. हालांकि आप के कथक नृत्य की एकल यानी सोलो प्रस्तुतियां भी होती हैं. लेकिन अंत में तो आपको इस छत्रछाया से बाहर आकर एक स्वतंत्र कलाकार के रूप में स्थापित होना होगा. क्या वह स्टेज आ गई है या जल्दी ही आने वाली है?

नहीं, अभी वह स्टेज नहीं आई है. हां, मैं मां को कोरियोग्राफी आदि में कुछ मदद जरूर करने लगी हूं और सोलो नृत्य भी करती हूं, लेकिन अभी वह स्टेज आने में समय लगेगा जब मैं बिलकुल स्वतंत्र कलाकार के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर सकूं.

आप सिर्फ सीख ही रही हैं या कुछ नए विद्यार्थियों को सिखा भी रही हैं? अक्सर संगीत और नृत्य की दुनिया में सीखना और सिखाना साथ चलता है.

हमारा तो अपना विद्यालय ही है, सुर संगम. तो उसमें मैं सिखाती भी हूं. लगभग 150 विद्यार्थी होंगे.

भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

नए नए लोग आ रहे हैं तो कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा जिससे वे कथक की ओर आकृष्ट हों. परंपरा को बनाए रखकर कुछ नया करना होगा. कुछ हमने किया भी है. 'हाथी और मानु' और 'खवेजी धरा' ये दो नृत्य नाटिकाएं की थीं. पहली तो हाथी और मनुष्य के संबंध को लेकर है और दूसरी जिसके नाम का अर्थ है हरी धरती, में यह दिखाया कि पेड़ों को काटते जाने से पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है. कथक में यूं तो पारंपरिक कहानियां ही ली जाती हैं, लेकिन हमने इस तरह के प्रयास किए हैं ताकि समकालीन विषयों को भी उसमें शामिल किया जा सके.

असम के एक प्रसिद्ध कवि थे हरीन्द्र भट्टाचार्य, जिनका अभी दो साल पहले ही निधन हो गया. बारिश पर उनकी पांच कविताओं को लेकर हमने एक नृत्य नाटिका तैयार की है जिसमें बारिश न होने से पड़ने वाले सूखे, उसके कारण पैदा होने वाली समस्याओं और फिर बारिश होने के बाद क्या होता है, इन सब स्थितियों को कथक की पारंपरिक शैली में समोया गया है. इस साल मैं सोच रही हूं कि असम के लोकसंगीत बिहू को कथक में घुला मिला कर कुछ नई चीज तैयार करूं.

इंटरव्यूः कुलदीप कुमार

संपादनः ए जमाल