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दुनिया

अफगानिस्तान में जिंदा होता रूस

अफगानिस्तान के स्कूलों में रूसी भाषा और संस्कृति फिर जिंदा हो रही है. दशक भर की जंग के बाद 1989 में बाहर हुई रूस की सेना नाटो सैनिकों की वापसी के बाद इलाके में अपना प्रभाव बढ़ाने की तैयारी में है.

काबुल में चमचमाते रूसी सांस्कृतिक केंद्र तक जाने के लिए बुलडोजर सड़क साफ कर रास्ता बना रहे हैं. कभी यहां विशाल इमारत हुआ करती थी जो बाद में रूस की जंग में हार की निशानी बन गई. काबुल में रूस के राजदूत आंद्रेय एवेतिस्यान ने सांस्कृतिक केंद्र को दोबारा खड़ा करने के फैसले के बार में समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "हम इस इलाके में हैं और भविष्य में भी रहेंगे. अच्छा, दोस्ताना और पड़ोसी का संबंध रखने के लिए सांस्कृतिक चीजों को रखना जरूरी है."

यह सेंटर एक टूटी फूटी इमारत की जगह ले रहा है जो हेरोइन के नशेड़ियों का अड्डा बन गया था. कई महीने पहले रूसी लोगों ने स्थानीय प्रशासन के साथ मिल कर इसे ढहा दिया. नया सांस्कृतिक केंद्र रूसी भाषा के साथ ही संगीत और दस्तकारी भी सिखाएगा. साथ ही यहां एक कंसर्ट हॉल भी होगा. वैसा ही, जैसा 1983 में बनाया गया था. इसका निर्माण अफगानिस्तान में 1979 के आक्रमण से पहले हुआ तब रूस यहां शिक्षा और कला को काफी बढ़ावा देता था.

अफगान लोगों में रूसी भाषा को लेकर फिर दिलचस्पी पैदा होती नजर आ रही है. अफगान इस भाषा को देश की बदलते हालात में उपयोगी मान रहे हैं. एवेस्तिस्यान बताते हैं, "रूसी भाषा की मांग बढ़ रही है. पांच साल पहले की तुलना में यह ज्यादा बोली जाने लगी है. विदेशी सलाहाकार और जानकार यहां हमेशा के लिए नहीं रहेंगे. नाटो, यूरोपीय संघ सारे चले जाएंगे."

सोवियत संघ की जंग के दौरान अफगानिस्तान काफी तबाह हुआ. एक अनुमान है कि इस दौरान लाखों लोग मारे गए और एक समय खेती के लिहाज से भरा पूरा देश बर्बाद हो गया. दोनों पक्षों ने अपने रिश्ते की ओर ज्यादा जोश भरी नजरों से देखना शुरू किया और इस वजह से रूस को यहां बड़ी भूमिका मिल रही है. देश में सबसे बड़ी काबुल युनिवर्सिटी में रूसी भाषा और साहित्य की डिग्री चाहने वालों की तादाद बढ़ रही है. रूसी भाषा के प्रोफेसर मोहम्मद रहीम बनाइजादा बताते हैं, "हमारे छात्र काफी युवा हैं और उन्हें इस बात की चिंता नहीं कि पहले क्या हुआ. इसकी बजाय वे रूसी भाषा को आर्थिक और सामाजिक मौकों के लिए पुल के रूप में देखते हैं."

यूनिवर्सिटी में रूसी भाषा की चार साल की डिग्री में फिलहाल 220 छात्र हैं. पांच साल पहले के मुकाबले यह संख्या करीब दोगुनी है. विभाग में जाइए तो राष्ट्रपति हामिद करजई के साथ रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की तस्वीर टंगी है. पास ही अफगान सम्राट अमानुल्लाह खान की 1919 में लेनिन को लिखी चिट्ठी की टाइप की हुई कॉपी भी है जिसमें बोलशेविकों के सत्ता में आने के दो साल बाद दोनों देशों के बीच दोस्ती की इबारत है.

थर्ड ईयर के छात्र, 22 साल के शरीफुल्लाह कहते हैं, "रूस हमारा पड़ोसी है और हम वहां की संस्कृति को पसंद करते हैं. जब वो लोग यहां थे तब बहुत कुछ अच्छा था." सांस्कृतिक केंद्र अफगानिस्तान में रूसी निर्माण की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. इनमें से ज्यादातर का उद्देश्य देश में स्थिरता लाना है. रूस मानता है कि अमेरिका उन गलतियों को दोहरा सकता है, जो उसने की थी. रूस को डर भी है कि 2014 में नाटो सेनाओं की वापसी के बाद दक्षिण में पूर्व सोवियत संघ और मध्य एशिया की सीमा पर ताकत के लिहाज से एक खालीपन आ जाएगा जो उसकी सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है. साथ ही रूस में हेरोइन की तस्करी बढ़ने का भी अंदेशा होगा.

एनआर/एजेए (रॉयटर्स)

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