अब पहचान मिली अंग्रेजों के जमाने के गांव को | दुनिया | DW | 21.10.2017
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दुनिया

अब पहचान मिली अंग्रेजों के जमाने के गांव को

उत्तर प्रदेश के जंगलों में बसी एक बस्ती सालों से गांव बनने और सरकारी दस्तावेज में दर्ज होने का इंतजार में थी. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की वजह से अब उसे मान्यता मिली है और वहां के लोगों को उम्मीद.

सन 2009 में गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ अपने लोकसभा क्षेत्र में जंगल में बसे एक गांव में दिवाली मनाने गए थे तो उत्तर प्रदेश सरकार के वन विभाग ने उनपर एक मुकदमा दर्ज कर दिया था. कहा था कि उन्होंने कथित रूप से वन क्षेत्र में पक्का निर्माण करवाया जो गैर कानूनी है. हालांकि बात कुछ नहीं निकली. नया निर्माण नहीं हुआ था और पहले से मौजूद एक शेड को रंग रोगन करवा कर स्कूल खोल दिया गया था. मुकदमा वापस ले लिया गया. इस हफ्ते वही योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के रूप में फिर उसी गांव जब दिवाली मनाने पहुचे तो सारा वन विभाग का अमला उनके रास्ते की धूल साफ़ कर रहा था. उनके स्वागत की तैयारी कर रहा था.

क्या खास है इस गांव में

प्रदेश के सैकड़ों गांव की तरह ये गांव वनग्राम है. जंगल के बीच में आबादी है, वहां लोग रहते हैं, उनको कोई अधिकार नहीं है. वो ज़मीन के मालिक नहीं बन सकते, कोई पक्का निर्माण नहीं कर सकते. कुल मिलकर उनकी कोई पहचान नहीं है. जाहिर है विकास से वो कोसो दूर हैं. यहां रहने वालों को आजादी के सत्तर साल के बाद भी बिजली, पानी, स्वास्थ्य, पेंशन, राशन नहीं मिलता.

दिलचस्प बात ये है कि जो लोग यहां रहते हैं उनको 70 साल से ज्यादा हो गए, एक पीढ़ी खत्म हो गयी, बच्चे बड़े हो गए लेकिन उन्हें कोई पहचान नहीं मिली क्योंकि सरकारी कागज में उनकी बस्ती गांव के रूप में दर्ज ही नहीं है, ऐसे में उनका कोई पता ही नहीं हैं. अब जब कोई पता नहीं है तो वे मतदाता भी नहीं हैं. कहीं पर कोई सरकारी दस्तावेज उनके पास नहीं है और कुल मिला कर वो बेगाने से उसी जंगल में रहते हैं. इन्हें लोग अब भी आजाद भारत के गुलाम समझते थे.

पिछले दस साल से योगी आदित्यनाथ इन लोगों के बीच दिवाली मनाते आ रहे थे. इस बार जब लगा की योगी नहीं आएंगे तो ये लोग धरने पर बैठ गए. आखिर योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री रहते हुए भी परंपरा को निभाया और दिवाली में उनके बीच पहुंचे.

कौन लोग रहते हैं ऐसे गांव में

ये लोग अंग्रेजों द्वारा संभवतः 1920 में बसाये गए थे. तब भारत में रेलवे की लाइन बिछाई जा रही थी. इसके लिए साखू की लकड़ी के स्लीपर लगाये जाते थे. साखू के जंगल काटे जा रहे थे जिसकी वजह से साखू के पेड़ कम पड़ने लगे. तब अंग्रेजों ने वन विभाग के लोगों को बर्मा भेजा और वो वहां से टंगिया तरीके से जंगल लगाने की विधि सीख कर आये. फिर उन्होंने भारतीय श्रमिकों से जंगल लगवाना शुरू किया. रेल लाइन बिछ गयी, अंग्रेज चले गए लेकिन ये श्रमिक उसी जंगल में बस गए. इन लोगों को वनटांगिया कहा जाने लगा. तब से ये लोग अपनी बस्ती को गांव कहलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सिर्फ इतना मांग रहे थे की सरकारी कागज में उनका नाम दर्ज कर लिया जाए. इस दौरान हुए आंदोलनों में कई लोग मारे भी गए, जेल गए पर स्थिति नहीं बदली.

अब जाकर पांच ऐसी बस्तियों को गांव का दर्जा सरकारी कागज में दे दिया गया है. मुख्यमंत्री ने उनको राजस्व ग्राम घोषित किया और सरकारी सर्टिफिकेट सौपा. सिर्फ कागज में गांव दर्ज हो जाने से वो खुश हैं. ये गांव है जंगल तिन्कोनिया नंबर 3, जंगल रामगढ, आमबाग, राजही और चिलबिलवा. पास के जनपद महाराजगंज के 18 ऐसी बस्तियों को भी शीघ्र गांव का दर्जा दे दिया जाएगा. अब ये लोग भी जमीन के मालिक बन गए.

सरकारी योजनाओं का लाभ

अब ये लोग उत्तर प्रदेश के नागरिक हो गए. मुख्यमंत्री ने तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ भी उनको देने का भरोसा दिया है. 11 दिव्यंगो को ट्राई साइकिल, स्कूल के बच्चों को बैग, कॉपी, किताब, चॉकलेट इत्यादि. अधिकारियो को निर्देश भी दे दिये गये कि उन्हें तमाम जनलाभकारी योजनायें हैंडपंप, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, संपर्क मार्ग, शौचालय, प्रधानमंत्री आवास इत्यादि उपलब्ध करायी जाए. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल ने भी एलान किया कि शीघ्र वहां बैंक की शाखा भी खोली जाएगी. यही नहीं उन्होंने गांव गोद लेने का भी एलान किया.

वन विभाग के अनुसार उत्तर प्रदेश में 565 ऐसी वनटांगिया बस्तियां हैं जो लगभग 1625 नए राजस्व ग्राम बन सकते हैं और इसकी कवायद शुरू हो चुकी है. लगभग सौ साल बाद ही सही अब इन लोगों में अपनी पहचान मिलने की उम्मीद जगी है कि अब वो भी प्रदेश के समर्थ नागरिक बन जाएंगे और सरकारी दस्तावेज उनकी पहचान होगा.

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