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मंथन

अपराधियों की प्रोफाइलिंग

सिरफिरे हत्यारे या भी सीरियल किलर, ये अपराधी सिर्फ किस्से कहानियों में ही नहीं, बल्कि हकीकत में भी होते हैं. पुलिस को उलझाने में माहिर इन अपराधियों को पकड़ने के लिए इनकी क्रिमिनल प्रोफाइलिंग की जाती है.

1980 के दशक में हाराल्ड डेर्न ने अपराधियों को श्रेणी में बांटने का तरीका विकसित किया. इसे क्रिमिनल प्रोफाइलिंग कहते हैं. जर्मनी में अपनाया जाने वाला यह तरीका काफी हद तक अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफबीआई से मिलता जुलता है. हाराल्ड बताते हैं, "कुछ मायनों में यह एफबीआई के तरीके जैसा ही है. लेकिन हम समाज शास्त्र के तरीकों को भी अपनाने की कोशिश करते हैं. मैं हादसे को दोबारा देखने की कोशिश करता हूं, कि क्या हुआ होगा, बारीकी से." हाराल्ड का कहना है कि उनकी यह भी कोशिश रहती है कि वह पहले से ही फैसला ना कर लें, बल्कि घटनाओं के आधार पर अपने निष्कर्ष तक पहुंचें.

पूरी टीम का साथ

लेकिन क्रिमिनल प्रोफाइलिंग अकेले शख्स के बस की बात नहीं. इसके लिए टीम की जरूरत पड़ती है. अलग अलग विषयों के विशेषज्ञ एक साथ मिल कर हादसे का सिद्धांत बनाते हैं. क्रिमिनल प्रोफाइलर हाराल्ड कहते हैं, "घटना को लेकर अपने सिद्धांत के प्रति हर कोई बहुत ही सहनशील रहता है. टीम में हर किसी को अपनी पसंदीदा थ्योरी साबित करनी होगी, सबूतों के आधार पर." ऐसे में उस व्यक्ति को टीम के सदस्यों को मनाना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो सिद्धांत को छोड़ दिया जाता है. टीम कोशिश करती है कि गलत अनुमानों पर ज्यादा वक्त जाया न किया जाए. इसलिए टीम का आपस में बात करना क्रिमिनल प्रोफाइलिंग का अहम हिस्सा है.

टीम को कई दिनों एक ही कमरे ही काम करना होता है, कोशिश होती है कि छोटी से छोटी कड़ी को जोड़ा जाए. केस स्टडी रूम विशेषज्ञों के लिए अहम होता है क्योंकि वो यहां कई दिन और कभी कभी कई हफ्ते बिताते हैं. कभी कभी महीना भर भी रह जाते हैं. वह बहुत ध्यान से काम करते हैं और ऐसी बातों को समझने की कोशिश करते हैं जो उन्हें शुरू से नहीं समझ आ रही होती हैं.

हत्यारे का मनोविज्ञान

मिसाल के तौर पर 'केल के भूत' का मामला. साल 2000 में जर्मनी और फ्रांस की सीमा के पास कई महिलाओं की हत्या हुई. मौत जैसे उनका पीछा कर रही थी. उस मामले को याद करते हुए हाराल्ड कहते हैं, "अपराध बड़े ही व्यवस्थित ढंग से हो रहा था. पीड़ित को कुछ शक भी नहीं होता था. रात में अचानक किसी कोने से अपराधी निकलता और जोर से पीड़ित को मारता या छुरी भोंकता. वह अपने शिकार को तब तक मारना नहीं छोड़ा जब तक उसकी जान ना चली जाए."

उस वक्त पुलिस के लिए यह रहस्य था. मारने के लिए अपराधी ने अलग अलग तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया. पुलिस को लगता रहा कि 'केल का भूत' एक नहीं बल्कि अलग अलग लोग हैं. पुलिस की दुविधा का जिक्र करते हुए क्रिमनल प्रोफाइलर कहते हैं, "सिलसिलेवार हत्याओं में पहला सवाल यही होता है कि क्या सारी हत्याएं एक ही आदमी ने की हैं. खास तौर से तब जब हत्याएं अलग अलग तरीके से हुई हों, और इस मामले में ऐसा ही था." पहली हत्या में महिला को बुरी तरह से मारा गया था और बाद वाली हत्याओं में दरिंदगी से महिलाओं को चाकू से काटा गया था. क्रिमनल प्रोफाइलरों ने एक एक करके हर मामले में देखा कि हत्यारा अपने शिकार को कम वक्त में मौत के घाट उतारना चाहता था.

इस तरह यह बात साफ हो गई कि खून एक आदमी ने ही किए हैं. फिर अपराधी की तलाश शुरू हुई और उसे पकड़ा भी गया. जर्मनी में जासूस हर साल ऐसे 100 मामलों की जांच करते हैं. ऐसी भी वारदातें होती हैं जब लगता है कि पीड़ित गलत वक्त पर गलत जगह पहुंचा इंसान था जिसकी जिंदगी अचानक खत्म हो गई. कभी कभार अधिकारियों को कुछ बातें बिना किसी तर्क भी स्वीकारनी पड़ती हैं. लेकिन इसके वाबजूद अपराधियों को दबोचने में क्रिमिनल प्रोफाइलिंग अहम भूमिका निभाती है.

रिपोर्ट: आलेक्जांड्रा हार्डोर्फ/ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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