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दुनिया

अफगानिस्तान पर भारत पाकिस्तान की नजर

भारत और पाकिस्तान दोनों ही पड़ोसी देश अफगानिस्तान में अपना प्रभाव चाहते हैं. जानकारों के मुताबिक अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं का लौटना दोनों देशों के बीच छद्म युद्ध पैदा कर सकता है.

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने हाल में समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "पाकिस्तान को खतरा अफगानिस्तान पर भारत का प्रभाव होने से है." उनके मुताबिक भारत अफगानिस्तान को पाकिस्तान विरोधी बनाना चाहता है. मुशरर्रफ ने कहा, "अगर भारत अफगानिस्तान में कुछ धार्मिक गुटों को इस्तेमाल करेगा को पाकिस्तान अपने समर्थकों का इस्तेमाल करेगा और हमारे पारंपरिक मित्र निसंदेह पशतून हैं."

1999 से 2007 तक पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह के रूप में पहचान बनाने वाले मुशर्रफ देश द्रोह के आरोप में नजरबंद हैं. कुछ पाकिस्तानी जानकारों का मानना है कि मुशर्रफ के अभी भी सेना से करीबी संबंध हैं. हालांकि उनका मानना है कि वे पाकिस्तान और भारत के बारे में अपनी पुरानी सोच को ही दोहरा रहे हैं.

सरकारी अधिकारियों के विचार भी इससे मिलते जुलते हैं. प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने इसी महीने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तान को ऐसे लड़ाको को मारने की कोई जरूरत नहीं है जिनसे उनके देश की सुरक्षा को खतरा नहीं है. हक्कानी नेटवर्क की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "अमेरिका के दुशमनों को हमारे दुशमन होने की क्या जरूरत है?"

हालांकि ये दो बयान पाकिस्तान के दो अलग रुख के नेताओं के हैं, लेकिन इनका इशारा एक ही तरफ है कि अफगानिस्तान के साथ भारत के करीबी संबंधों को पाकिस्तान खतरे की तरह देखता है. यानि संभावना है कि पाकिस्तान तालिबान लड़ाकों के एक हिस्से को अपने हित के लिए इस्तेमाल में लाना जारी रखेगा.

पुरानी रणनीति

हालांकि अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की रणनीति में कुछ बहुत नया नहीं है. विशेषज्ञों के मुताबिक देश में सैन्य स्थापना के समर्थक आज भी तालिबान को रणनीति के लिए अहम मानते हैं. वे मानते हैं कि नाटो सेना की वापसी के बाद इनकी अफगान सरकार में भागीदारी होनी चाहिए. पाकिस्तान अफगानिस्तान में अपने प्रभाव को वापस हासिल करने की उम्मीद कर रहा है. अफगानिस्तान में 2001 में अमेरिकी सेना के आने से पहले अफगान सरकार में पाकिस्तान समर्थक रुख था.

लंदन में रहने वाले पत्रकार और रिसर्चर फारूख सुलेहरिया के मुताबिक, "काबुल का भारत की तरफ अब दोस्ताना रवैया है. जबकि पाकिस्तान तालिबान का समर्थक है, जैसा कि सरतादज अजीज ने माना भी है. पाकिस्तान एक बार फिर हालात बदलना चाहता है और अफगानिस्तान को दोबारा अपने राजनीतिक बल का हिस्सा बनाना चाहता है."

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अफगान संकट पर रिसर्च कर रहे मैट वॉल्डमन मानते हैं कि जब तक क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह से बदल नहीं जाते पाकिस्तान तालिबान का समर्थन करना नहीं छोड़ेगा. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पाकिस्तान का अफगानिस्तान के प्रति रवैया बदला नहीं है."

पुराने कारण

इस साल की शुरुआत में भारत ने अफगानिस्तान के लिए दो अरब अमेरिकी डॉलर की मदद की घोषणा की थी. यह अब तक भारत द्वारा किसी भी देश को दी गई सबसे बड़ी मदद राशि है. सुलेहरिया के मुताबिक 2001 से ही जहां एक तरफ भारत अफगानिस्तान को मदद पहुंचाने की कोशिशों में रहा है, वहीं पाकिस्तान की सकारात्मक दिशा में भूमिका नगण्य रही है. उन्होंने कहा, "तालिबान का समर्थन करके पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की बर्बादी में हाथ बंटाया है. मैं अक्सर अफगानिस्तान जाता रहता हूं और मैं कह सकता हूं कि पाकिस्तान वहां कतई पसंद नहीं किया जाता. बदकिस्मती से पाकिस्तान इन तौर तरीकों को बदलना नहीं चाहता."

दिल्ली के रिसर्चर विवेक कुमार कहते हैं कि अफगानिस्तान को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा खींचतान भरे संबंध रहे हैं. उन्हें नहीं लगता कि आगे भी ये समीकरण बदलने वाले हैं. कुमार कहते हैं, "भारत सरकार चाहेगी कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई के रास्ते पर चलें. भारत ने अफगानिस्तान पर खूब निवेश किया है और यह सारा निवेश रणनीति के तहत अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी प्रभाव को कम करने के लिए किया गया है." उनके मुताबिक भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफगानिस्तान के साथ सुरक्षा संबंधी मामलों में भी साझेदारी चाहेंगे.

सुलेहरी कहते हैं कि अफगानिस्तान पिछले कुछ सालों में बहुत बदल गया है. मौजूदा स्थिति के आधार पर अगर सच्चाई टटोली जाए तो वह पाकिस्तान के हित में नहीं है, "पाकिस्तान आगे अफगानिस्तान में शासन पर अपनी तानाशाही नहीं चला सकेगा. मेरे विचार में तो पाकिस्तान पहले ही छद्म युद्ध हार गया है."

दूर की चाल

अफगानिस्तान और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते के रहते भारत या पाकिस्तान के लिए अफगानिस्तान में अस्थिरता पैदा करना असंभव होगा. इस समझौते के तहत अमेरिकी सेना तालिबान के खिलाफ लड़ाई में अफगान सेना को समर्थन देगी. अंतरराष्ट्रीय सेनाएं अफगान सैनिकों की ट्रेनिंग करेंगी और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करेंगी.

कराची के पत्रकार उवैस तौहीद कहते हैं कि सुरक्षा समझौता पाकिस्तानी शासकों को जगाने के लिए खतरे की घंटी जैसा है और उन्हें अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. तौहीद के मुताबिक नजदीकी फायदे देखने के बजाय पाकिस्तान को चाहिए कि अफगानिस्तान के साथ लंबी दोस्ती पर ध्यान दे, जिसमें दोनों के व्यापारिक और आर्थिक हित निहित हों. छोटे मोटे फायदों की रणनीति पाकिस्तानी शासकों की अदूरदर्शिता दिखाती है.

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