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दुनिया

अब जलवायु परिवर्तन नीति में ट्रंप चाहते हैं बदलाव

ओबामा केयर के बाद अब ट्रंप जलवायु परिवर्तन पर नीतियां बदलने जा रहे हैं. मंगलवार को ट्रंप अध्यादेश पर दस्तखत करेंगे. इसके बाद घरेलू ऊर्जा उत्पादन के लिये अपनाये गये उपायों को निलंबित, रद्द या समीक्षा के तहत रखा जायेगा.

अमेरिका का ट्रंप प्रशासन देश की स्वच्छ ऊर्जा योजना की समीक्षा भी करेगा, जो कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को प्रतिबंधित करता है. ओबामा प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने की कोशिश के तहत पेरिस में जो समझौता किया था, उसे भी बदला जा सकता है. ट्रंप ने ग्लोबल वार्मिंग को नकली बात करार देते हुये कहा है कि ये चीन ने ईजाद किया है.

बिजली संयंत्रों के नियमों की आलोचना करते हुये ट्रंप ने इन्हें अमेरिकी कर्मचारियों पर हमला बताता है. अधिकारियों के मुताबिक ट्रंप कानूनी बाधाओं को कम करके देश के ऊर्जा संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए कार्यकारी आदेश जारी करेंगे. इससे सस्ती बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी, जिससे आर्थिक विकास में तेजी आएगी और नौकरियां पैदा होंगी.

इसके साथ ही प्रशासन ने 14 महीने से सरकारी जमीन पर कोयला पट्टों के वितरण पर लगी पाबंदी को भी हटाने का निर्णय लिया है. ओबामा प्रशासन ने पिछले साल जनवरी 2016 में कोयला पट्टों को दिये जाने पर रोक लगायी थी और कहा था कि 1 अरब डॉलर के सालाना कार्यक्रम का आधुनिकीकरण इस तरीके से किया जाना चाहिये ताकि करदाताओं को उचित लाभ मिल सकें और जलवायु परिवर्तन की दिशा में काम हो सके. ट्रंप ने ओबामा पर कोयले का युद्ध छेड़ने का आरोप भी लगाया और कांग्रेस में अपने भाषण में कहा कि वह नौकरियों को कुचलने के लिये बनाये गये नियमों से निपटने के लिये ऐतिहासिक प्रयास कर रहे हैं.

इस आदेश से अन्य नियमों में भी बदलाव होगा मसलन ग्रीनहाउस गैसों को लेकर इस्तेमाल होने वाले "सोशल कॉस्ट" जैसे शब्दों को भी समाप्त किया जायेगा. साथ ही तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन में मीथेन के उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों और भूमि प्रबंधन ब्यूरो हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग नियमों की भी समीक्षा शुरू होगी. 

अमेरिकी पर्यावरण संरक्षक एजेंसी के एडमिनिस्ट्रेटर स्कॉट प्रुट ने बताया कि इस कार्यकारी आदेश से स्वच्छ ऊर्जा योजना को उलट दिया जाएगा. इस कदम से बाद से अमेरिकी प्रशासन के लिये ग्रीनहाउस उत्सर्जन से जुड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण साबित होगा.

ओबामा प्रशासन ने ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों को कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पेरिस समझौता किया था. इस समझौते पर सहमति बनाने में भारत ने भी अहम भूमिका निभाई थी. इस समझौते का भविष्य क्या होगा इसे लेकर अमेरिकी प्रशासन में सुगबुगाहट तेज हो गई है. जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में ओबामा प्रशासन की इस शुरुआत को दुनिया ने सराहा था.

ट्रंप ने अपने पहले संघीय बजट में भी जलवायु परिवर्तन को उलटने की मंशा साफ जाहिर की थी. उन्होंने इसमें स्वच्छ ऊर्जा योजना के लिए फंड में कटौती समेत अन्य कदम उठाये थे. पेरिस समझौता, जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने और वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को दो डिग्री सेल्सियस तक नीचे लाने के लिए किया गया था. इसके तहत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सहमति बनी थी. 197 देशों ने पेरिस समझौते को स्वीकार किया था. इसके तहत ही विकसित देशों ने विकासशील देशों को मदद स्वरूप साल 2020 तक 100 अरब डॉलर हर साल देने की प्रतिबद्धता जताई थी, जिस पर मौजूदा अमेरिकी प्रशासन को आपत्ति है. इस महीने की शुरुआत में स्कॉट प्रुट के बयान ने भी अमेरिकी पर्यावरणविदों और संस्थाओं में खलबली पैदा कर दी थी. प्रुट ने कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि कार्बन डाइऑक्साइड, ग्लोबल वार्मिंग में बड़ी भूमिका निभाती है.

एए/आरपी (एपी,रॉयटर्स)

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