1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

अफगान जिरगे पर उठे सवाल

अमेरिका के साथ सुरक्षा के मामले पर होने वाले अहम समझौते को अफगानिस्तान में लोया जिरगा में पेश किया जाएगा. लेकिन अफगानिस्तान के अंदर जिरगे पर ही सवाल उठ रहे हैं.

काबुल और अमेरिका साल भर से सुरक्षा के समझौते पर सहमत नहीं हो पाए हैं. तालिबान से संघर्ष और लगभग 13 साल तक भारत के पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में बने रहने के बाद अमेरिकी सेना 2014 के अंत तक वहां से हट जाएगी. इसके बाद अमेरिकी सेना की भूमिका पर लोया जिरगा यानी विशाल सभा की बैठक हो रही है. इसमें 2500 कबीलाई नेता हिस्सा लेंगे. जिरगा में जो प्रस्ताव पास होगा, उसे संसद में भेजा जाएगा.

महिला सांसद सहेरा शरीफी को जिरगे में बुलाया गया है, लेकिन वह नहीं जा रही हैं. उनका कहना है, "राष्ट्रपति, कैबिनेट और संसद को अहम फैसले लेने चाहिए क्योंकि अब हमारे पास ऐसी संस्थाएं हैं."

कई अफगान लोगों का कहना है कि जिरगे का आयोजन सिर्फ वक्त की बर्बादी है. काबुल के छात्र रमीनुल्लाह इसे ड्रामा बताते हुए कहते हैं, "इससे आम आदमी की जिंदगी में सिर्फ तनाव पैदा होता है." यहां तक कि जिरगा के अध्यक्ष और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति सेबगतुल्लाह मुजादादी का मानना है कि इसकी जरूरत अब नहीं रही है. उनके डिप्टी ने तो विरोध में इस्तीफा ही दे दिया.

जिरगे में जाएगी जान

तालिबान ने भी इस बैठक का विरोध किया है और कहा है कि इसमें हिस्सा लेने वालों को निशाना बनाया जाएगा. तालिबान ने शनिवार को जिरगे की बैठक वाली जगह के बाहर खुदकुश हमला किया, जिसमें 10 लोग मारे गए. अब इस पूरे इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं. पूरे शहर में सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है और चेकप्वाइंट बनाए गए हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि लोया जिरगा में शामिल बुजुर्ग बड़े बदलावों की बात कर सकते हैं, जिससे अमेरिका को नाखुशी हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषक वलीउल्लाह रहमानी का कहना है, "अफगानिस्तान में कुछ भी हो सकता है. हमारे पास राजनीति में कोई अनुशासन या संरचना नहीं है. लेकिन अगर आप बारीकी से इस मामले को देखेंगे, तो पाएंगे की राष्ट्रपति हामिद करजई इस समझौते पर दस्तखत चाहते हैं." रहमानी का कहना है, "वह इस समझौते की अहमियत जानते हैं."

दो नाजुक मसले

जानकारों का कहना है कि दो मुद्दों पर मामला बिगड़ सकता है, एक तो अपराध की सूरत में अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ मुकदमे वाली बात पर और दूसरा, अमेरिकी सैनिकों की तलाशी अभियान को लेकर. अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि अगर उनके सैनिकों को अफगान कानून से आम माफी नहीं मिलती, तो डील नहीं होगी. जहां तक तलाशी अभियानों की बात है, करजई और अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी के बीच मंगलवार को एक समझौता हो गया. इसके तहत सिर्फ "दुर्लभ परिस्थितयों में" ही अमेरिकी सैनिक किसी घर में घुस सकेंगे. हालांकि इस दुर्लभ परिस्थिति की परिभाषा तय नहीं हो पाई है.

US Soldaten in Afghanistan Archiv 2011

13 साल बाद हटेंगे अमेरीकी सैनिक

रहमानी का कहना है, "आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के लिए अमेरिकी सेना को घरों में घुसना पड़ सकता है, उनके पास तलाशी की गारंटी होनी चाहिए." सांसद शरीफी के प्रांत में ऐसी कई तलाशियां होती रहती हैं. उनका कहना है कि रात में होने वाली तलाशी से लोगों में काफी नाराजगी है, "कई लोग तो तालिबान का इसलिए साथ देते हैं क्योंकि अमेरिकी सेना रात में तलाशी लेती है. अमेरिकी लोग घर में घुस कर महिलाओं के कपड़े टटोलते हैं. यह शर्मनाक है."

अगर सुरक्षा पर सहमति नहीं बनी, तो 2014 के बाद अमेरिका अपने सभी सैनिकों को अफगानिस्तान से हटा लेगा. इसके बाद देश की सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ अफगान सैनिकों पर होगा. 2011 में अमेरिका ने इराक में सैनिक कार्रवाई खत्म की. वहां भी इस तरह का समझौता नहीं हो पाया. अमेरिका और अफगानिस्तान रक्षा विभाग मिल कर मानता है कि अफगान सेना फिलहाल तालिबान से निपटने में सक्षम नहीं है और उन्हें ट्रेनिंग की जरूरत है. रहमानी का कहना है, "अगर समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका से ज्यादा नुकसान अफगानिस्तान को होगा."

एजेए/ओएसजे (डीपीए)

DW.COM

WWW-Links