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दुनिया

अब सिरदर्द बनी बाघों की बढ़ती तादाद

भारत में किसी दौर में बाघों के संरक्षण के लिए बनी योजनाएं अब सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो रही हैं. कम होते जंगल इंसानों के साथ शिकारी पशु के संघर्ष का कारण बन रहे हैं.

अपने मैंग्रोव जंगल और रॉयल बंगाल टाइगरों के सबसे बड़े आशियाने के तौर पर मशहूर सुंदरबन में कभी बाघों की घटती तादाद ने वन विभाग को चिंता में डाल दिया था. लेकिन अब उनकी तेजी से बढ़ती तादाद अधिकारियों के लिए चिंता का विषय बन गई है. ग्लोबल वार्मिंग और पेड़ों की अवैध कटाई के चलते घटते जंगल और बाघों की बढ़ती तादाद ने इंसानों के साथ संघर्ष की घटनाएं तेज कर दी हैं. क्षेत्रफल को देखते हुए इस इलाके में सौ से कुछ ज्यादा बाघ रह सकते हैं. लेकिन इनकी तादाद अब 90 के पार पहुंच गई है. 

बढ़ती तादाद

सुंदरबन इलाका बाघों के रहने के लिए सदियों से मुफीद रहा है. जल, जंगल और जलवायु के अनूठे तालमेल के चलते बाघों को यह आशियाना बेहद रास आता है. यही वजह है कि इसे रॉयल बंगाल टाइगरों का सबसे बड़ा घर होने का गौरव हासिल है. भारतीय वन्यजीव संस्थान, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और ग्लोबल टाइगर फोरम की ओर से हुए एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि भारतीय क्षेत्र में स्थित सुंदरबन में प्रति सौ वर्गफीट में 4.68 बाघों को रखने की क्षमता है. सुंदरबन के क्षेत्रफल को देखते हुए यहां सौ से कुछ ज्यादा बाघ उन्मुक्त होकर रह सकते हैं. लेकिन इलाके में बाघों की तादाद लगातार बढ़ रही है. वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में इलाके में 76 बाघ थे जो दो साल बाद 86 तक पहुंच गए. अब इनकी तादाद 90 से ज्यादा हो गई है. इस साल इलाके में कैमरा ट्रैप पद्धति से बाघों की गिनती से इस तथ्य का खुलासा होने के बाद वन्यजीव विशेषज्ञ चिंता में हैं. सुंदरबन को 1973 में टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित कर दिया गया था और 1984 में इसे सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया. वर्ष 1997 में इसे यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया.

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों की आबादी का घनत्व बढ़ने से उनके विचरण और शिकार करने की जगह घटेगी. इसके नकारात्मक नतीजे सामने आएंगे. वैसी स्थिति में भोजन की तलाश में बाघ जंगल से लगी इंसानी बस्तियों में पहुंचने लगेंगे. नतीजतन इंसानों व जानवरों में संघर्ष की घटनाएं और तेज होंगी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सुंदरबन में हर साल औसतन 35 से 40 लोग बाघ के शिकार बन जाते हैं. लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि इलाके में हर साल अमूमन सौ से ज्यादा लोग बाघ के जबड़ों में जिंदगी गंवा देते हैं. भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक वाईवी झाला कहते हैं, "वर्ष 2016 और 2017 में बाघों की तादाद के आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं. असली तादाद इससे ज्यादा हो सकती है." वह कहते हैं कि जंगल में बाघों के भोजन के लिए सुअरों और हिरणों जैसे जानवरों की तादाद बढ़ा कर बाघों के जंगल से बाहर निकलने की घटनाओं पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. वर्ष 2011 से 2013 के बीच हुए एक सर्वेक्षण के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि सुंदरबन में बाघों के भोजन के लिए हिरणों का घनत्व 5.24 प्रति वर्गकिलोमीटर है.

बाघों का भोजन

उक्त अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत व बांग्लादेश में सुंदरबन में बाघों की आबादी वाले छह हजार वर्गकिलोमीटर इलाके में बाघों की तादाद तीन सौ से ज्यादा हो सकती है. झाला कहते हैं, "बांग्लादेश में बाघों के भोजन की कमी नहीं होने और सुंदरबन के पास ज्यादा इंसानी बस्तियां नहीं होने की वजह से वहां बाघों को रखने की क्षमता भारतीय सुंदरबन के मुकाबले ज्यादा है. लेकिन वहां बाघों और उनके शिकारों यानी भोजन बनने वाले जानवरों के अवैध शिकार की समस्या गंभीर है. यही वजह है कि वहां बाघों की आबादी का घनत्व अपेक्षाकृत कम है." सुंदरबन के इलाके में 150 उद्योगों को रेगुलराइज करने के बांग्लादेश सरकार के फैसले का भी इस पर असर होगा.

तमाम वन्यजीव विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि सुंदरबन में बाघों का भोजन बढ़ा कर उनके इंसानी बस्तियों में आने की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. मुख्य वन्यजीव अधिकारी रवि कांत सिन्हा कहते हैं, "राज्य वन्यजीव बोर्ड ने राज्य के विभिन्न हिरण पार्कों में हिरणों की तादाद बढ़ने की स्थिति में उनको सुंदरबन में ले जाकर छोड़ने की मंजूरी दी है. जंगली सुअरों के मामले में भी ऐसा ही है." वह बताते हैं कि वन विभाग की ओर से समय-समय पर सुंदरबन से सटे इलाके में रहने वालों लोगों के बीच अभियान चला कर उनसे मछली या केकड़ा पकड़ने के लिए जंगल में नहीं घुसने का अनुरोध किया जाता है. 

ग्लोबल वार्मिंग बनी समस्या

झाला कहते हैं कि सुंदरबन की सबसे बड़ी समस्या फिलहाल ग्लोबल वार्मिंग और उसकी वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ना है. इससे ज्यादातर मैंग्रोव जंगलों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है. वैसी, हालत में बाघों की लगातार बढ़ती आबादी इंसानी बस्तियों में निकल कर तबाही मचा सकती है. इंसान व जानवरों के बीच तेज होते संघर्ष की वजहों का पता लगाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति की शुरूआती जांच में यह तथ्य सामने आया है कि सुंदरबन से सटी बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ने, बाघों के चरने की जगह लगातार घटने और अपना पसंदीदा खाना नहीं मिलने की वजह से बाघ भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आने लगे हैं.

प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व फील्ड डायरेक्टर प्रणवेश सान्याल इसके लिए वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को जिम्मेवार ठहराते हैं. वह कहते हैं, "सुंदरबन के जिस इलाके में बाघ रहते हैं वहां पानी का खारापन बीते एक दशक में 15 फीसद बढ़ गया है. इसलिए बाघ धीरे-धीरे जंगल के उत्तरी हिस्से में जाने लगे हैं जो इंसानी बस्तियों के करीब है." नेचर एनवायरनर्मेंट एंड वाइल्डलाइफ सोसाइटी के सचिव विश्वजीत रायचौधरी कहते हैं, "हालात काफी चिंताजनक है. सरकार को वन्यजीव प्रेमी संगठनों को साथ लेकर इस दिशा में शीघ्र ठोस पहल करनी चाहिए."

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