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दुनिया

अफगानिस्तान पर नीति का हिलेरी ने बचाव किया

अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अफगानिस्तान पर अमेरिकी नीति का बचाव किया है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने तालिबान से शांति वार्ता से इंकार करने के बाद अमेरिका से देश में अपनी गतिविधियों को कम करने के लिए कहा था.

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हिलेरी और हामिद करजई अपनी अपनी सुनाने में लगे हैं और तालिबानी आतंकवादी अपना काम करने में. सोमवार को तालिबानियों के रॉकेट हमले में 9 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं और छह बख्तरबंद गाड़ियों समेत सेना का एक बेस पूरी तरह से तबाह हो गया है. ताजा हिंसा तब हुई है जब लिस्बन में नाटो का सम्मेलन होने जा रहा है. सम्मेलन में अफगानिस्तान से नाटो सेना की वापसी चर्चा का मुख्य विषय रहने की उम्मीद है.

Hamid Karzai

उधर अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है," खुफिया सेवाओं से लैस और खास निशाने पर वार करने वाली अमेरिकी फौज की कार्रवाइयों का आतंकवादियों के नेटवर्क और उनके नेताओं पर बहुत ज्यादा असर है.अमेरिकी सेना की हर कार्रवाई अफगान सरकार की साझेदारी में होती है और इनमें अफगानिस्तान की फौज भी शामिल होती है." हालांकि हिलेरी का ये भी कहना है कि अफगानी राष्ट्रपति ने जो चिंता जाहिर की है उनका देश उन पर गंभीरता से विचार करेगा.

अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में हामिद करजई ने कहा कि अमेरिका की फौज को अब देश में अपनी गतिविधियों में कमी लानी चाहिए. इसके साथ ही सैन्य कार्रवाइयों की बजाय विकास के कामों की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए और अफगानी जनता के रोजमर्रा के कामों में दखलंदाजी बंद होनी चाहिए.

करजई खास तौर से रात को नागरिक इलाकों में होने वाली फौजी कार्रवाइयों बंद करना चाहते हैं. अमेरिकी सेना ने 2011 के मध्य तक अफगानिस्तान से वापसी शुरू करने की योजना बनाई है. इससे पहले उन्होंने तालिबान के खिलाफ अपनी कार्रवाइयां तेज कर दी हैं करजई चाहते हैं कि नागरिक इलाकों में हमले बंद कर दिए जाएं.

वॉशिंगटन पोस्ट ने ये भी खबर छापी है कि अफगानिस्तान में गठबंधन सेना के कमांडर जनरल डेविड पैट्रियस ने करजई के बयानों पर दुख और आश्चर्य जताया है. पैट्रियस का कहना है कि ऐसे बयानों से आतंकवाद के खिलाफ जंग कमजोर पड़ सकती है. इस बीच ब्रसेल्स में नाटो के मुखिया आंदर्स फो रासमुसेन ने कहा है कि वो अफगानी राष्ट्रपति के बयान की सभी बातों से सहमत नहीं हैं.

हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि उनका बयान नाटो की उस योजना से मेल खाता है जिसमें अफगानी फौज को सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपने की शुरुआत करने की बात है. इस बीच अब ये तय माना जा रहा है कि नाटो के सदस्य देश अगर राजी हो गए तो भी फौजों की पूरी तरह से अफगानिस्तान से वापसी 2014 तक ही हो पाएगी.

इस बीच तालिबान के शीर्ष नेतृत्व ने किसी तरह की बातचीत में शामिल होने से साफ इंकार किया है. उनका ये भी कहना है "इस तरह की खबरें कि वो बातचीत में

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यही है वह 'सवाल का निशान' जिसे आप तलाश रहे हैं. इसकी तारीख़ 16/11 और कोड 3634 हमें भेज दीजिए ईमेल के ज़रिए hindi@dw-world.de पर या फिर एसएमएस करें +91 9967354007 पर.

शामिल होने जा रहे हैं अफवाहों के सवा कुछ भी नहीं. इनका मकसद बस ये है कि तालिबान अपने हमले रोक दे लेकिन ऐसा नहीं होगा."

तालिबान के मुखिया मुल्ला अमर ने कहा है," हमारी रणनीति एक के बाद एक कर देश के सभी हिस्सों में हमलों में तेजी लाने की है जिससे कि हमारे दुश्मन अपने ठिकानों से बाहर निकलें और फिर उन्हें योजनाबद्ध तरीके से खत्म कर देंगे."

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः एस गौड़

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