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मंथन

अब पेंटर भी बने रोबोट

इंसान के हूबहू दिखते स्केच पोट्रे, एक आर्ट क्लास में बनाए गए हैं. लेकिन इंसान के हाथों से नहीं. बल्कि इन्हें एक रोबोट ने बनाया है.

बर्लिन की आर्ट गैलरी डिक्सिट अल्गोरिज्मी में लगी ड्राइंग मशीन असल में पॉल नाम के पांच रोबोटों का इंस्टालेशन हैं. रोबोटों के ग्रुप को पॉल्स कहा जाता है. हर पॉल में आंख का काम कैमरा और हाथ का काम रोबोटिक आर्म करती है. रोबोटों का ब्रेन, टेबल के नीचे लगा एक लैपटॉप है.

रोबोटों का स्केचिंग स्टाइल काफी अलग है. एक पॉल का बनाया पोट्रे काफी वास्तविक सा लगता है. तो, वहीं दूसरा काफी एब्स्ट्रेक्ट पोट्रे बनाता है. एक पोट्रे सेशन करीब आधे घंटे का होता है. लेकिन असली आर्ट क्लास की तरह यहां भी रोबोट कुछ पोट्रे बहुत जल्दी बना देते हैं, तो कुछ में परफेक्शन पाने के चक्कर में ज्यादा टाइम लगता है. पोट्रे सेशन के दौरान मॉडल को काफी देर तक बिना हिले डुले भी बैठे रहना पड़ता है.

बर्लिन में थॉर्स्टन प्लात्स रोबोटों के सामने काफी देर तक पोट्रे मॉडल के रूप में बैठे रहे. प्लात्स कहते हैं, "यह एक मजेदार अनुभव था, क्योंकि इन छोटी मशीनों को सिर्फ काम नहीं करना पड़ता बल्कि बीच बीच में आपको देखना भी पड़ता है. उन्होंने मुझे देखा और फिर अपने स्केच को देखा. मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी. ये बहुत ही हैरतंगेज और दिलचस्प अनुभव था."

DW euromaxx Malende Roboter in der Kunst (DW)

पोट्रे बनाते रोबोट

स्केचिंग रोबोट लंदन यूनिवर्सिटी के गोल्डस्मिथ्स कॉलेज में बनाए गए हैं. इनके आविष्कारक हैं पाट्रिक ट्रेसे. फ्रांस के ट्रेसे कला और तकनीक के मिश्रण के कायल हैं. पहले उन्होंने इंफॉर्मेटिक्स की पढ़ाई की और फिर पेंटर बन गए. लेकिन एक मानसिक बीमारी के इलाज के दौरान उन्होंने हाथ से पेंटिंग करना छोड़ दिया. इसके बाद वह पेंटिंग करने वाले रोबोट विकसित करने में जुट गए. पाट्रिक ट्रेसे कहते हैं, "कंप्यूटिंग का इस्तेमाल अब हर चीज में होता है, तो कला में क्यों नहीं. इसमें एक तरह की विशेषता होनी चाहिए लेकिन कई कलाकार किसी न किसी रूप में कंप्यूटर का इस्तेमाल तो करते ही हैं, ये काम करने का एक टूल है."

ट्रेसे अब भी रोबोटों को कलाकार नहीं मानते. वह खुद को पोट्रे के पीछे छुपा हुआ कलाकार मानते हैं. स्केचिंग भले ही रोबोट करते हों, लेकिन ट्रेसे उन्हें अपनी कलात्मक पहचान मानते हैं, "मेरे लिए ये मशीनें हैं, प्रोग्राम हैं, लेकिन इन्होंने मेरा करियर भी बनाया है. ये सेल्फ पोट्रे की तरह भी हैं. मेरा और रोबोटों का रिश्ता जटिल है. मेरे लिये ये कठपुतलियां हैं जो ज्यादातर समय वही करती हैं जो मैं इनसे करवाना चाहता हूं."

बर्लिन में पहली बार ये क्रिएटिव मशीनें किसी आर्ट गैलरी का हिस्सा बनी हैं. यहां ट्रेसे के ही पांच पोट्रे हैं, अलग अलग स्टाइल में. ज्यादातर में वह पहचाने भी जा रहे हैं. लेकिन रोबोट हर चीज का स्केच फिलहाल नहीं बना सकते.

आर्ट गैलरी डिक्सिट अल्गोरिज्मी के गैलेरिस्ट पेटर ब्राउन-हेनरिष अपनी नाकाम कोशिश के बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं, "मैंने अपने कुत्ते का पोट्रे बनाने की कोशिश की, मैंने उसे पांचों मेजों के सामने कुर्सी पर बैठाया लेकिन रोबोटों ने कुछ भी स्केच नहीं किया. ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि उनके फेसियल रिकगनिशन सिस्टम ने किसी इंसान को नहीं पहचाना. और सबने काम करने इनकार कर दिया."

लेकिन रोबोटों ने इंसानों के जो पोट्रे बनाए हैं, वो वाकई में हैरान करने वाले हैं. मशीनें कल्पना से भी ज्यादा तेजी से इंटेलिजेंट होती जा रही हैं और इंसान की जगह लेती जा रही हैं.

(कितनी नौकरियां रोबोट को जाएंगी)

फ्रांसिस्का वाटेनबर्ग/ओएसजे

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