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ताना बाना

अफगानिस्तान में तैनाती बढ़ाने को जर्मन सरकार की मंजूरी

चासंलर अंगेला मैर्केल की सरकार ने संसद से अफगानिस्तान में जर्मन सैनिकों की तैनाती और एक साल बढ़ाने को कहा है. जर्मन सैनिकों की वापसी के समय पर सरकार के भीतर ही मतभेद हैं. जर्मनी में अफगान मिशन बेहद अलोकप्रिय है.

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पहली बार जर्मन सरकार ने यह भी कहा है कि हालात ठीक होने पर दिसंबर 2011 से सैनिक वापस बुलाए जाने की शुरुआत भी की जा सकती है. जर्मनी के 4,700 सैनिक अफगानिस्तान में आईसैफ कमांड के तहत काम कर रहे हैं. सर्वे बताते हैं जर्मन जनता सैनिकों को अफगानिस्तान में रखने के बिल्कुल खिलाफ है. लेकिन सरकार चाहती है कि संसद जर्मन सैनिकों को 2012 तक अफगानिस्तान में रखने की अनुमित दे. संसद से 28 जनवरी को अफगान मिशन पर मतदान के लिए कहा जाएगा. दस साल पहले नाटो की कमांड में जर्मन सैनिकों को अफगानिस्तान में तैनात किया गया. तब से अब तक वहां 45 जर्मन सैनिक मारे जा चुके हैं.

वैसे अफगान मिशन को लेकर सरकार के भीतर मतभेद भी दिख रहे हैं. जहां रक्षा मंत्री कार्ल थियोडोर त्सु गुटेनबर्ग सैनिकों की वापसी के लिए कोई समयसीमा तय करने का विरोध कर रहे हैं, वहीं विदेश मंत्री गीडो वेस्टरवेले सैनिकों की घर वापसी के लिए ठोस समयसारिणी चाहते हैं.

सरकारी प्रस्ताव में कहा गया है, "सरकार को इस बात का विश्वास है कि अफगान सरकार को सुरक्षा जिम्मेदारी सौंपने की योजना के तहत 2011 के अंत से वह सशस्त्र उपस्थिति कम करने में सक्षम होगी." लेकिन इसके साथ कई शर्तें भी जुड़ी हैं.

कैबिनेट की बैठक से पहले जर्मन टीवी चैनल जेडीएफ के साथ बातचीत में वेस्टरवेले ने इस बात से इनकार किया कि गुटेनबर्ग के साथ उनके मतभेद हैं. आईसैफ की कमांड के तहत अफगानिस्तान में फिलहाल डेढ़ लाख सैनिक काम कर रहे हैं जिसमें ज्यादातर अमेरिकी सैनिक ही शामिल हैं. उन्हें दक्षिणी अफगानिस्तान में तालिबान के कड़ी टक्कर लेनी पड़ रही है. लेकिन जर्मन सैनिक अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले उत्तरी हिस्से में तैनात हैं.

एक तरह से जर्मन सैनिकों की यूनियन समझे जाने वाले बुंडेसवेयर एसोसिएशन का कहना है कि सैनिकों की वापसी की योजना गुमराह करने वाली है. यह संगठन सैनिकों के लिए बेहतर संसाधन की मांग करता रहा है. इसके प्रमुख उलरिष किर्श कहते हैं, "सैनिकों को वापसी की सयमसीमा या समयसारिणी पर बिल्कुल विश्वास नहीं है." उनका मानना है कि कैबिनेट का टाइमटेबल सिर्फ चुनावी हथकंड़ा था.

जर्मन सैनिकों की विदेशों में नियुक्ति के लिए संसद से मंजूरी लेनी पड़ती है. मुख्य विपक्षी पार्टी सोशल डेमोक्रेट्स ने संकेत दिया है कि वे सरकारी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करेंगे.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः आभा एम

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