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दुनिया

अफगानिस्तान में जोड़े की पत्थर मार कर हत्या

अफगानिस्तान में एक युवक युवती के जोड़े को प्रेम करने के आरोप में तालिबान ने पत्थरों से मार मार कर मौत की सज़ा दे दी है. 28 साल के युवक की पहले ही शादी हो चुकी थी जबकि 23 साल की युवती की किसी और से सगाई हुई थी.

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कुंदूस प्रांत में इमाम साहिब ज़िले के गवर्नर मोहम्मद अय्यूब ने बताया कि मुल्ला क़ुली गांव में तालिबान के हुक्म पर दो लोगों को तब तक पत्थर मारे गए जब तक कि उनकी मौत नहीं हो गई. इस गांव पर तालिबान का कब्ज़ा है.

मुल्ला क़ुली के एक निवासी के मुताबिक करीब 100 लोग गांव में एक जगह रविवार की शाम जमा हुए. इनमें ज्यादातर तालिबानी चरमपंथी थे. इस दौरान इन दोनों युवाओं के हाथ पीछे बांध दिए गए. उन्हें जबरदस्ती खाली मैदान में खड़ा कर दिया गया. इसके बाद तालिबान का एक बयान पढ़ा गया, जिसमें इस बात का जिक्र था कि दोनों युवाओं ने अपने रिश्ते की बात कबूल कर ली है. बयान में ये भी कहा गया कि तालिबान ने इन दोनों को पत्थरों से मार कर मौत की सज़ा सुनाई है. बयान पूरा होते ही मौजूद भीड़ में से कुछ लोगों ने पत्थर मारने शुरू कर दिए. युवक युवती तड़पते रहे लेकिन पत्थर नहीं रुके. फिर पत्थर मारने का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक दोनों ने दम नहीं तोड़ दिया.

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तालिबान के एक स्थानीय कमांडर ने अपना नाम बताए बगैर मीडिया से इस बात की पुष्टि की. उसने कहा, "दोनों ने अपने नाजायज रिश्तों की बात मान ली थी और उनके कबूलनामे के आधार पर उन्हें मौत की सज़ा दी गई." मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक 2001 में अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान पर धावा बोलने के बाद पहली बार तालिबान ने किसी को पत्थरों से मौत की सज़ा दी है. एमनेस्टी के मुताबिक दोनों प्रेमी यहां से भाग कर पाकिस्तान चले गए थे. बाद में उनसे कहा गया कि वो वापस लौट आएं उनके परिवार उनकी शादी कराने को रजामंद हैं. दोनों की शादी तो नहीं हुई लेकिन 15 अगस्त को तालिबान ने इन दोनों को मौत की नींद सुला दिया.

इस्लामी कानून शरीया में अविवाहितों के बीच शारीरिक संबंध की सज़ा सार्वजनिक रूप से पिटाई है जबकि विवाहेतर संबंध रखने की सज़ा पत्थर मारकर मौत है. पत्थर मार कर हत्या की इस प्रक्रिया को संगसार कहते हैं. इसी महीने तालिबान ने एक गर्भवती विधवा महिला को सार्वजनिक रूप से मौत की सज़ा दी थी. पश्चिमी बदघीस प्रांत की इस महिला पर अवैध संबंध रखने के आरोप लगे थे.

इन हत्याओं ने एक बार फिर 1996 से 2001 के बीच अफगानिस्तान में तालिबान के बर्बर शासन की याद ताज़ा कर दी है. इस दौरान ऐसे ही छोटी-मोटी सुनवाइयां करके लोगों को मौत की सज़ा दी जाती थी.

रिपोर्टः एजेंसियां/ एन रंजन

संपादनः ए जमाल

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