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दुनिया

अब बेशकीमती रत्नों का भी होगा डीएनए

नीलम हो, पन्ना हो या फिर रूबी. ये सभी बेहद दामों में बिकते हैं. लेकिन ऐसे बहुत से बेशकीमती रत्नों के पीछे शोषण और उत्पीड़न की कहानी छिपी होती हैं. अब वैज्ञानिक डीएनए लेबलिंग से इस समस्या का हल खोजने का दावा कर रहे हैं.

कीमती पत्थरों के चलते कहीं हिंसा होती है, तो कहीं इनकी खदानों में उत्पीड़न और बाल मजदूरी कराये जाने के आरोप लगते हैं. ऐसे हालात इसलिए भी हैं क्योंकि बाजार में पहुंचने के बाद यह पता लगाना मुश्किल होता है कि इन नगों का मूल स्रोत क्या है. यानी उन्हें किस खदान से निकाला गया है.

मूल्यवान पत्थरों के बाजार में पारदर्शिता की जरूरत है. रत्न उद्योग भी अब इस बात पर समहत हो रहा है. लेकिन मूल स्रोत की जानकारी को पुख्ता कैसे किया जाए? सैद्धांतिक तौर पर भूगर्भीय गुणों के आधार पर यह तो पता लगाया जा सकता है कि कौन सा नग किस देश से आया है, लेकिन किस खदान से आया है ये पता लगाना मुश्किल है.

लेकिन अब जेमॉलॉजिस्ट यानि नगों के विशेषज्ञों ने एक तरीका खोज निकाला है. स्विट्जरलैंज की ग्यूबेलिन जेम लैब के प्रमुख डानियल निफेलेर कहते हैं, "हमें लगता है कि हमने ऐसा तरीका खोज निकाला है जिसके जरिये पत्थर में खदान की सूचना डाली जा सके, यह सूचना पूरी वैल्यू चेन के दौरान बनी रहेगी."

इसके पीछे पत्थर में आर्टिफिशियल लाइसेंस नंबर डालने का आइडिया है. इसके बारे में सबसे पहले ज्यूरिख के तकनीकी संस्थान ईटीएच में प्रोफेसर रॉबर्ट ग्रास ने सोचा. यह एक तरह से पत्थर में डीएनए लेबलिंग है. प्रोफेसर रॉबर्ट ग्रास कहते हैं, "डीएनए बहुत ही टिकाऊ है क्योंकि यह अदृश्य है और पत्थर के प्रोडक्ट में बदलने पर भी बना रहता है. यह एक लेबल की तरह है जो इतना छोटा और अदृश्य है कि प्रोडक्ट में नहीं दिखता. लेकिन जब उसकी परख की जाती है तो इसकी इंफॉर्मेशन मिलती है. "

बेशकीमती पत्थरों में डीएनए लेबल अक्सर मिल जाता है. हर पत्थर में माइक्रोस्कोप से देखने पर खास किस्म की दरारें दिखती हैं. डीएनए इन्हीं दरारों के आधार पर बने ब्लॉक्स ए, सी, टी और जी की जानकारी की सीक्वेंस बनाता है. इसी कोड में खदान की जानकारी भी डाली जा सकती है. रोशनी और गर्मी से डीएनए की रक्षा करने के लिए यह कोड एक बेहद बारीक कांच में पैक किया जाता है.

कांच के इस नैनो साइज पैक को इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोस्कोप कई गुना बड़ा दिखाता है. ग्यूबेलिन जेम लैब के डानियल निफेलेर ने जैसे ही लेबलिंग तकनीक के बारे में सुना, वैसे ही उनके दिमाग में नगों की डीएनए लेबलिंग का ख्याल आया. केमिकल इंजीनियर मिशेला पुड्डु कहती हैं, "हम कुछ महीनों से इस तकनीक को कस्टमाइज करने पर काम कर रहे हैं ताकि इसे खास इरादे के लिये ढाला जा सके. हमें यह पक्का करना था कि कोड पत्थर में ही मौजूद रहे. और पत्थर पर होने वाली नक्काशी को भी बर्दाश्त कर ले."

नीलम में तो नक्काशी से पहले ही डीएनए मार्किंग कर दी जा रही है. ये सब ग्यूबेलिन जेम की लैब में हो रहा है. खदान में ही पत्थरों की डीएनए मार्किंग कर दी जाती है. एक खास तरह के रसायन की मदद से नैनो पार्टिकल नीलम की बारीक दरारों में घुस जाते हैं.

खदान में डाले गए डीएन को बाद में एक खास एसिड से साफ कर दिया जाता है. इसके बाद फिर से डीएनए एनालिसिस की स्टैंडर्ड प्रक्रिया शुरू होती है. इससे हर पत्थर में एक कोना सा बन जाता है. इसका मतलब है कि हर चट्टान का एक डीएनए होता है.

डीएनए लेबलिंग असरदार है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह काफी महंगी है. लेकिन इस उद्योग से जुड़ी कुछ कंपनियां डीएनए लेबलिंग में दिलचस्पी ले रही हैं. घड़ियां और गहने वाली स्विट्जरलैंड की कंपनी शोपार की उपाध्यक्ष कारोलीन शॉयफेले कहती हैं, "इस उद्योग में यह एक बड़ी खोज है क्योंकि अब खदान से लेकर आगे की पूरी प्रक्रिया का पता लगाया जा सकता है. आपको हमेशा पता चलेगा कि पत्थर कहां से निकला."

स्रोत की जानकारी पत्थर की बेहतर मार्केटिंग भी करेगी और अरबों डॉलर के इस बाजार को हिंसा और शोषण के आरोपों से बाहर निकलने में मदद करेगी.

कार्टिन होफ्सटेटर

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