अफगान विधवाओं का नर्क सा जीवन | दुनिया | DW | 01.02.2013
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दुनिया

अफगान विधवाओं का नर्क सा जीवन

पतियों को खो चुकने के बाद अफगान महिलाएं अक्सर निष्कासित और लाचार जीवन जीने को मजबूर हो जाती हैं. वे न केवल गरीबी का शिकार होती हैं बल्कि उन्हें समाज से भी अलग थलग कर दिया जाता है.

22 साल की गुलगोते तो मानती हैं कि पति की मौत की खबर के साथ उनका जीवन खत्म हो गया. तीन महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी. अब अचानक पति की मौत हो गई. गुलगोते विधवा की जिंदगी नहीं बसर करना चाहतीं. तो उन्होंने सोचा कि वह एसिड की छोटी बोतल पी कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेंगी.

गुलगोते पूर्वी अफगान प्रांत मैदान वर्दक में रहती हैं. वह अपने घर पर काम कर रही थी कि पड़ोसी प्रांत गजनी के पुलिस थाने के सामने एक साइकिल बम फटा. दो लोगों की मौत हुई, सात को अस्पताल में भर्ती किया गया, इनमें से एक गुलगोते के पति भी थी. गंभीर चोटों के कारण उनकी भी मौत हो गई. युवा विधवा के भाई मुहम्मद अजीम कहते हैं कि पति की मौत गुलगोते के लिए करारा झटका था.

अजीम के मुताबिक अपने पति के साथ गुलगोते काफी खुश थी लेकिन अब अपनी जिंदगी के बारे में फिक्रमंद हो गई है. उसने अपनी दोस्त के सामने तेजाब पी लिया. लेकिन उसकी दोस्त की मुस्तैदी से उसे बचा लिया गया.

निष्कासित जीवन

गुलगोते जैसी किस्मत अफगानिस्तान में बहुत कम विधवाओं की होती है. पिछले तीन दशक में कई हजार महिलाओं ने अपने पति या पुरुष संबंधियों को खोया है. अफगानिस्तान में औरतों का जीवन पुरुषों के भरोसे चलता है तो उनके गुजर जाने पर भावनात्मक और आर्थिक मामले में महिलाएं परेशानी महसूस करती हैं. और अक्सर विषाद का शिकार हो जाती हैं.

गजनी के अस्पताल में मुख्य फिजिशियन मुहम्मद हेमात कहते हैं कि हर महीने कम से कम तीन महिलाएं आत्महत्या की कोशिश के कारण भर्ती की जाती हैं, "अधिकतर मामला तनाव और पारिवारक होता है, जिसके कारण महिलाएं अकेली पड़ जाती हैं." हेमत कहते हैं कि गुलगोते काफी किस्मतवाली थीं कि समय रहते अस्पताल पहुंच गईं. अब वह अच्छी हैं.

Afghanistan Diskriminierung von Frauen in der afghanischen Gesellschaft

अकेली औरतों का जीना मुश्किल

लेकिन माली हालत की चिंता गुलगोते को सता रही है. 22 साल की उम्र में एक विधवा की जिंदगी जीना होगा. दूसरा पति मिलना असंभव सी बात है. अफगान परंपरा के मुताबिक विधवा की शादी अक्सर उसके देवर से कर दी जाती है.

मरना पसंद

औरतें अपने पति पर निर्भर होती हैं और इसलिए उन्हें आम तौर पर कोई अधिकार या ताकत नहीं होता. वाज्मा फ्रोग महिला, शांति और सुरक्षा शोध संस्थान की सह संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं. वह बताती हैं कि पति की मौत के बाद न केवल औरत की पहचान खत्म हो जाती है, बल्कि समाज में उनकी जगह भी. ये महिलाएं जीने की बजाए मर जाना पसंद करती हैं. उन्हें विधवा की तरह जीने भी नहीं दिया जाता. फ्रोग ऐसी महिलाओं के बारे में भी बताती हैं जिनका उनके ससुर, देवर या जेठ ने यौन शोषण किया.

अफगानिस्तान में करीब 25 लाख विधवाएं हैं. इनमें से 70,000 काबुल में रहती हैं. इनकी कुल संख्या अफगान जनसंख्या का 12 फीसदी है. पति को खो चुकी इन औरतों में से अधिकतर अनपढ़ और युवा हैं.

सरकारी सुरक्षा नहीं

जलालाबाद में रहने वाली शजन भी इन्हीं महिलाओं में हैं. उनके जीने का इकलौता कारण उनके बच्चे हैं. लेकिन वह खुद को गरीबी से बाहर नहीं निकाल पा रही हैं. उनका कहना है, "मेरे पास पति नहीं जो मेरी मदद करे और मुझे सहारा दे."

शजन के बच्चे अभी छोटे हैं. वह एक स्कूल में काम करती हैं जहां उन्हें महीने के 1,200 अफगानी (लगभग 1,200 भारतीय रुपये) मिलते हैं, "यहां कोई नौकरी नहीं. काश सरकार गरीबों की मदद करती, खासकर विधवाओं की, जिन्हें सुरक्षा और सहारे की जरूरत है."

अफगान सरकार पर इन महिलाओं की बिलकुल मदद नहीं करने का आरोप है. फ्रोग कहती हैं कि ऑन ड्यूटी अगर किसी फौजी या पुलिसकर्मी की मौत हो जाती है तो आर्थिक मदद उसके पिता को दी जाती है, पत्नी या बच्चों को नहीं.

इतना ही नहीं, पति को खो देना अफगान समाज में बहुत बुरा माना जाता है, इसे दुर्भाग्य माना जाता है. दूसरी औरतें ऐसी महिलाओं से बात नहीं करतीं. उन्हें डर सताता है कि कहीं उसकी बदकिस्मती उन पर भी हावी न हो जाए.

गुलगोते को इन सब चुनौतियों का सामना करना होगा. अभी वह ठीक हो रही हैं लेकिन किस कीमत पर... उनके परिवार को उम्मीद है कि अब वह फिर आत्महत्या की कोशिश नहीं करेंगी.

रिपोर्टः हसरत नजिमी वसलात/ आभा एम

संपादनः ए जमाल

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