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मंथन

अब खाने में भी मेड इन जर्मनी

चाहे सॉसेज हो, चीज या टॉफी, जर्मनी में बनने वाली खाने पीने की चीजें दुनिया भर में लोकप्रिय हो रही हैं. जर्मनी का खान पान उद्योग अपनी कमाई का एक तिहाई हिस्सा विदेशों से हासिल कर रहा है.

खाद्य उद्योग जर्मन उद्योग की चौथी सबसे बड़ी शाखा है. इस साल जनवरी से सितंबर तक खाद्य उद्योग ने पिछले साल की तुलना में 3 प्रतिशत ज्यादा का कारोबार किया है. हर तीसरा यूरो निर्यात के जरिए कमाया जाता है. जर्मन खाद्य उद्योग संघ बीवीई की श्टेफानी लेमन कहती हैं, "हमारे आयात चैंपियन हैं, मीट और मीट प्रोडक्ट, दूध और मिल्क प्रोडक्ट, मसलन दही और कैंडी तथा टॉफी की भी बड़ी मांग है, कारामेल से लेकर चॉकलेट तक, बेकरी और अल्कोहल वाले ड्रिंक तो लोकप्रिय हैं ही."

श्टेफानी लेमन कहती हैं कि जर्मन खाद्य उद्योग में निर्यात पर जोर बढ़ रहा है. "खाद्य पदार्थों का बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ में निर्यात होता है. 57 फीसदी. चूंकि आर्थिक विकास में कमी की वजह खपत में कमी दिख रही है, तीसरे देशों में बिक्री की रुझान दिख रही है, यूरोपीय संघ के बाहर के देशों में, खासकर अमेरिका, रूस और स्विट्जरलैंड की ओर. चीन को हमने 2012 में 1 अरब यूरो से ज्यादा का खाने पीने का सामान बेचा."

हालांकि बाधाएं भी हैं. यूरोपीय संघ के बाहर व्यापारिक बाधाओं के चलते नए बाजारों में घुसने में मुश्किल होती है. रजिस्ट्रेशन के तरीके, खाद्य पदार्थों की सुरक्षा के विशेष नियम, पैकेज पर सूचना की पट्टी लगाने के नियम, न्यूनतम उपयोग की तारीख, ऐसी बाधाएं हैं, जिसे पार करना छोटे और मझौले उद्यमों के लिए आसान नहीं होता. खासकर रूस जर्मन खाद्य उत्पादकों के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं है. टोएनीस जैसे बड़े मीट उत्पादक भी इसका शिकार हैं, लेकिन इस बाजार को वे हाथ से जाने नहीं देना चाहते.

Rheinischer Sauerbraten

जर्मनी के मीट और मीट प्रोडक्ट की अन्य देशों में काफी मांग है.

टोएनीस कंपनी के महानिदेशक योजेफ टिलमन कहते हैं, "रूस एक बड़ा बाजार है, देश बहुत बड़ा है. लेकिन साफ सफाई के नियमों जैसी बाधाएं खड़ी की जा रही हैं, जो कुछेक देशों को रूस को सामान बेचने से रोकती है. कुछ हद तक जर्मनी भी इससे प्रभावित है.लेकिन कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पिछले सालों में हमने रूस के साथ अच्छा कारोबार किया है. और हम रूस में बहुत दिलचस्प बाजार भी देखते हैं." भले ही सब कुछ मनमाफिक न हो लेकिन रूस टोएनीस के लिए बहुत ही अहम बाजार है. उनका एक चौथाई उत्पाद गैर यूरोपीय देशों में बिकते हैं. रूस के अलावा उनकी निगाहें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर भी हैं.

जर्मनी के दूध उत्पादक भी नए बाजारों की तलाश में हैं. जर्मन मिल्च कोंटोर ने मॉस्को और शंघाई में अपना दफ्तर खोल रखा है ताकि भविष्य के बाजारों में पांव जमाए जा सके. कंपनी के हैर्मन कोर्डेस कहते हैं, "यूरोप का मौसम अच्छा है, प्रशिक्षित किसान हैं, जो दूध उत्पादन करते हैं. यहां आने वाले सालों में दूध का उत्पादन बढ़ेगा, इसलिए हमें नए बाजारों की तलाश है." उनका कहना है कि जर्मनी में दूध की खपत कम हो रही है, यूरोप के दूसरे देशों की भी हालत ऐसी ही है.

जर्मन मिल्च कोंटोर सालाना 7 अरब किलोग्राम दूध का संसाधन करता है. उसकी 37.5 प्रतिशत कमाई निर्यात से होती है. कोर्डेस का कहना है कि खासकर दूध के मामले में दुनिया भर में कई कांड हुए हैं, जबकि जर्मन दूध अपनी क्वालिटी के कारण जगह बना रहा है. दूसरे देशों के उपभोक्ता अपने देश के दूध या दुग्ध उत्पादों के मुकाबले जर्मन प्रोडक्ट के लिए ज्यादा पैसा खर्च करने के लिए तैयार हैं.

रिपोर्ट: रायना ब्रॉयर/एमजे

संपादन: आभा मोंढे

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