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दुनिया

अफगान मिशन का जर्मनी पर असर

सैन्य हमलों के लंबे चौड़े इतिहास वाले देश अफगानिस्तान में सैन्य मिशन ने जर्मनी की विदेश नीति को खासा प्रभावित किया है. डॉयचे वेले के फ्लोरियान वाइगांड की अफगानिस्तान के हाल पर समीक्षा.

क्या मिशन पूरा हुआ? अफगानिस्तान में अफीम की खेती पहले से कहीं ज्यादा है. साथ ही तालिबान के हमलों ने नया रिकॉर्ड दर्ज किया है. अफगानिस्तान में जर्मनी के सैन्य मिशन का प्रमुख ठिकाना रह चुके कुंदूस में पिछली गर्मियों में विद्रोही प्रतीकात्मक रूप से अपना झंडा फहराने में कामयाब हुए, थोड़ी देर के लिए ही सही.

अब इस बात का डर है कि तालिबान और इस्लामिक स्टेट (आईएस) आपस में बातचीत शुरू कर सकते हैं. देश के ज्यादातर हिस्से सरकार के हाथ से बाहर हैं, लोग एक बार फिर कबीलाई प्रमुखों की बात सुन रहे हैं. राजधानी काबुल अत्यधिक सुरक्षा इंतजामों के बीच भी सुरक्षित नहीं है, एक के बाद दूसरा हमला सामने आ रहा है. संक्षेप में, सफलता ऐसी नहीं होती है.

लेकिन इसे पूरी तरह से नाकामी कहना भी गलत होगा. नाटो की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग सेना के 13 साल लंबे मिशन के दौरान कई अस्पतालों और स्कूलों को स्थापित करने में सफलता मिली है. वहां इससे पहले इतनी बड़ी तादाद में लड़कियां स्कूल नहीं जाया करती थीं. इसमें बेशक नागरिकों के लिए विदेशी आर्थिक मदद की भूमिका रही है. लेकिन जर्मनी और अन्य देशों की सैन्य मदद और संबंधित आर्थिक मदद के बगैर यह सब कुछ मुमकिन नहीं था. अफगानिस्तान बदल गया है.

Deutsche Welle REGIONEN Asien Paschtu Dari Florian Weigand

डॉयचे वेले के फ्लोरियान वाइगांड

लेकिन जर्मनी भी बदला है. 2001 में जब जर्मन सेना ने हिन्दूकुश की तरफ कूच किया तो एक धारणा यह भी थी कि यह तैनीती 1990 के दशक वाली बालकन मिशन जैसी हो सकती है. माना जा रहा था कि 9/11 के बाद हुए हवाई हमलों से तालिबान ने घुटने टेक दिए हैं और अफगानिस्तान बहुत जल्द बोस्निया की तरह शांत हो जाएगा. सैनिक सड़कों पर चॉकलेट बांटते हुए पुनर्निर्माण की राह बना रहे होंगे. इस तरह वे स्थानीय लोगों का दिल जीत लेंगे. आज इस पर विश्वास कठिन होगा लेकिन यह सच है कि जर्मन मिशन के शुरुआती दिनों में जर्मन सैनिक कुंदुस के बाजार से वहीं की कारों में बख्तर के बगैर घूम सकते थे.

विदेश नीति पर असर

लेकिन जर्मन सैनिकों के मैदान में आते ही बहुत जल्द विरोध की लहर तेज हो गई. जर्मन सैनिकों ने अचानक खुद को छापामार युद्ध में पारंगत स्थानीय प्रशिक्षित लड़ाकों के बीच पाया. जर्मन सैनिकों की जानें गईं और जो लौटे, वे अपने साथ खतरनाक अनुभव लेकर घर आए. वहीं दूसरी तरफ युद्ध से कभी न लौटने वाले सैनिकों के लिए मातम हुआ.

यह 'युद्ध' था - ऐसा शब्द जिसे नेता भी जुबान पर लाने से कतराते रहे. खास कर जब वहां से लाशों के ताबूत घर लौटने लगे. फिर सितंबर 2009 में एक जर्मन अधिकारी ने कुंदुस के पास पेट्रोल से भरे दो टैंकरों को उड़ाने का आदेश दिया. इस हादसे में करीब 100 मासूम नागरिक मारे गए. जर्मन सेना ने गलती कर दी थी. अफगान मिशन के लिए जर्मन नागरिकों का समर्थन और कमजोर पड़ा और सरकार के लिए जर्मन सैन्य तैनाती को न्यायोचित ठहराना मुश्किल हो गया.

आज जर्मनी की विदेश नीति इन अनुभवों से दबाव में है. समझ में आता है कि वह 2011 में लीबिया के खिलाफ हवाई हमलों में शामिल होने से क्यों कतरा रहा था और हाल में इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ संयुक्त मिशन में क्यों नहीं जाना चाहता था. जर्मनी शांतिप्रिय देश है, जिसका कारण अब सिर्फ द्वितीय विश्व युद्ध का पापबोध नहीं, बल्कि अफगानिस्तान में सैन्य मिशन भी है. 2001 से जर्मनी के सैन्य अधिकारियों की पूरी पीढ़ी ने युद्ध का अनुभव किया है. उनके ये अनुभव अब जर्मनी की विदेश नीति को बड़े स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं.

भविष्य में भागीदारी

लेकिन जर्मन सेना की अफगानिस्तान में तैनाती से जो गति मिली है, उसे रोक पाना अब संभव नहीं. भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय जर्मनी के भागीदारी की उम्मीद करेगा. इनमें अफगान मिशन के आगे के रास्ते और कुर्द इलाकों में कार्रवाई शामिल है. कुर्द मामले में तो जर्मनी के संविधान की विवेचना तक में खींचतान की गई है.

आधिकारिक तौर पर जर्मनी सिर्फ उत्तरी इराक के कुर्द पेशमरगा सैनिकों की ट्रेनिंग में सहयोग देगा. लेकिन अफगानिस्तान में बीते 13 साल इस बात का बड़ा उदाहरण हैं कि जर्मन सैन्य सहयोग को किस तेजी से युद्धक मिशन तक खींचा जा सकता है. ऐसे में जर्मनी अपनी शांतिप्रियता और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूमिका के बीच कैसे संतुलन बनाता है, यह देखना होगा.

सैकड़ों सालों में अफगानिस्तान ने अपने यहां कई विदेशी सेनाओं को आते जाते देखा है, जिनमें ईरानी, यूनानी, हूण, मंगोल, अरब, ब्रिटिश, सेवियत और हालिया नाटो के आइसैफ सैनिक शामिल हैं. अफगानिस्तान पर सभी की छाप है - कम या ज्यादा. लेकिन अफगानिस्तान हमेशा अफगानिस्तान बना रहा है.

समीक्षा: फ्लोरियान वाइगांड

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