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ब्लॉग

अब रिलीज हुआ हिंदी सिनेमा

लड़का जाती हुई लड़की को टोकता है, वह रुकती है तो कह देता है आई लव यू. लड़की तमाचा जड़ देती है. वो कहता है अब नाम भी बता दो. लड़की कहती है कल फिर थप्पड़ खाना. एक दिन लड़का कहता है 15 थप्पड़ खा चुका हूं, अब तो नाम बता दो.

ये वाकया बनारस का है. और सीन है फिल्म रांझणा का. वे छोटे शहर, कस्बे, वे देहात सिनेमाई प्रेम के नए और देसी ठिकाने बन गए हैं. प्रेम के लिए यश चोपड़ा या रोहित शेट्टी मार्का फिल्मों की जरूरत नहीं रह गई है. फिल्मों के हिट होने के लिए हो सकता है कुछ समय बाद शाहरुख, हृतिक, सलमान, रणबीर जैसे सितारों की जरूरत भी न रहा जाए. अब बॉक्स ऑफिस पर राज करने जैसी स्थितियां मिट रही हैं. एक लोकतंत्र हिंदी सिनेमा में आ रहा है और तथाकथित बॉलीवुड के किले में सेंध लग रही है. प्रेम के प्लास्टिकीकरण से मुक्ति पाने की चाह बढ़ी है, वह खांटी हो गया है और उसके लिए कोई नकली मशक्कत नहीं करनी पड़ती है. वैसी तो करनी ही पड़ती है, जैसी कि गलियों मोहल्लों में लड़के करते रहते हैं.

जहां हर लड़की अपनी ओर देखती जान पड़ती है, हर लड़की पर दिल लुटता है और हर सपना बस साकार हो जाने वाला होता है. एक तगड़ी पिटाई और कड़ी फटकार से पहले. बनारसी माहौल में रची बसी रांझणा फिल्म में हीरो का दोस्त कहता है, "ये साला प्यार न हुआ, यूपीएससी का एक्जाम हो गया जो 10 साल से क्लियर ही नहीं हो रहा." इस मामले में आज के दौर की ये फिल्में अपनी सहजता और स्वाभाविकता में 40 और 50 के दशक की फिल्मों की याद दिलाती हैं. हालांकि वहां नाटकीयताएं थीं, यहां वे भी नहीं हैं. बस जैसे कोई घर से उठकर पर्दे पर आई लव यू कहने चला आया है पड़ोस की लड़की को.

Filmszene Sometimes Happy, Sometimes Sad

खत्म होते चॉकलेटी सितारे

मुख्यधारा के चॉकलेटी सिनेमा में प्रेम का ऐसा औघड़पन और खुरदुरी सच्चाइयां नहीं थीं. त्याग, बलिदान और तिकोने द्वंद्वों को लेकर फिल्में जरूर बनी हैं लेकिन आप पाएंगे कि वे रुमानी घेरेबंदियों से बाहर नहीं निकल पाती थीं. नपातुला अभिनय, वही स्टूडियो, वही कृत्रिम सेट, वही चलना, वही सूटबूट वही कार, वही रईसी वही जैसे अभिनय के लिए आना और चले जाना. प्रेम की भावना को आत्मसात करने वाले किरदारों में खुद को ढाल देने वाली एक नई अभिनय पीढ़ी आ गई है... और वो पर्दे पर टाइप्ड होकर सफलता और नायकत्व में कैद हो जाने के बजाय अपनी असल जिंदगी का एक्सटेंशन उसे बना रही है.

मिसाल के लिए फुकरे को लीजिए. चार लफंडरो की कॉमिक अदाएं, उनकी ख्वाहिशें, बेचैनियां और यातनाएं सच्ची हैं. हमारे अपने रोजमर्रा के यथार्थ का हिस्सा हैं. वे फ्लर्ट करते हैं, या प्रेम करते हैं या उसके न होने पर बिलबिलाते या हंसते खिलखिलाते हैं तो वो सब सायास नहीं है. उसमें मैनेरिज्म नहीं है. कैमरा उनके अभिनय में दखल नहीं देता. कोई वास्तविक प्रकरण ही जैसे रिकॉर्ड किया जा रहा है.

हुमा कुरैशी, ऋचा चड्ढा, दीपक डोबरियाल, नवाजुद्दीन सिद्दीकी से लेकर पुलकित सम्राट, अली फजल, आदित्य कपूर, श्रद्धा कपूर और मनजोत सिंह.. ऐसे कई नाम हैं... और ये लिस्ट बढ़ती ही जा रही है. उनसे पहले की पीढ़ी में हम इरफान, सौरभ शुक्ला, अरशद वारसी, मनोज वाजपेयी, चित्रांगदा सिंह, रजत कपूर, विनय पाठक, रणबीर शौरी जैसे नामों से परिचित हैं. इतनी विविधता और इतना विस्तार और इतने कलाकार बॉलीवुड के चिरकुमारों, चिरसुंदरियों और महानायकों को चुनौती देने आ गए हैं. फिर बात अभिनय में नएपन की ही नहीं है, आप पाएंगें कि फिल्म विधा के हर क्षेत्र में नए प्रयोग किए जा रहे हैं.

Gangs of Wasseypur

गैंग्स ऑफ वासेपुर की कामयाब "गैंग"

फिल्मकारों की नई पीढ़ी नए ढंग से सिनेमा कर रही है. कैमरा अब गलियों, नुक्कड़ों, देहातों और कस्बों में सिर्फ रोमानी टहल के लिए नहीं जा रहा, वहां की धड़कनों को वो सहजता से शूट कर रहा है. छोटे शहरों की कहानियां जॉली एलएलबी के रूप में सामने आ रही हैं तो बड़े शहरों की जिंदगियों के मौलिक शेड्स फुकरे और काई पो चे जैसी फिल्मों में उभर रहे हैं. अब असल में बहुत ज्यादा हिंसा और रक्तपात की भी जरूरत रही नहीं है. हो सकता है कि इनमें से कई फिल्में सिनेमाई कला के लिहाज से बेशक कमजोर हैं, बॉलीवुड से आतंकित भी कहीं कहीं हैं और विश्व सिनेमा के सामने वैचारिक रूप से नहीं ठहरतीं. फिर भी ये ट्रेंड अहम है क्योंकि हो सकता है इन्हीं फिल्मों से कभी हमारे लिए पहचान और सम्मान का रास्ता खुले जो बॉलीवुड की चकाचौंध में गुम हो गया है.

प्रेम के नाम पर हिंदी फिल्म कहानियों का जो बारिस्ताकरण हो चला था, इधर आई लुटेरा, रांझणा, इशक या आशिकी-2 जैसी फिल्मों ने उसे तोड़ दिया है. बनारस के घाटों से लेकर दिल्ली के मुहल्लों, कानपुर की गलियों, वासेपुर के अड्डों और लखनऊ की फिजाओं में न सिर्फ नई मुहब्बतें रची जा रही हैं बल्कि उनके इर्द गिर्द जो पटकथाएं और गीत लिखे जा रहे हैं और गाए जा रहे हैं, वे भी उतने ही नए और अपनी मिट्टी से निकले जान पड़ते हैं. अब न अभिनय में न पटकथा में न निर्देशन में न गाने में न फिल्म संगीत बनाने में किसी स्टार का मोहताज होना पड़ रहा है. मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों ने फिल्म की सफलता के नये पैमाने बनाए हैं. हिट और फ्लॉप की अवधारणाएं टूट रही हैं. बाजार अब बड़ों के इशारे पर ही नहीं चल रहा है. हालांकि ये कहना जल्दबाजी होगी कि बड़ा बदलाव आ ही गया है.

इतना तो मानना पड़ेगा कि फिल्म अब सही अर्थो में "रिलीज" हुई है, अपनी ही बनाई जकड़बंदियों से निकली है. हिंदी सिनेमा के सौ साल बाद के माहौल के बारे में माना कि ये अहसास है, फिर भी क्या कम है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः अनवर जे अशरफ

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