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दुनिया

अफगानिस्तान में लौटता अल कायदा

अमेरिका ने कहा है कि अगर सुरक्षा समझौता नहीं होता है तो वह अफगानिस्तान से अपनी पूरी सेना इसी साल हटा लेगा. इसके बाद अल कायदा एक बार फिर अफगानिस्तान में जड़ें मजबूत करने में लग गया है. उसने बुनियादी काम शुरू कर दिया है.

अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात का खुलासा करते हुए बताया कि फारूक अल कहतानी अल कतरी इस काम में लगा है. वह छोटी छोटी संख्या में अनुभवी उग्रवादियों को अफगानिस्तान पहुंचा रहा है, जो नई पीढ़ी को आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रहे हैं. इसकी वजह से अमेरिकी सेना ने हाल के दिनों में कुनार और नूरिस्तान जैसे इलाकों में ड्रोन और मिसाइल हमले बढ़ा दिए हैं. अमेरिका नहीं चाहता कि उसके देश छोड़ने तक वहां कोई बड़ा ट्रेनिंग कैंप लगे.

अधिकारियों का दावा है कि यह बात तय है कि अगर अमेरिकी सेना ने पूरी तरह से अफगानिस्तान खाली कर दिया, तो आतंकवाद विरोध के कार्यक्रम को भारी धक्का लगेगा. ओबामा प्रशासन इसी को रोकने के लिए 2014 के बाद भी अपनी कुछ सेनाएं अफगान धरती पर रखना चाहता है.

निकासी की प्रतीक्षा

अमेरिकी संसद में खुफिया समिति के अध्यक्ष माइक रॉजर्स ने बताया कि अफगानिस्तान में अल कायदा के सदस्यों की संख्या बढ़ रही है लेकिन यह कुछ सौ से ज्यादा नहीं है, "मुझे लगता है कि ज्यादातर इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि अमेरिका 2014 में अपनी सेना बाहर करे." अफगान सैनिकों की ट्रेनिंग के लिए अमेरिका अपने 10,000 सैनिकों को 31 दिसंबर, 2014 के बाद भी वहां बनाए रखना चाहता है. लेकिन इसके आड़े अंतरराष्ट्रीय सेना को बनाए रखने वाला समझौता आ रहा है, जिस पर अभी तक दस्तखत नहीं हुए हैं. राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफ कर दिया है कि अगर ऐसा नहीं होता है तो सारे अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से बाहर निकल जाएंगे.

सैनिक अधिकारियों का कहना है कि जब तक उनके पास एक सैनिक अड्डे से ड्रोन और जेट उड़ाने की सुविधा है, अल कहतानी के कैंपों को पनपने नहीं दिया जा सकता है. अमेरिका बागराम या जलालाबाद के उत्तर से यह काम जारी रखना चाहता है.

विश्लेषकों का कहना है कि अल कायदा अभी इतना कमजोर नहीं हुआ है और अनुभवहीन अफगान सैनिकों के लिए अभी उनसे टक्कर लेना आसान नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की प्रवक्ता कैटलिन हेडन का कहना है कि सेनाओं के हटने के साथ अफगानिस्तान की क्षमताओं का भी आकलन किया जा रहा है, "आतंकवाद पर काबू और अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका सभी जरूरी कदम उठाएगा."

अलग थलग धड़ा

कुछ प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि अल कायदा उस वक्त से कमजोर हुआ है, जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया था. उनका कहना है कि अल कहतानी नेटवर्क अल कायदा के मुकाबले इतना छोटा है कि उससे ज्यादा खतरा नहीं हो सकता है. दो अमेरिकी खुफिया अधिकारियों का कहना है कि यह धड़ा इतना अलग थलग है कि इसे पैसों के लिए भी तालिबान पर भरोसा करना पड़ रहा है. इन अधिकारियों की असली चिंता सीरिया में लड़ रहे अल कायदा से है. अमेरिकी सेना के पूर्व सलाहकार डगलस ओलिवांट का कहना है, "हम उन्हें (अल कहतानी) को वहीं तक सीमित रखना चाहते हैं. अफगान सेना वहां जाकर उन्हें नष्ट करने की सलाहियत नहीं रखते लेकिन वे उन्हें रोके रखने में सक्षम हैं."

जो लोग अल कहतानी पर नजर रख रहे हैं, उनका कहना है कि वह अल कायदा के पूर्व प्रमुख ओसामा बिन लादेन के नियमों पर चल रहा है, जिससे बिन लादेन काफी दिनों तक बचा रहा. अल कहतानी सेलफोन और रेडियो से दूर रहता है. संपर्क के लिए कूरियर या सीधी मुलाकात पर भरोसा करता है और जब बाहर होता है, तो आम तौर पर महिलाओं और बच्चों की भीड़ में घुसा होता है. अमेरिकी ड्रोन आम तौर पर महिलाओं को निशाना नहीं बनाते.

अल कहतानी को स्थानीय कबीलों से भी मदद मिलती है. जब भी कभी हेलिकॉप्टर या ड्रोन उड़ने की आवाज आती है, घाटी में सीटियां बजने लगती हैं. ये सीटियां चरमपंथियों को सावधान करने के लिए होती हैं कि वे छिप जाएं. अमेरिका अब तक अल कहतानी के करीब नहीं पहुंच सका है.

एजेए/ओएसजे (एपी)

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